सड़क पर जिंदगी की जंग

बाढ़ का कहर . पीड़ितों की आंख से छलक रहा आंसुओं का सैलाब लोगों के सामने उसका आशियाना उजड़ गया. आंखों के सामने मवेशी व तैयार अनाज बह गये. बचे हैं सिर्फ शरीर पर पहने कपड़े व चंद बर्तन. सड़कों पर वाहनों की जगह बाढ़ पीड़ितों का डेरा बना है. जिंदगी को बचाने के लिए […]

बाढ़ का कहर . पीड़ितों की आंख से छलक रहा आंसुओं का सैलाब

लोगों के सामने उसका आशियाना उजड़ गया. आंखों के सामने मवेशी व तैयार अनाज बह गये. बचे हैं सिर्फ शरीर पर पहने कपड़े व चंद बर्तन. सड़कों पर वाहनों की जगह बाढ़ पीड़ितों का डेरा बना है. जिंदगी को बचाने के लिए साथ में लाये भींगे अनाज को सुखाने की जुगत लगा रहे हैं.
अररिया : पांच दिन पहले आया सैलाब जिलावासियों को तबाही का मंजर दिखाते हुए आगे निकल गया. इस सैलाब के गुजर जाने बाद लोगों का सामना अब दूसरे सैलाब से होने लगा है. सैलाब ने अपने पीछे तबाही और बर्बादी का जो मंजर छोड़ा. बीतते दिनों के साथ अब उसकी तस्वीर साफ दिखायी देने लगी है. इसे देख लोगों के आंखों का सैलाब छलकने लगा है.
लोगों के आंखों के सामने उनका आशियाना उजड़ गया. उनके मवेशी व मेहनत से खेतों में मजदूरी कर तैयार अनाज भी सैलाब के साथ बह गये. बचे तो सिर्फ शरीर में पहने हुए कपड़े और चंद बर्तन.
जिला मुख्यालय की अधिकांश आबादी फोर लेन सड़क एनएच 57 पर बसी है. इससे वाहनों की रफ्तार धम गयी है. सड़क पर वाहनों की जगह अब बाढ़ से उजड़े परिवारों का डेरा जमा हुआ है. जिंदगी की जंग को जारी रखने के लिए लोग अपने साथ लाये अनाज जो बाढ़ के पानी में भींग गये. उन्हें सुखाने की जुगत में लगे हैं. बाढ़ की विभीषिका ने आदमी और जानवर के बीच की दूरी मिट गयी है. एक ही खाट पर कहीं बकरी और बच्चे सोये दिखते हैं, तो कहीं नंगी जमीन पर आदमी और जानवर लेटे मिलते हैं. जिले में आयी बाढ़ ने ऐसी स्थितियां पैदा की है. जिससे इंसान और जानवर के बीच का फर्क बिल्कुल खत्म हो गया है. जिला मुख्यालय के गोढ़ी चौक, जीरो माइल पर मेले जैसा नजारा है. लेकिन यह नजारा किसी उत्सव का नहीं. बल्कि बाढ़ से पीड़ित परिवारों के तबाही का नजारा है. यहां जिला मुख्यालय के दस हजार से अधिक की आबादी बाढ़ में अपना सब कुछ गंवा देने के बाद सड़कों पर आ गये हैं. बाढ़ की विनाशलीला को झेलने के पांच दिन बाद अब इन लोगों के सामने भोजन व पीने के पानी की विकट समस्या आ खड़ी हुई है.
खिचड़ी की हो जाती है लूट
सड़क के किनारे ही प्रशासन द्वारा खिचड़ी बंटता दिखा. इसे लेने के लिए लोगों के बीच मारामारी मची थी. इस कारण इसे प्राप्त करने की जंग से महिलाएं किनारे खड़ी थी. लोगों ने बताया कि दिन में दो बार खिचड़ी बंटती है. लेकिन हर बार इसकी लूट हो जाती है. लड़ाई-झगड़ों के बीच महज कुछ लोगों को ही इसका लाभ मिल पाता है. अररिया कॉलेज परिसर में प्रशासन द्वारा चलाये जा रहे राहत शिविर का नजारा इससे कुछ अलग दिखा. शिविर में सन्नाटा पसरा था. पेड़ के किनारे मनरेगा के कुछ अधिकारी आराम भरमाते मिले. पूछने पर बताया कि यहां सिर्फ खाना बनता है. जो लोगों के बीच बांटी जाती है. बांटने की जिम्मेदारी किसकी है. इस सवाल का जवाब उनके पास नहीं था. इधर शिविर में खाना बना रहे रसोइयों ने राशन-पानी के अभाव की समस्या से अवगत कराया. पानी की समस्या तो और गंभीर है. हाइवे पर शरण ले रहे लोगों को प्लास्टिक भी नहीं मिली है. लोगों ने सिर ढंकने के लिए अपने स्तर से व्यवस्था की है. पीड़ितों के सामने बच्चे ओर मवेशी के खाने की चिंता गंभीर है. कुछ लोगों ने अपने पैसे से तिरपाल और प्लास्टिक खरीद लिया है. अधिकांश परिवार बोरा-चट्टी टांग कर धूप ओर बरसात से जैसे-तैसे खुद को बचा रहे हैं. कुछ पूछने पर आक्रोश से भरे लहजे में 12 नंबर वार्ड की नूनिया देवी कहने लगी रविवार की सुबह अचानक पानी आ गया. इससे पहले की कोई उपाय करते, देखते ही देखते पानी की तेज धार में सब कुछ बहने लगा. बकरी, मुर्गा-मुर्गी भी बहने लगे. घर में रखा अनाज भी नहीं निकाल सकी. फोरलेन के डिवाइडर पर टंगे एक बोरा के अंदर बीवी जरीन अपने तीन बच्चों के साथ सूखा चूड़ा फांकते मिली. पूछने पर बताया कि कल शाम से कुछ खाया नहीं है. भूख से बच्चे रो रहे हैं. बगल में खिचड़ी बंट रही थी. जब तक लेने पहुंची तब तक खिचड़ी खत्म हो चुका था. खाली हाथ लौटना पड़ा. मर्द कहीं मजदूरी कर पैसे की जुगाड़ में गये हैं. उनके आने के बाद ही खाना का कोई जुगाड़ हो पायेगा. लेकिन पता नहीं वह आयेगा कब !

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