तरक्की की दौड़ में मंद पड़ती जा रही ग्रामीण संस्कृति

अररिया : समय के साथ चतुर्दिक विकास की नयी इबारत लिखी जा रही है. बिजली की रोशनी से जगमग गांव, सड़कों का जाल, अधारभूत संरचनाओं का निर्माण, लोगो को शुद्ध पेयजल, पढ़ने की ललक पैदा करने की हर कोशिश की जा रही है. कल तक भूत बंगला बना था जो अस्पताल, आज वहां मरीजों का […]

अररिया : समय के साथ चतुर्दिक विकास की नयी इबारत लिखी जा रही है. बिजली की रोशनी से जगमग गांव, सड़कों का जाल, अधारभूत संरचनाओं का निर्माण, लोगो को शुद्ध पेयजल, पढ़ने की ललक पैदा करने की हर कोशिश की जा रही है. कल तक भूत बंगला बना था जो अस्पताल, आज वहां मरीजों का भरमार रहता है.

घर-घर में टीवी, हाथो में बेशकीमती एंड्रायड मोबाइल, फर्राटा मारते सड़को पर बाइक, लोगों के जीवनशैली में आये बदलाव को बयां करता है. यह समय का तकाजा है. लेकिन इस बीच जो हम खोते जा रहे हैं वह है हमारी सांस्कृतिक समाजिक विरासत. जिससे इलाके की पहचान थी. कही न कहीं यह खत्म होने के कगार पर आ गया है.
गांव का गंवई माहौल पर पड़ रहा असर : पर्व- त्योहारों के मौसम आते ही गांव का माहौल कुछ अलग हो जाता था. उत्साह से लबरेज बच्चों के चेहरों पर खुशियों की लकीरें, कोई केला का पत्ता लाकर देता था. तो कोई दूध का इंतजाम करता था. दशहरा में कमल का फूल लाने कोशों दूर जलाशयों में जाने का आनंद, आम बागानों में झूला झूलते बच्चों की किलकारियों की गूंज अब कानों तक नही आती है और न ही आंखों को दिखाई देती है. ऐसे माहौल के खत्म होने का बुरा असर अब सामने आने लगा है. स्नेह, सद्भाव, प्रेम की डोर को मजबूती देने के लिये पहल होनी चाहिए. पनप रहे विषैले डंक को कुचलने की जरूरत महसूस किया जा सकता है.
नेहरू युवा केंद्र को मिली है ग्रामीण संस्कृति को जीवंत करने की जिम्मेदारी
हालांकि नेहरू युवा केंद्र इन मसलों को लेकर जागरूक है. इनके अनुसार ऐसे ग्रामीण कलाकारों को चिन्हित करने का निर्देश मिला है. बहरहाल सांस्कृतिक विरासत बच पायेगा या नही, यह तो आनेवाला कल ही बतायेगा.
खेलकूद की परंपरा हो रहा कमजोर
पहले गांव में स्कूल से आने के बाद बच्चे कबड्डी, लुका छिपी, फुटबॉल, राजारानी आधारित कई खेल खेलते नजर आते थे. दादा, चाचा सभी बच्चों को खेल को ले उत्साहित करते थे. झगड़ा झंझट न हो, इस पर भी नजर रखते थे. खास बात यह होती थी कि गांव के हर जाति समुदाय के बच्चे एक साथ खेलते थे. इससे समाजिक विद्वेष की भावना पनपती हीं नहीं थी. आज बात कुछ इतर है. इसे समझा जा सकता है.
ग्रामीण नाच की परंपरा हो रही खत्म
सीमांचल के गांव में पहले नाच को खास तवज्जो दिया जाता था. इससे सामाजिक सद्भाव की डोर मजबूत होती थी. समाजिक समरसता यह कि नाच देखने आने वालों में कोई विभेद नही होता था. शाम होते ही हर जाति समुदाय के लोग नाच का आनंद लेने के लिए एक साथ बैठते थे. घुघली घटना, शीत बसंत, विद्यापति, राजा हरिश्चंद्र, राजा भगीरथ, बाबा गोरखनाथ, अल्हा रूदल सहित अन्य नाच होते रहता था. यह पर्व के मौसम में कभी यहां तो कभी वहां चलता रहता था.
कभी इस टोले में तो कभी उस टोले में. नाच के दौरान कोई बेजा हरकत न हो, कोई खलल न डाले, इसको लेकर हर व्यक्ति की सम्मानित नजर रहती थी. यह व्यवस्था अब खत्म होने के कगार पर है. टीवी, इंटरनेट ने सामाजिक समरसता को, भाईचारगी को, एकाकी बना दिया है. इससे समाजिक संबंधों का डोर कमजोर पड़ता जा रहा है.

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