सरकार की अनदेखी पर बैंक कर्मियों ने किया प्रदर्शन
ग्रामीण बैंक कर्मियों ने सप्ताह में पांच दिन आवकाश समेत कई मांगे रखी
आरा.
पूरे देश में 27 जनवरी को ग्रामीण बैंक और वाणिज्य बैंकों में एक दिवसीय हड़ताल रही. हड़ताल का मुख्य कारण कार्य बोझ और मांगों की अनदेखी है. बैंक कर्मियों का कहना है कि लंबे समय से वे 5-दिवसीय बैंक में साप्ताहिक कार्य दिवस लागू करने की मांग कर रहे हैं. आइबीए द्वारा इसकी अनुशंसा सरकार को भेजी गयी थी, लेकिन दो साल बीत जाने के बावजूद वित्त मंत्रालय इसे लागू नहीं कर रहा है.
जबकि आरबीआइ, नाबार्ड और एलआइसी में यह व्यवस्था पहले से लागू है. देश में वर्तमान में 28 ग्रामीण बैंक कार्यरत हैं, जिनके करीब 48 करोड़ ग्राहक हैं. इनमें अधिकतर ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्र के लोग शामिल हैं. ग्रामीण बैंक के माध्यम से ग्रामीणों की जमा पूंजी का रख-रखाव होता है और करीब 8 हजार करोड़ की लाभप्रद राशि का संचालन होता है. बैंक कर्मियों का आरोप है कि कुछ पूंजीपति इस बैंक में अपनी प्रविष्टि कर इसे निजीकरण करने का प्रयास कर रहे हैं, और सरकार भी इस दिशा में पहल करने की मंशा रखती है. बैंक कर्मियों ने निजीकरण का विरोध करते हुए समान कार्य के लिए समान वेतन और सुविधाओं की मांग की है. भोजपुर जिले में हड़ताल के कारण बैंकिंग कार्य प्रभावित रहा, जिससे करोड़ों रुपये का व्यवसाय बाधित हुआ. बिहार ग्रामीण बैंक के क्षेत्रीय कार्यालय, आरा के समक्ष बैंक कर्मियों ने पूरे दिन धरना और प्रदर्शन किया. इस कार्यक्रम में संघ के प्रमुख प्रतिनिधि एनएन ओझा, दीपक कुमार सिंह, जयशंकर चौबे, दिवाकर जी, कुणाल सिंह, रोहन तिवारी, अशोक कुमार, महेंद्र चौधरी, आशुतोष कुमार सिंह, रजनीश कुमार, शशी नाथ पांडे, अमन कुमार, रंजीत कुमार और बृजेश कुमार सहित कई अन्य शामिल हुए. बैंक कर्मियों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं, तो वे और आंदोलनात्मक कदम उठायेंगे. हड़ताल ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ग्रामीण बैंक की संरचना और कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा के लिए अभी लंबा संघर्ष जारी रहेगा.