रंगोली बनाकर मतदाताओं को किया जागरूक

arariya election news 2025

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arariya election news 2025 कुर्साकांटा. विधान सभा चुनाव में अधिक से अधिक मतदान करने, मतदान को प्राथमिकता में शामिल करने, मतदान को स्वस्थ लोकतंत्र के रूप में स्थापित करने को लेकर स्वीप कार्यक्रम के तहत सोमवार को प्रखंड कार्यालय में रंगोली के जरिये मतदाताओं को जागरूक किया गया. बीडीओ नेहा कुमारी ने बताया रंगोली के जरिये आम मतदाताओं को संदेश दिया गया है कि मेरा वोट मेरा अधिकार, पहले मतदान फिर जलपान. इसके साथ ही आम मतदाताओं को जागरूक किया जा रहा है कि मतदान आपका मजबूत आधार है. जिससे आपका लोकतंत्र मजबूत होता है. इस मौके पर आइसीडीएस कार्यालय के एलएस सत्यम कंचन, निभा भारती, जयंती विश्वास, आंगनबाड़ी सेविका कृष्णा रानी भारती, प्रेमा कुमारी, रूबी सिंह, सीता देवी, सपना कुमारी, ललिता देवी समेत दर्जनों कर्मचारी मौजूद थे.2

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जहां रात हो जाती, वहीं सो जाते थे नेता व कार्यकर्ता

आज तो कार्यकर्ताओं को चाहिए चिकन, मटन, मछली, पहले तो भूंजा, सत्तू खाकर करते थे प्रचार

फारबिसगंज. भारत-नेपाल सीमा पर स्थित फारबिसगंज विधानसभा की चुनावी राजनीति ने 1952 के बाद से लंबी दूरी तय की है, लेकिन उस यात्रा के कुछ पड़ाव आज भी स्वर्णिम यादों की तरह हैं. आज जहां चुनावी मैदान हाईटेक सर्वे, डिजिटल प्रचार व हेलीकॉप्टरों की गूंज से भरा है, वहीं एक दौर वह भी था जब सादगी और कार्यकर्ताओं के समर्पण से चुनाव लड़ा जाता था. एक समय था जब नेता व कार्यकर्ता रात होते हीं गांव में हीं रात गुजारते थे. किसी के दरवाजे पर जो मिला व खाते व सो जाते थें. अब समय बहुत बदल गया है. फारबिसगंज के छुआपट्टी निवासी सह नप के पूर्व उप मुख्य पार्षद 68 वर्षीय राज कुमार अग्रवाल, साहित्यिक हेमंत यादव, अरविंद मंडल आदि ने बीते दौर के चुनाव प्रचार को याद करते हुए कहते हैं कि एक समय राजनीति में कार्यकर्ताओं का जोश और जुनून इतना गहरा था कि वे खुद आगे बढ़कर प्रचार की कमान व जिम्मेदारी मांगते थे. उन्हें पार्टी का झंडा ढोने से कोई गुरेज नहीं होता था. वे कहते हैं कि पुराने दौर में कार्यकर्ता भूंजा, सत्तू खाकर प्रचार में जाते थे, आज के दिन तो कार्यकर्ता से लेकर वोटरों तक को चिकन, मटन, पैसा घर-घर पहुंच रहा है. बताते हैं कि उस दौर में जब अंधेरा गहराता था, तब गांव की चौपालों पर पेट्रोमेक्स जलाई जाती थी. उस झिलमिल रोशनी में जब नेताजी भाषण शुरू करते थे, तो भीड़ देर रात तक जमी रहती थी. गांव में घूर (अलाव) के पास बैठकी में चुनावी चर्चा खूब जमती थी.

पहले तांगा, रिक्शा, साइकिल व जीप से होता था प्रचार

प्रचार का यह सिलसिला देर रात एक दो बजे तक तक चलता था. पहले के चुनाव में तांगा, रिक्शा, साइकिल, बाइक, जीप का दौर था. वोटरों को तांगा व रिक्शा से बूथ तक पहुंचाते थे. जिनको चलने में दिक्कत थी, उन्हें बूथ के गेट तक उतरने की अनुमति रहती थी, आज सब कुछ बदल गया है. आज का दौर पूरी तरह हाईटेक हो चुका है. वे कहते हैं कि यह केवल चुनाव प्रचार के तरीकों का बदलाव नहीं है, बल्कि राजनीति में धनबल के प्रभाव का उदाहरण है. आज चुनावी सभा को लेकर काफी खर्च किया जाता है.32]33

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Author: PRAPHULL BHARTI

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