दुकान का किराया भी नहीं भर पा रहे पीडीएस डीलर
कई दुकानदारों को महीने में केवल 100 लीटर केरोसिन का आवंटन
औरंगाबाद सदर : रियायती मूल्य पर गरीबों को राशन बांटनेवाले जन वितरण प्रणाली विक्रेता खुद मुसीबत में हैं. नगर पर्षद क्षेत्र में चलनेवाले दर्जनों जन वितरण प्रणाली केंद्रों के संचालकों को राशन के कमीशन से घर चलाना भी मुश्किल हो रहा है. ये दुकानदार घटलेबाजी और घोटालों का लेकर बदनाम हैं, लेकिन कभी किसी ने ये जानने की कोशिश नहीं की कि इनकी मासिक आय क्या है. इनके व्यवसाय के पीछे छिपे दर्द को समझने कोई आगे नहीं आया.
सभी को नहीं मिलते खाद्यान्न : नगर पर्षद क्षेत्र में लगभग 68 जन वितरण प्रणाली केंद्र है. जिसमें से सीमित जन वितरण प्रणाली केंद्र को ही खाद्यान्न आवंटित होते है. ऐसे केंद्रों की संख्या शहर में 35 है.
बाकी सभी केंद्र सिर्फ मिट्टी के तेल पर आश्रित हैं. थोक विक्रेता द्वारा डीलर्स को मिलनेवाले मिट्टी का तेल एक महीने में किसी को 100 लीटर, तो किसी को 125 और किसी को 250 लीटर आवंटित है. इनमें एक-दो प्रतिशत ही डीलर ऐसे हैं, जिन्हें मासिक किरोसिन एक हजार लीटर से अधिक मिला करता है. ऐसे में डीलर्स को इस मिट्टी के तेल पर एक रुपये प्रति लीटर का कमीशन मिलता है, जिससे हिसाब लगाया जा सकता है कि जब एक विक्रेता को 100 लीटर तेल मिल रहा है तो उसकी मासिक कमीशन एक सौ रुपये होगी और इसी प्रकार उसकी वार्षिक आय मात्र 1200 रुपये होती है. वहीं ढाई सौ लीटरवाले विक्रेताओं की वार्षिक आय महज तीन हजार है. ऐसे में घर चलाना तो दूर, दुकान का किराया भरना भी मुमकिन नहीं होता. ऐसी स्थिति में कई डीलर दूसरे व्यवसाय में भी लगे हैं.
डीलरों का दर्द बयां करता है मासिक चार्ट : जन वितरण प्रणाली विक्रेताओं को शहर के थोक केरोसिन विक्रेता बालचंद शांतिलाल से मिट्टी का तेल मिला करता है, जिसका डिपो बाइपास ओवरब्रिज के समीप और इसका कार्यालय रमेश चौक पर स्थित है. यहां से विक्रेताओं को मिलनेवाले केरोसिन तेल के मासिक चार्ट पर नजर डाली जाये, तो ये चार्ट शहर के डीलरों का दर्द बयां करता है. इनमें से इक्के -दुक्के डीलरों के खाते में एक हजार कार्ड से अधिक आते हैं. प्रत्येक कार्ड पर शहर में एक लीटर आवंटित है. ऐसे में जिन डीलरों के पास 100 से 300 राशन कार्ड हैं, उनकी मासिक आय इतनी कम है कि उससे उनका ठीक से पेट भी नहीं भर रहा. जिन गिने -चुने डीलरों को खाद्यान्न उपलब्ध होता है, उन्हें गेहूं पर 40 पैसे प्रति किलो और चावल पर 40 पैसे प्रति किलो की बचत होती है. ऐसे विक्रेता किसी तरह अपनी दुकान चला रहे हैं.
शहरी क्षेत्र में डीलरों को मिलनेवाले सीमित केरोसिन तेल से मासिक इनकम बहुत कम है. शहर में ऐसे गिने-चुने ही डीलर हैं, जिनके पाले में एक हजार से अधिक कार्ड हैं और उन्हें मासिक एक हजार लीटर से अधिक केरोसिन मिलता है. कई ऐसे डीलर हैं, जो अपने घर के इकलौते कमाउ सदस्य हैं. ऐसे डीलरों की स्थिति बयां करने लायक नहीं है, जो सिर्फ केरोसिन पर आश्रित हैं. उनके घर का राशन भी इसकी आमदनी से पूरा नहीं हो पाता. दुकान का किराया तो दूर. सरकार को चाहिए कि डीलरों को एक सम्मानजनक मानदेय दे.
अनिल गुप्ता, विक्रेता, नगर क्षेत्र औरंगाबाद
सरकार जानबूझ कर डीलरों को चोर बना रही है. जिन डीलरों को खाद्यान्न आवंटित नहीं है, वे केरोसिन तेल बेच कर आज के समय में अपना घर नहीं चला सकते और न ही बच्चों का लालन-पालन ठीक से कर सकते हैं. सरकार को विक्रेताओं के मानदेय पर गंभीर होने की जरूरत है.
डीलरों को उन्हीं के व्यवसाय से घर चल सके, इसके लिए सरकार को एक तय मानदेय लागू करना चाहिए. आज सरकार के खाद्यान्न योजना का लाभ गरीबों को मिल रहा है, उसका बहुत बड़ा श्रेय डीलरों को जाता है, जिनका नेटवर्क शहर व गांव से लेकर सुदूर ग्रामीण इलाके तक है.
जलाल हासमी गाजी, प्रांतीय सह मंत्री व राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य, फेयर प्राइस डीलर्स एसोसिएशन, औरंगाबाद
