मधुश्रावणी महापर्व शुरू, मैथिली गीत से कई गांव हुए मंत्रमुग्ध

पग-पग पोखर माछ मखान के लिए प्रसिद्ध मिथिला की प्राचीन जीवन पद्धति वैज्ञानिक रही है.

15 दिनों तक चलेगा मधुश्रावणी का महापर्व, सुहागिन सुनेंगी भगवान शिव विवाह की कथाएं

ताराबाड़ी. पग-पग पोखर माछ मखान के लिए प्रसिद्ध मिथिला की प्राचीन जीवन पद्धति वैज्ञानिक रही है. नवविवाहितों को सुखमय दाम्पत्य जीवन जीने की कला सिखाने वाला 15 दिवसीय पारंपरिक लोकपर्व मधुश्रावणी नहाय-खाय के साथ सोमवार से शुरू हो गया है. नव विवाहित महिलाएं के द्वारा किए जाने वाले इस पूजा का विशेष महत्व है. सोमवार को नवविवाहित महिलाएं प्रातः पवित्र गंगा स्नान कर पूजा-पाठ करने के पश्चात अरवा भोजन ग्रहण कर पर्व को शुरू कर चुकी हैं.

प्रियतम का रहता है इंतजार

स्वादिष्ट भोजन, सुंदर कपड़े, गहने, फूल लोढ़ने के क्रम में सखियों से मिलन, सावन का पड़ता फुहार व उमड़ते-घुमड़ते बादलों के बीच प्रियतम का याद आना स्वाभाविक है. ऐसे में नवविवाहितों को इस पर्व में अपने प्रियतम का बेसब्री से इंतजार रहता है. साधारणतः नवविवाहित इस अवसर पर ससुराल भी जाती हैं. पंडित हरिदेव झा बताते हैं कि ऐसी मान्यता है की माता पार्वती ने सबसे प्रथम मधुश्रवणी व्रत रखा था व जन्म जन्मांतर तक भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त करती रही. यह बात हर नवविवाहितों के दिलों दिमाग में रहता है. यही कारण है कि इस पर्व को पूरे मनोयोग से मनाती हैं. इस पर्व के दौरान माता पार्वती व भगवान शिव से संबंधित मधुश्रवणी की कथा सुनने का प्रावधान है. वहीं बासी फूल ससुराल से आए पूजन सामग्री दूध लावा व अन्य सामग्री के साथ नाग देवता विषहरी की भी पूजा की जाती है. माना जाता है कि इस प्रकार की पूजा-अर्चना से पति दीर्घायु होते हैं.

पूजा में 14 खंड कथा का किया जाता है श्रवण

मधुश्रावणी पूजन को काफी महत्व बताया जाता है. महिलाओं के द्वारा किये जाने वाला यह पर्व पति के दीर्घायु होने व उनके सुख-शांति के लिए की जाती है. पूजन के दौरान मैना पंचमी, मंगला गौरी, पृथ्वी जन्म, पतिव्रता, महादेव कथा, गौरी तपस्या, शिव विवाह, गंगा कथा, बिहुला कथा व बाल वसंत कथा सहित 14 खंडों में कथा का श्रवण किया जाता है. पूजन के सातवें, आठवें व नौवे दिन प्रसाद के रूप में घर जोड़ खीर व गुलगुला का भोग लगाया जाता है. प्रतिदिन संध्या काल में महिलाएं आरती सुहाग गीत व कोहवार गाकर भोले शंकर को प्रसन्न करने का प्रयत्न करती है.

गौरी विषहरा की आराधना करने वाली नवविवाहिता का सुहाग रहता है दीर्घायु

मिथलांचल का यह इकलौता ऐसा लोक पर्व है, जिसमें पुरोहित की भूमिका में महिलाएं होती हैं. इसमें व्रतियों को महिला पंडित न सिर्फ पूजा कराती हैं, बल्कि कथावचन भी करती हैं. व्रतियों पंडित को पूजा के लिए उन्हें दक्षिणा वस्त्र भी देती हैं. यह नवविवाहित के ससुराल से आती है. पंडित को वस्त्र व दक्षिणा देकर व्रती विधि-विधान व परंपरा के अनुसार व्रत करती हैं. कहा जाता है कि इस पर्व में जो पत्नी पति के साथ गौरी विषहरा की आराधना करती हैं, उसका सुहाग दीर्घायु होता है.

टेमी दागने की भी है परंपरा

पूजा के अंतिम दिन पूजन करने वाली महिला को कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ता है. टेमी दागने की परंपरा में नव विवाहिताओं को गर्म सुपारी, पान व आरती से हाथ व पांव को दागा जाता है. इसके पीछे मान्यता है कि इससे पति-पत्नी का संबंध मजबूत होता है.

मायके व ससुराल वालों के सहयोग से होती है पूजा

इस पूजन में मायके व ससुराल, दोनों पक्षों का सहयोग आवश्यक होता है. पूजन करने वाली नव विवाहिता ससुराल पक्ष से प्राप्त नये वस्त्र धारण करती हैं, जबकि प्रत्येक दिन पूजा समाप्ति के बाद भाई के द्वारा पूजा करने के लिए मधुश्रवाणी का हर सामान ससुराल से ही आता है. परंपरा रही है कि नव विवाहित के मायके के सभी सदस्यों के लिए कपड़ा, व्रती के लिए जेवरात, विभिन्न प्रकार के कपड़े, भोज के लिए सामान भी ससुराल से ही आता है. वहीं चना को अंकुरित कर इसे भेजे जाने का भी रिवाज रहा है. हर दिन पांच बिनी कथा भी व्रतियों को सुनायी जाती है. कहा जाता है कि जो महिला यह पांचों बिनी नियमित रूप से पढ़ती है, उसे हर प्रकार का सुख प्राप्त होता है.

पूजा में भाई का भी विशेष योगदान

इस पूजन में नवविवाहित के भाई का बहुत ही बड़ा योगदान रहता है. प्रत्येक दिन पूजा समाप्ति के बाद भाई अपनी बहन को हाथ पकड़ कर उठाता है. नवविवाहिता अपने भाई को इस कार्य के लिए दूध, फल आदि प्रदान करती है.

आज भी बरकरार है पुरानी परंपराएं

सदियों से चली आ रही मिथिला संस्कृति का महान पर्व आज भी बरकरार है. नव विवाहिता श्रद्धा भक्ति के साथ पूजा करती हैं. इस कर्म में महिलाएं समूह बना कर मैथिली गीत गाकर भोले शंकर को खुश करती हैं. आने वाले पीढ़ी को आगाह करती हैं कि इस परंपरा को बरकरार रखना है.

कहती हैं नव विवाहिताएं

नव विवाहित महिला मदनपुर निवासी मोहिनी शुक्ला, प्रीति कुमारी, ऋतु कुमारी आदि ने बताया कि यह पूजा एक तपस्या के समान है. इस पूजा में लगातार 16 दिनों तक नव विवाहित महिला प्रतिदिन एक बार अरवा भोजन करती हैं. इसके साथ ही नाग, नागिन, हाथी, गौरी शिव आदि की प्रतिमा बना कर प्रतिदिन विभिन्न प्रकार के फूलों फलों व मिठाइयों से पूजन किया जाता है. सुबह नाग देवता को दूध, लावा का भोग लगाया जाता है.

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