BJP का गेमचेंजर मूव, सम्राट चौधरी के साथ बिहार में नए युग की शुरूआत

Bihar News: बिहार के सीएम पद से नीतीश कुमार का इस्तीफा, सम्राट चौधरी का NDA विधायक दल का नेता चुना जाना, और फिर सीएम पद की शपथ लेना यह सब एक दिन में जरूर हो गया है, लेकिन इसकी नींव दशकों पहले रखी गई थी. यह किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है बस फ़र्क यह है कि इसमें कोई शॉर्टकट नहीं था.

Bihar News: कुछ तारीखें सिर्फ कैलेंडर में नहीं, इतिहास में दर्ज होती हैं. 14 अप्रैल 2025 बिहार की राजनीति के लिए वैसी ही तारीख है. जिस दिन देश अपने संविधान निर्माता बाबा साहेब अंबेडकर को नमन कर रहा था, उसी दिन बिहार की सत्ता की चाबी उन हाथों में पहुँची जिनकी कल्पना पांच दशक पहले शायद किसी ने नहीं की होगी. नीतीश कुमार का इस्तीफा, सम्राट चौधरी का NDA विधायक दल का नेता चुना जाना यह सब एक दिन में हुआ जरूर, लेकिन इसकी नींव दशकों पहले रखी गई थी.

बिहार में बीजेपी: संघर्ष से सत्ता तक

बिहार में बीजेपी की राजनीतिक यात्रा किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है बस फ़र्क यह है कि इसमें कोई शॉर्टकट नहीं था. 1980 के दशक मेंपार्टी की शुरुआत मात्र 21 सीटों से हुई. कैलाशपति मिश्र जैसे नेता पहचान के लिए जूझ रहे थे. 1985 में हालात और बिगड़े, उस दौर में बिहार की राजनीति पर कुछ चुनिंदा चेहरों का एकाधिकार था और बीजेपी हाशिये पर खड़ी एक उम्मीद भर थी.

लेकिन 1990 के दशक में नए सामाजिक समीकरण बने, मंडल-कमंडल की राजनीति ने पूरे देश का परिदृश्य बदला. बीजेपी ने इस दौर में धीरे-धीरे अपनी जमीन तैयार की. ना हड़बड़ी में, न शोरगुल में, बल्कि संगठन की ताकत से धीरे-धीरे अपना विस्तार किया. 2000 के बाद सुशील कुमार मोदी और नीतीश कुमार के गठबंधन ने बीजेपी को एक नई रफ़्तार दी. 2010 में 91 सीटें लाना बीजेपी के लिए यह एक ज़बरदस्त छलांग थी. फिर 2020 में 74 और 2025 में 89 सीटें लाकर बीजेपी ने सभी को चौंका दिया. जो लोग कहते हैं कि बीजेपी को बिहार में मुख्यमंत्री पद मिल गया, वो गलत कहते हैं. यह मिला नहीं यह कमाया गया है. सीट दर सीट, बूथ दर बूथ, दशक दर दशक.

सम्राट चौधरी के जरिए रणनीतिक संदेश

बिहार में बीजेपी पर लंबे समय से एक ठप्पा लगाने की कोशिश होती रही कि ये सवर्णों की पार्टी है. विपक्ष ने इस नैरेटिव को बड़ी मेहनत से गढ़ा और चुनाव दर चुनाव इस्तेमाल किया. लेकिन सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाकर बीजेपी ने वह काम कर दिखाया जो विपक्ष को कभी उम्मीद नहीं थी उन्हीं की भाषा में, उन्हीं के मैदान में, जवाब दे दिया. सम्राट चौधरी कोइरी-कुशवाहा (OBC) समुदाय से आते हैं. 16 नवंबर 1968 को मुंगेर ज़िले के लखनपुर गाँव में जन्मे सम्राट चौधरी की राजनीतिक विरासत भी उतनी ही मज़बूत है. पिता शकुनी चौधरी सात बार सांसद/विधायक रहे, माँ पार्वती देवी भी विधायक रहीं. लेकिन इन्हें सिर्फ विरासत का नेता कहना अन्याय होगा. 1990 से सक्रिय राजनीति में तीन दशकों से अधिक का अनुभव, वित्त, गृह, खेल, पंचायती राज जैसे अहम मंत्रालय, उपमुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष का पद. यह ट्रैक रिकॉर्ड किसी परिचय का मोहताज नहीं.

एक तीर से तीन निशाने

1. OBC राजनीति के केंद्र में सीधी एंट्री

दशकों से OBC वोटबैंक पर लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार का दबदबा रहा है. यह वोटबैंक बिहार की राजनीति की रीढ़ है. सम्राट चौधरी को आगे लाकर बीजेपी ने इस स्पेस में सिर्फ दस्तक नहीं दी बल्कि दरवाज़ा खोलकर अंदर आ गई है. अब विपक्ष के लिए बीजेपी OBC विरोधी है वाला तर्क चलाना इतना आसान नहीं रहेगा.

2. मुंगेर से मुख्यमंत्री मतलब गढ़ में सेंध

मुंगेर और उसके आसपास का इलाका पारंपरिक रूप से विपक्ष का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है. वहीं से बीजेपी का मुख्यमंत्री आना यह सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से विपक्ष के लिए विनाशकारी है. संदेश साफ है कि बीजेपी अब सिर्फ मौजूदगी नहीं, प्रभुत्व की राजनीति कर रही है.

3. बेदाग प्रशासनिक छवि

राजनीति में क्लीन इमेज कहना आसान है, निभाना बेहद मुश्किल. सम्राट चौधरी ने वित्त मंत्री से लेकर गृह मंत्री तक हर पद पर बिना किसी गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप के काम किया है. बिहार जैसे राज्य में, जहाँ राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप रोज का खेल है, यह अपने आप में एक उपलब्धि है.

काम से बनी पहचान

सम्राट चौधरी के नेतृत्व की सबसे बड़ी पहचान यही मानी जा रही है कि फैसले सिर्फ फाइलों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि जमीन पर असर दिखाते हैं. यही वजह है कि उनके हालिया कदमों को घोषणाओं की राजनीति से आगे बढ़कर “परफॉर्मेंस की राजनीति” के तौर पर देखा जा रहा है. 2024-25 का 2.79 लाख करोड़ का बजट बिहार के इतिहास का सबसे बड़ा बजट है. लेकिन यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, यह उस महत्वाकांक्षा का संकेत है, जिसमें राज्य खुद को तेज विकास की राह पर ले जाना चाहता है. इसके साथ ही 30,547 सरकारी पदों का सृजन, बेरोजगारी जैसी पुरानी समस्या पर सीधा और ठोस प्रहार माना जा रहा है.

गृह मंत्रालय में भी उनकी कार्यशैली साफ तौर पर दिखी है. अपराधियों पर बिना भेदभाव सख्त कार्रवाई, महिला सुरक्षा के लिए अभय ब्रिगेड और पिंक पॉलिसिंग जैसे कदम और न्याय व्यवस्था को तेज करने के लिए 100 फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना. न्याय में देरी ही अन्याय है- इस सोच को नीति में बदलने की कोशिश साफ नजर आती है. साथ ही, हर थाने में जनता दरबार की पहल पुलिस को अधिक जवाबदेह बनाने की दिशा में एक अहम कदम है. पुलिसकर्मियों के परिवारों के लिए आवासीय विद्यालय की स्थापना यह दिखाती है कि सिस्टम को मजबूत करने के साथ-साथ उससे जुड़े लोगों का भी ख्याल रखा जा रहा है.

उम्मीदें और अपेक्षाएं

करीब 46 साल की राजनीतिक यात्रा के बाद भारतीय जनता पार्टी का बिहार में अपना मुख्यमंत्री होना सिर्फ एक पार्टी की उपलब्धि नहीं, बल्कि राज्य की राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है. सम्राट चौधरी के नेतृत्व में कुछ बातें स्पष्ट दिखती हैं- डबल इंजन सरकार को अब वास्तविक गति मिल सकती है, जहां केंद्र और राज्य के बीच तालमेल और मजबूत होगा. सामाजिक संतुलन को लेकर भी संदेश साफ है कि OBC, EBC और दलित समुदायों को प्रतिनिधित्व और भागीदारी का भरोसा दिया जा रहा है.

लेखक: एडवोकेट राकेश कुमार सिंह चेयरमैन- भारत उत्थान संघ, खाना चाहिए फाउंडेशन, महाराणा प्रताप फाउंडेशन

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लेखक के बारे में

By Pritish Sahay

12 वर्षों से टीवी पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सेवाएं दे रहा हूं. रांची विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग से पढ़ाई की है. राजनीतिक, अंतरराष्ट्रीय विषयों के साथ-साथ विज्ञान और ब्रह्मांड विषयों पर रुचि है. बीते छह वर्षों से प्रभात खबर.कॉम के लिए काम कर रहा हूं. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काम करने के बाद डिजिटल जर्नलिज्म का अनुभव काफी अच्छा रहा है.

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