मजबूरी . प्रसव के बाद न वस्त्र िमला न खाना, जब ठंड लगी तो लिया अलाव का सहारा
नवजात को ठंड से बचाने के लिए गरम कपड़ा नहीं रहने के कारण कारी देवी ने अलाव का सहारा लिया. आग की गरमी से नींद में आ गयी थी. इसी दौरान उसके शरीर में आग लग गयी. जब तक उसे होश आया तब तक वह पचास फीसदी जल चुकी थी. परिजनों ने इलाज के लिए सदर अस्पताल में भर्ती कराया, वहां से चिकित्सकों ने कटिहार रेफर कर दिया. कारी के परिजनों के पास इतना पैसा नहीं है कि वह कटिहार में इलाज करा सके. मजबूरी में उसे घर ले आया, जहां कारी जिंदगी से जंग लड़ रही है.
अररिया : भयानक शीतलहर उसके बाद हाड़ कंपा देने वाली ठंड का एहसास और तन पर वस्त्र नहीं उसके बाद ठंड से बचने की अंतिम आस अलाव की आग कैसे बसा बसाया हुआ घर उजाड़ देती है इसका साक्षात उदाहरण कारी देवी है. अलाव की आग से शरीर को गरम करने की मजबूरी ने कारी देवी पति मनोज ऋषिदेव के लगभग 50 प्रतिशत से ज्यादा शरीर को अपनी चपेट में ले लिया है. अब तक तो कारी की सांसें चल रही है लेकिन इस बात की उम्मीद कब तक रहेगी कहना मुश्किल है. क्योंकि गरीबी के कारण कारी का समुचित इलाज नहीं हो पा रहा है. सबसे बड़ी बात तो यह है कि अगर असमय ही कारी के साथ कुछ बुरा हो जाता है,
तो उसकी गोद में पल रही 31 दिन की बच्ची का क्या होगा. बड़ी उम्मीद के साथ तीन संतानों के गुजर जाने के बाद भगवान ने उसके गोद में पुत्री के रूप में एक संतान दिया था. रो-रो कर अधजले शरीर के साथ ही कारी कहती है कि अपने ममता की छांव में जब तक वह अपनी पुत्री को लाड़ दुलार कर पाती तब तक अग्निदेव ने उसके शरीर को ही अपने आगोश में ले लिया. सही भी है अगर कारी का समुचित इलाज नहीं हुआ तो कारी का शरीर संक्रमण की गिरफ्त में आ जायेगा. बाद में उसका इलाज हो पाना कठिन होगा.
आग की तपिश जब बदन तक पहुंचा, तब एहसास हुआ कारी को
शहर के वार्ड संख्या 11 मुसहरी टोला में घटी अपने साथ की घटना को बताते हुए कारी फफक पड़ती है. 22 नवंबर को कारी देवी के पड़ोस में ही एक शादी थी. वह अपनी नौ दिन की बच्ची को गोद में लिये अपनी झोपड़ी नुमा घर में ठंड से निजात पाने की उपाय ढूंढ़ रही थी. बूढ़ी सास भीख मांग कर घर लौटी थी. पति मनोज ऋषिदेव पड़ोस में हो रही शादी में मशगूल था. मुक्कमल भोजन नहीं मिल पाने के कारण वह कमजोर भी हो गयी थी. प्रसूता भी थी. जाहिर सी बात है उसे क्या दर्द होता होगा. यह तो कोई औरत ही समझ सकती है. फिर भी नन्ही सी बच्ची को ठंड न लगे, इसके लिए उसने औढ़ने के कपड़े ढूंढ़े लेकिन हाथ में सिर्फ फटी-पुराने गुदरी ही आ रहे थे.
किसी तरह से शरीर पर लिया लेकिन ठंड का एहसास घटा नहीं. फिर किसी तरह बाहर निकली और जो हाथ में मिला उस जलावन को लेकर झोपड़ी में आयी. आग जलायी. शरीर कुछ गरम हुआ. देखते ही देखते कारी की आंखें लग गयी. वह नींद में थी लेकिन कारी के शरीर के वस्त्रों में आग बढ़ती ही जा रही थी. जब आग की तपिश कारी के बदन तक पहुंची तो वह जागी. हल्ला किया. आवाज सुन कर आस पड़ोस के लोग जमा हुए. सदर अस्पताल ले जाया गया.
कोई मदद को नहीं हुआ तैयार
सदर अस्पताल से भी नहीं हुआ समुचित इलाज
एक सप्ताह तक कारी का इलाज अस्पताल में चला. पति मनोज ऋषिदेव ने बताया कि दवा का लंबा पुरजा फिर उस दवा को खरीद कर बाहर से लाने की जद्दोजहद की जंग में पैसा हावी हो गया. वह अपनी पत्नी की बीमारी में इलाज का खर्च नहीं जुटा पाने के कारण बेबस होकर हर तरफ मदद के लिए हाथ पसारता. लेकिन कोई उसे मदद करने को तैयार नहीं था. इधर, सदर अस्पताल के चिकित्सकों ने कारी को केएमसीएच कटिहार रेफर कर दिया. जो मनोज अपने घर में अपनी पत्नी का इलाज नहीं करा पा रहा था.
वह भला कैसे कटिहार जाता व अपनी पत्नी का उपचार कराता. थक हार कार वह अपनी बीवी व बच्ची के साथ घर चला आया. जहां 50 प्रतिशत से भी ज्यादा जल चुकी कारी अपने जिंदगी की जंग को जीतने की कोशिश में लगी हुई है.
दादी की गोद में नन्ही बच्ची, पीछे झोपड़ी जहां रह रही है कारी.
कारी घर में लड़ रही जिंदगी से जंग
सांस चल रही है लेकिन बदन में इतनी ताकत नहीं है कि 31 दिन की बच्ची को कारी पिला सके दूध
सदर अस्पताल ने भी नहीं किया इलाज, थमा दिया रेफर का पुरजा
कटिहार पहुंचाने के लिए दिया जायेगा एंबुलेंस
यह प्रयास रहता है कि गरीब से गरीब मरीज के उपचार में किसी प्रकार की कोताही नहीं बरती जाये. खास कार बर्निंग पेशेंट पर विशेष ध्यान दिया जाता है. अगर यहां मरीज की स्थिति नाजुक होती है तब ही उसे उपचार के लिए बाहर रेफर किया जाता है. अगर मरीज उनके अस्पताल में इलाज के लिए आता है तो उसे बाहर पूर्णिया या कटिहार मेडिकल कॉलेज तक पहुंचाने के लिए एंबुलेंस उपलब्ध कराया जायेगा.
डॉ एनके ओझा, सीएस
