-हरिवंश-
बिहार में मैट्रिक व इंटर के इम्तिहान के दौरान नकल की कुछ ऐसी तसवीरें आयीं, जो देश-दुनिया तक पहुंच गयीं. फेसबुक, ट्विटर वगैरह के जरिये इन्हें कुछ यों साझा किया गया, मानो किसी रहस्य का उद्घाटन हुआ हो और हम भारतीय अपने देश, खासकर हिंदी पट्टी में शिक्षा के हाल की हकीकत से वाकिफ न हों. सारी चर्चा इस पर सिमटी रही कि बिहार में क्या प्रशासन इतना ढीला है कि खुलेआम नकल होती है?
पर किसी ने यह विचार करने की जहमत नहीं उठायी कि हमारी शिक्षा व्यवस्था इस हाल तक पहुंची कैसे. नकल की चर्चा प्रकरण के लगभग महीने-डेढ़ महीने पहले, 7 फरवरी, 2015 को वरिष्ठ पत्रकार और सांसद, हरिवंश ने एक वक्तव्य जैन कॉलेज, आरा में दिया था. पूर्ववर्ती छात्रों के सम्मेलन में दिये गये इस मूल वक्तव्य में कुछ तथ्य और जोड़ कर, शिक्षा की मौजूदा स्थिति पर यह विचार आपके सामने है.
सबसे पहले उन प्राचार्यों के प्रति आदर-सम्मान, जो आज सम्मानित हुए हैं. क्योंकि ये वो लोग हैं, जो हजारों लोगों को बनाते हैं, शिक्षा की रोशनी से. इनके माध्यम से निकले छात्र ही दुनिया और समाज को नया रास्ता दिखाते हैं. पुन: इनका अभिनंदन. किसी भी समाज या देश-दुनिया को आगे ले जाते हैं, उसके इंस्टीट्यूशंस.
आज पूरी दुनिया में आश्चर्य का विषय है कि महज 30-40 वर्षों में चीन, अमेरिका जैसे स्थापित देश को पीछे छोड़ कर कैसे आगे बढ़ने की स्थिति में है? इतनी तेजी से आर्थिक विकास कैसे संभव हुआ? चीन यह भी जानता है कि अमेरिका से आगे बढ़ने के लिए अब उसे क्या करना है? उसको मालूम है कि अमेरिका की असली ताकत उसके इंस्टीट्यूशंस (संस्थाएं) हैं.
उसके सेंटर ऑफ एक्सलेंस (श्रेष्ठ अध्ययन केंद्र) हैं. चीन समझता है कि जब तक इस तरह की श्रेष्ठ शिक्षण संस्थाएं, शोध के बेहतर संस्थान, अमेरिका में रहेंगे, तब तक दुनिया में चीन का वर्चस्व नहीं हो सकता. हम सब जानते हैं कि आधुनिक दौर में दुनिया, एक नॉलेज सोसायटी बन रही है, जहां ज्ञान ही संपदा यानी असली पूंजी है. चीन ने इस दिशा में जो किया, वह हमारे लिए सबक है. चीन, मूलत: साम्यवादी है. वैचारिक आधार पर उसे सबसे अधिक नफरत है, पूंजीवादी देश अमेरिका से. हालांकि कम्युनिस्ट व्यवस्था के तहत ही उसने मार्केट इकानॉमी अपनायी. पर चीन ने कहा कि हम अपने यहां भी अमेरिका की तरह सेंटर ऑफ एक्सलेंस बनायेंगे.
चीन, जो अमेरिका से वैचारिक मतभेद रखता है, नफरत करता है, वही चीन कहता है कि अध्यापक के तौर पर दुनिया के अच्छे लोगों या नोबल पुरस्कार पाये अमेरिकी विद्वानों को अमेरिका से बुलायेंगे, अपने छात्रों को पढ़ाने के लिए. मुंहमांगी कीमत देकर. ताकि सर्वश्रेष्ठ अमेरिकी शिक्षकों से पढ़े चीनी छात्र, दुनिया के अव्वल छात्र बनें. क्योंकि भविष्य की दुनिया में उसी देश का वर्चस्व होगा, जिसके पास ज्ञान की ताकत होगी.
मेरे एक वरिष्ठ व आत्मीय मित्र हैं, डॉ नागेश्वर प्रसाद शर्मा. वे बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के अध्यक्ष रहे हैं. शिक्षा पर बहुत गहराई से काम करते रहे हैं. कई किताबें लिखी हैं. बिहार में उच्च शिक्षा के संदर्भ में आठ सौ पन्नों की वह एक किताब लिख रहे हैं, जो बहुत जल्दी प्रकाशित होनेवाली है. उन्होंने बिहार की स्थिति से अवगत कराते हुए दो-चार बातें बतायीं, जिसे मैं संक्षेप में बता रहा हूं. बकौल शर्मा जी, 1967 से ही उच्च शिक्षा की जो अरथी बिहार में निकली, वह आज भी जारी है. किसने क्या किया, मैं इस पर नहीं जाना चाहता.
बिहार में आज 14,000 से अधिक शिक्षकों के स्वीकृत पद हैं. इनमें करीब छह हजार फिलहाल कार्यरत हैं. लेकिन एक अनुभवी आदमी (मैं नहीं, प्रो शर्मा) कह रहा है कि इन छह हजार शिक्षकों में से मात्र एक हजार ही शिक्षक ऐसे हैं, जो पढ़ाने योग्य हैं. पर मैं इन सवालों पर नहीं जा रहा हूं. मैं बताना चाहता हूं कि इस गोष्ठी का जो दूसरा पहलू है कि इसका निदान-हल कैसे हो? इसकी चर्चा. सुझाव के तौर पर सबसे पहले मानता हूं कि अगर आप सरकार के भरोसे सबकुछ छोड़ेंगे, तो समाज का विकास नहीं हो सकता.
हमने अपनी ताकत पहचाननी बंद कर दी है. आप बताइए कि हम अभिभावक के तौर पर विश्वविद्यालय-कॉलेजों में चोरी कराते हैं. बच्चे चोरी करते हैं. फिर हम उम्मीद करते हैं कि हमारे बच्चे ज्ञान में बृहस्पति हो जायेंगे? यह मैंने बिहार और उत्तर प्रदेश में देखा है कि उच्च विद्यालयों से ही बच्चों को चोरी कराने की लत अभिभावक लगाते हैं.
हम अपने बच्चों को कैसा बना रहे हैं? यह काम पिछले 30-40 सालों में अनवरत चल रहा है. इस पर कोई ध्यान नहीं देता, न चर्चा होती है. पहली बार उत्तर प्रदेश-बिहार की सीमा पर स्थित (बिहार के) एक स्कूल के इर्दगिर्द हजारों लोगों को एकत्र देखा, तो लगा कि कोई बड़ी घटना हो गयी. तब पता चला कि एक छात्र को नकल कराने, चिट पहुंचाने में पांच-पांच लोग लगे हैं. मास्टर व पुलिस असहाय खड़े थे. तब से यह चल रह है.
पर आज सोचिए, आप चोरी कराके उन्हें डिग्री दिला देंगे, लेकिन जब वो इस नॉलेज सोसायटी में जायेंगे, उनका क्या हाल होगा? वे नौकरी नहीं कर सकते. उन्हें कोई कंपनी नहीं रख सकती. आपको जानना होगा कि यह योग्यता की दुनिया है. इस दृष्टि से आप बतौर अभिभावक उस बच्चे के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं. आप समझ रहे हैं कि चोरी करा के आप उसका भविष्य गढ़ रहे हैं, लेकिन दरअसल उसके भविष्य की हत्या हो रही है. कम से कम इस बात को हम अभिभावक समझना शुरू करें. प्रो शर्मा मानते हैं कि सभी नियुक्त शिक्षकों का मूल्यांकन होना चाहिए. अगर योग्य शिक्षक नहीं होंगे, तो योग्य छात्र नहीं निकल सकते. तीसरा, शिक्षकों की नियुक्ति यूजीसी के दिशानिर्देशों के तहत हो.
चौथा, कुलपति, योग्य, ईमानदार और ज्ञानी हो, जिसमें नेतृत्व क्षमता होनी चाहिए. पांचवां, शिक्षा से सरकार को और पार्टियों को अलग रहना चाहिए. सरकार, शिक्षा में हस्तक्षेप के बदले सहयोग करें. ये पांच सुझाव एक विशेषज्ञ के हैं, जिनसे उच्च शिक्षा को बेहतर बनाया जा सकता है.
अब मान लेते हैं कि सरकार कुछ नहीं कर रही है, तो क्या हम अपने भविष्य को कुरबान करते रहेंगे या कोई रास्ता है? मेरे अनुसार रास्ते हैं. आज दुनिया में जो शोध हो रहे हैं, बेहतर या मौलिक काम हो रहे हैं, उसमें 1996 में भारत का हिस्सा ज्यादा था, 2010 में 3.5 फीसदी रह गया. चीन, जिसका दुनिया के शोध में, 1996 में पांच फीसदी हिस्सा था, आज बढ़कर 26 फीसदी हो गया है.
आप जानते हैं कि दुनिया का भविष्य वहीं तय होता है, जहां नये ढंग से शोध हो रहे हैं. जहां नये विश्वविद्यालय तैयार हो रहे हैं. आपने कभी सोचा कि हमारे पास इतने कॉलेज हैं, बड़ी-बड़ी बिल्डिंगें हैं, बेहतर वेतन-सुविधाएं हैं, लेकिन पिछले 66 वर्षों में हमारे यहां एक भी सी.वी. रमण पैदा हुआ? एक भी सत्येंद्र नाथ बोस पैदा हुआ? कोई एक वैज्ञानिक चंद्रशेखर पैदा हुआ? इतने सारे इन्फ्रास्ट्रक्चर, इतनी सारी सुविधाओं के बाद भी क्यों नहीं हुआ? गौर करिए, शिक्षा सिर्फ साधन से नहीं आती, शिक्षा समर्पण और चरित्र से आती है. हमारे समाज ने ये दोनों चीजें खो दी हैं.
आज हमारी शिक्षा की कैसी स्थिति है? हमारे 40 फीसदी ग्रेजुएट्स ऐसे निकलते हैं, जिन्हें मिकेंजी जैसी दुनिया की सर्वश्रेष्ठ संस्था ‘अनइंप्लायेबुल’ यानी नौकरी के योग्य नहीं मानती. कैरियर बिल्डर संस्था ने हाल में 400 कंपनियों का सर्वे किया और पाया कि हर चौथी कंपनी ग्रेजुएट्स की क्षमताओं से असंतुष्ट है. इस सर्वे के अनुसार 60 फीसदी अपनी समस्या सुलझाने में नाकाम हैं. मैं खुद अखबार में काम करता रहा हूं, जहां पीएचडी किये लोग आवेदन देते हैं, पर चार लाइन शुद्ध लिख नहीं सकते. ऐसे शिक्षित हमने पैदा किये हैं.
हाल की खबर है कि देश के 147 मैनेजमेंट कॉलेज बंद हुए हैं. क्योंकि जब आप ऐसे ही लोगों को निकालेंगे, तो उन्हें नौकरी कहां मिलनेवाली है? हाल ही में दुनिया में शिक्षण संस्थाओं की रैंकिंग का अध्ययन आया, टाइम्स हायर एजुकेशन, वर्ल्ड रेपुटेशन रैंकिंग 2015, जिसमें भारत की एक भी संस्था का नाम नहीं है. रैंकिंग के संपादक फिल कहते हैं कि यह सचमुच चिंता का विषय है कि एक देश जिसका बौधिक अतीत रहा है और जो तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है, वहां एक भी ऐसा विश्वविद्यालय या संस्थान नहीं है, जिसे वैश्विक स्तर पर सम्मान से नवाजा जा सके.
As India failed to make its mark, the report quoted Timer Higher Education Rankings editor Phil Baty telling, "It is really a matter of concern that a country of India’s great intellectual history and its huge and growing economic power does not have a single university that is regarded by academics globally as being among the world’s most prestigious." (http://indiatoday.intoday.in/story/worlds-best-university-indian-institure-harvard-oxford-ranking/1/423389.html)
दुनिया की एक मशहूर अंतरराष्ट्रीय कंपनी ने हमारे 70 फीसदी इंजीनियरिंग और एमबीए ग्रजुएट्स को अनइंप्लायेबुल माना. हालात यहां पहुंच गये हैं कि आज कक्षा आठ के बच्चे, कक्षा दो का गणित हल नहीं कर पाते. शिक्षा से हुनरमंद और दक्ष (स्किल्ड) व निपुण लोग तो नहीं ही निकल रहे, पर क्या हम इस शिक्षा पद्धति से एक अच्छा इनसान गढ़ पा रहे हैं? बहुत पहले मनीषी राजनेता सी. राजगोपालाचारी ने कल्पना की थी कि भारत के विश्वविद्यालय आधुनिक भारत के श्रेष्ठ आचरण वाले नेताओं को जन्म देंगे. विद्वान शिक्षक यहां से निकलेंगे.
दक्ष और ईमानदार नौकरशाह इन संस्थाओं से पढ़ कर बाहर आयेंगे. ये वो लोग होंगे, जो इस जटिल दुनिया में राजसत्ता के विकास का फर्ज निभायेंगे और समाज के सांस्कृतिक उत्थान के रास्ते में पथ-प्रदर्शक बनेंगे. ऐसा माहौल होगा, जहां मूढ़ता के बदले लोग तर्क पसंद करेंगे. आवेग के बदले लोगों के दिलो-दिमाग में बड़े ऊंचे आदर्शों के बीज होंगे. जहां सिद्धांत और आदर्श जीवन के पाथेय होंगे. अवसरवादिता जैसी चीजें नहीं होंगी. मोटे तौर पर विश्वविद्यालयों-शिक्षा संस्थानों से यही परिकल्पना है. आज हमारे शिक्षण संस्थान इन मापदंडों पर कहां खड़े हैं?
पिछले कुछेक वर्षो में बड़ी तेजी से हमने नयी संस्थाएं खड़ी की हैं. आइआइएम, आइआइटी वगैरह. पर हमारे शिक्षण संस्थान आज किस हाल में हैं? कुछ वर्षों पहले रिजर्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर सुब्बा राव ने कहा था, भारत में हर साल लगभग साढ़े तीन लाख इंजीनियर निकलते हैं, पर उनमें से एक चौथाई ही शायद नौकरी पाने योग्य होते हैं.
आज भारत में सात हजार आइटीआइ (इंडस्ट्रीयल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट) हैं, लेकिन उनके पाठ्यक्रम बहुत पुराने और आउटडेटेड हैं. मशहूर शिक्षाविद् कांति वाजपेयी ने भी हाल ही में कहा कि हमें इस सच या हकीकत का सामना करना चाहिए कि हमारी शिक्षा पद्धति और वोकेशनल एजुकेशन (व्यावसायिक शिक्षा) संस्थान, कॉलेज और विश्वविद्यालय बहुत खराब हाल में हैं. क्या इसी तरह की शिक्षा पद्धति से निकले युवा, भारत को नयी ऊंचाई पर ले जा पायेंगे?
सूचना है कि पिछले 10 वर्षों में रेट ऑफ इंप्लायमेंट नहीं बढ़ा, इसलिए 15-20 करोड़ नौजवान रोजगार की तलाश में हैं. दूसरी तरफ मौजूदा केंद्र सरकार ने स्वीकार किया है कि हर साल दो करोड़ लोगों को नौकरी नहीं दे सके, तो यह व्यवस्था चलनेवाली नहीं है. आखिर ये बेरोजगार जायेंगे कहां? यह मैं किसी को निराश करने के लिए नहीं कह रहा हूं, बल्कि यहां बैठे लोग या नौजवान जानें कि हमने क्या-क्या अपराध किये हैं? हाल में मैं संसदीय कामों से यूरोप गया था.
यूरोप में बड़े पैमाने पर बहस हो रही है. वहां का नौजवान कह रहा है कि हमारी पिछली पीढ़ी यानी हमारे पिता की पीढ़ी, हमारे चाचा-दादा की पीढ़ी ने हमारे साथ अपराध किया है. जब जरूरत थी, तब उन्होंने देश में कठोर सुधार नहीं किये, जिनका परिणाम हमें भुगतना पड़ रहा है. हम बेरोजगार हैं. भारत में ऐसी चीजें न हों, इसलिए मैं पुरानी चीजों का उल्लेख कर रहा हूं. इसे हमें ठीक करना चाहिए. यहां 1980 के दशक में शुरू हुआ कि कॉपी में पैरवी कीजिए. नंबर बढ़वाइए. जिस विभाग के हेड जिस जाति के हों, वही लोग टॉप करने लगे. शिक्षा में प्रतिभा की हत्या, पैरवी, जातिवाद वगैरह ने की.
कुलपति जाति के आधार पर नियुक्त होने लगे. इसका लॉजिकल अंत तो यही होना था, जैसे शिक्षक आपको आज मिले हैं. 25-30 वर्षों में हमने अयोग्य पैदा किये और अब शिक्षक के रूप में बृहस्पति ढूंढ़ रहे हैं? यह कैसे संभव है? अब समाज का दायित्व है कि स्थिति कैसे बेहतर हो, इस पर गौर करें. विशेष ट्रेनिंग के द्वारा कैसे हालात बदलें. कोई दूसरा विकल्प या रास्ता नहीं है.
हाल का उदाहरण है. रांची में ईस्ट जोन यूथ फेस्टिवल हुआ. इसमें बिहार, झारखंड, यूपी, बंगाल, ओड़िशा के विद्यालयों के प्रतिभावान छात्र चुन कर भेजे गये. स्पोर्ट्स, कल्चर, पेंटिंग, भाषण वगैरह की प्रतियोगिता हुई. सबसे श्रेष्ठ विश्वविद्यालय कौन-सा निकला, इस प्रतियोगिता में? मणिपुर विश्वविद्यालय, जिसे 70 फीसदी अवार्ड मिले. हिंदी क्षेत्र का कोई विश्वविद्यालय यहां तक नहीं पहुंच सका.
अब सोचिए, हम कहां पहुंच गये हैं? हर चीज की हम सरकार से उम्मीद करेंगे, तो पीछे छूट जायेंगे. समाज इनिशिएटिव (पहले) करता है. व्यक्ति का इनिशिएटिव होता है. इस धरती (आरा-बक्सर) में कई ऐसे लोग हुए, जिन्होंने निजी कोशिश से हालात बदले. इसलिए मैं यह प्रसंग आपको बता रहा हूं.
इतिहास की बात करें, तो मैं दो-तीन नाम आपको सुनाऊंगा. शंकराचार्य जैसे व्यक्ति, जिनका जन्म केरल में हुआ, जिन्होंने चार धाम बनाये. उनका योगदान क्या है या नहीं, यह बहस का विषय है. लेकिन एक किशोर अपनी मेहनत से ऐसा इतिहास लिख जाता है, जिस पर सैकड़ों वर्षों से चर्चा चल रही है. नानक, जो भारत भी घूमे, बगदाद गये और मक्का भी गये, आज भी उनका नाम घर-घर गूंजता है. ये पुराने उदाहरण है. मैं हाल के उदाहरण सुनाता हूं. आजादी के दौर का. जब हमारे पास कुछ भी नहीं था, तो कैसी प्रतिभाएं निकलीं, जिन्होंने दुनिया में सिक्का जमा लिया. धर्मानंद कौशांबी. कई लोग उनका नाम जानते होंगे.
1899 में गोवा के एक गरीब घर में पैदा हुए. लगभग अपढ़. कोंकणी और गोवा की भाषा छोड़ कर उन्हें कुछ आता नहीं था. उनकी इच्छा हुई कि बौद्ध धर्म को अच्छी तरह जानें. भारत में बौद्ध धर्म को पुर्नस्थापित करें. बीसवीं सदी में एशिया के इस हिस्से में बौद्ध धर्म को किसी ने पुनर्स्र्थापित करने का काम किया, तो वह धर्मानंद कौशांबी थे. जब वह घर से निकले. पास में एक पैसा नहीं. भिक्षु के रूप में पुणे गये. ग्वालियर गये. नेपाल गये.
श्रीलंका गये. आपको पता है उस अपढ़ आदमी की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या रही? दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय कहे जानेवाले हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ाया. सिर्फ हार्वर्ड में ही नहीं. रूस का हार्वर्ड कहा जानेवाले लेनिनग्राड एकेडमी में भी पढ़ाया. 1947 में गांधीजी के आश्रम में रह कर, उपवास रख कर अपना जीवन खत्म कर लिया. गांधीजी ने कहा कि मेरा आश्रम ऐसे व्यक्ति के रहने के कारण पवित्र हो गया. यह निजी चरित्र और कमिटमेंट का उदारण है.
राहुल सांकृत्यायन जी, जिन्होंने बिहार में काम किया. वह 1910 में आजमगढ़ में जन्में. केदारनाथ पांडे उनका नाम था. प्राइमरी स्कूल की शिक्षा ली और घर से निकल गये. कोई भाषा नहीं जानते थे. बनारस, लद्दाख, श्रीलंका, जापान, कोरिया रहते हुए लेनिनग्राड एकेडमी ऑफ साइंसेज में पढ़ाया. धर्मानंद कौशांबी की तरह संस्कृत, पाली, उर्दू, तिब्बती, परशियन, फ्रेंच, रूसी आदि भाषाओं का ज्ञान हासिल किया.
हाल का उदाहरण है. आजादी की लड़ाई के बाद तय हुआ कि कोई ऐसा विश्वविद्यालय बने, जो भारत की आत्मा के अनुकूल हो. तब हमारे यहां काशी विद्यापीठ बना. इस विद्यापीठ की हीरक जयंती मनायी गयी, तो उन लोगों के भाषणों का संकलन छपा, जो समय-समय पर वहां वक्ता के रूप में आये. उस संकलन को भारत के हर स्कूल-कालेज में हर अध्यापक-छात्र या अभिभावक के लिए अनिवार्य होना चाहिए. हम जानते हैं कि यह विश्वविद्यालय अभावों में बना. लेकिन उस विश्वविद्यालय से कैसे-कैसे रत्न निकले? किस चरित्र के लोग निकले?
इसी आरा इलाके के रामसुभग सिंह. लालबहादुर शास्त्री, भोला पासवान शास्त्री, जिनकी ईमानदारी-निष्ठा के बारे में देश जानता है. यानी एक अभावग्रस्त विश्वविद्यालय ने ऐसे चरित्रों को गढ़ा. लेकिन आज जब ऐसे बड़े-बड़े विश्वविद्यालय बन रहे हैं, तो इस चरित्र के कितने लोग सामने आ रहे हैं?
आज हालत क्या है? देखता हूं कि छात्र स्कूल नहीं जायेंगे, पर उसके शिक्षक को अभिभावक विवश करते हैं कि उसकी उपस्थिति बना दी जाये. क्योंकि छात्रवृत्ति लेनी है. अभिभावक यह भी कहेंगे कि स्कूल में अगर ठेकेदारी का कोई काम आ गया और वह काम मुझे नहीं मिला, तो उक्त शिक्षक पर मुकदमा कर देंगे. अगर हमारा मानस ऐसा है, हमारी प्रवृत्ति ऐसी है, तो हम कहां से बढ़िया समाज और बड़ी शिक्षा की कल्पना कर सकते हैं? हमारे इलाके में कोई नया आंदोलन चलना चाहिए. सांस्कृतिक पुनर्जागरण का. मानस बदलने का. मैं अपने इलाके में देखता हूं कि आज भी जब कोई शादी के लिए आता है, मामूली हैसियत के बावजूद हम उसके सामने ऐसे पेश आते हैं, जैसे हम कोई बहुत बड़े आदमी हैं.
पान पर हमारा इतना खर्च है. मैं इतने मुकदमें लड़ रहा हूं. सिल्क का ही कपड़ा पहनता हूं. इतने बंदूकधारी मेरे पीछे चल रहे हैं. उन्हीं राज्यों ने प्रगति की है, जिन राज्यों ने झूठी शान-शौकत से मुक्ति पा ली है. हमारे यहां यह अभियान चलना चाहिए कि हम इन झूठी चीजों से मुक्ति पायें, तब हमारा चरित्र निखरेगा. हमारे अंदर जो प्रतिभा है, इस इलाके की जो प्रतिभा है, उसकी गूंज पूरी दुनिया में होगी.
बंगलुरु, जिसे पूरब का सिलिकन वैली कहा जा रहा है, वह भारत के दक्षिण में है. हमने कभी सोचा कि यह हिंदी इलाके में क्यों नहीं हुआ? हिंदी राज्य, जैसे – बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि को ‘बीमारू’ राज्य कहा गया. मध्यप्रदेश और राजस्थान अब इस चक्र से आगे निकल गये हैं, लेकिन हम अब भी बीमारू राज्य माने जाते हैं.
हम कैसे पीछे रह गये? दक्षिण कैसे आगे निकल गया? टाइम्स ऑफ इंडिया समूह के धर्मयुग में मैंने काम करना शुरू किया. 1978 के आसपास यह पत्रिका सात लाख बिकती थी. प्रति सप्ताह. तब से महाराष्ट्र या दक्षिण के अन्य राज्यों के लोग कहते थे और हाल तक (सन 2000) आंध्र के चंद्रबाबू नायडू कहते थे कि अमीर राज्य कमायें और केंद्र उसे उत्तर के गरीब राज्यों को दे दे, ऐसा कब तक चलेगा? हमलोग रहते थे, महाराष्ट्र में. हमने उनके सवालों का सामना किया. वे कहते थे कि आपके राज्य में कुछ नहीं हो सकता कि आपको यहां नौकरी मिले? यह सब हमारे यहां क्यों नहीं हो सका? इसकी वजह क्या है?
मैं 1972 में छात्र था. छात्र के रूप में ऑल इंडिया एनसीसी कैडेट शिविर में मेरा चयन हुआ. मैं गया बंगलुरु. वहां पहली बार मैंने देखा कि बंगलुरु के एमजी रोड में एक लड़की स्कूटर चला रही थी. 1972 में. तब हमारी स्थिति क्या थी? हमने अपने घर की औरतों को बंद करके रखा. उन्हें अधिकार नहीं दिया. बदलाव नहीं किया. इसलिए हम पीछे छूट गये.
हमने शिक्षण संस्थाएं नहीं खोलीं. आज चीन अगर आगे बढ़ा है, तो वहां पुरुष और स्त्री दोनों कदम मिला कर चलते हैं. आगे बढ़ते हैं. यह मानस हमें बदलना होगा. सिर्फ यही कारण नहीं है कि बंगलुरु पूरब का सिलिकन वैली बना? वहां बड़े पैमाने पर शिक्षण संस्थान खुले. आज भी जब आप बंगलरु घूमते हैं, तो गाड़ियों पर बड़े-बड़े इश्तेहार दिखते हैं कि हमारे यहां यह पद खाली हैं, इंटरव्यू देने के लिए यहां आयें. दूसरी तरफ हमारा इलाका है.
जहां एक पद खाली होता है, तो लाखों आवेदन आ जाते हैं. वहां इसलिए ऐसा हुआ कि उन्होंने अपनी शिक्षण संस्थाओं को बेहतर बनाया. दुनिया के जाने-माने पत्रकार फ्रीडमैन ने एक किताब लिखी, द वर्ल्ड इज फ्लैट यानी दुनिया समतल हो गयी है. इस किताब में बंगलुरु को पूरब का सिलिकन वैली कहा गया. अब दुनिया के जो बड़े राष्ट्राध्यक्ष आते हैं, वे दिल्ली के बदले पहले बंगलुरु जाना चाहते हैं. वहीं ठहरना चाहते हैं.
वह देखना चाहते हैं कि बंगलुरु में कैसे यह क्रांति हो गयी. ऐसा हमारे यहां हिंदी इलाके में भी संभव है. हमें हमारी व्यवस्था की वह पुरानी चीज और जो गौरवमय इतिहास रहा है, उसे लौटाना होगा. अकेला व्यक्ति वह दिन नहीं लौटा सकता. समाज को खड़ा होना पड़ेगा. बाकी लोगों को खड़ा होना पड़ेगा. तब यह स्थिति बन सकती है.
आज हम सपना पालते हैं कि हमारे बच्चे किसी तरह डिग्री पा लें. उन्हें सर्टीफिकेट मिल जाये. उसके लिए जरूरत होने पर हम अभिभावक चोरी कराते हैं. पर जिन देशों ने दुनिया में शीर्ष पर अपनी जगह बनायी, उनके यहां के अभिभावक कैसा सोचते रहे हैं, अपने बच्चों के लिए, इसका एक उदाहरण देना चाहूंगा. हम सबने लिंकन का नाम सुना है. जीवन में बारह बार उन्हें विफलता ही मिली. पिता शराबी थे. मां चल बसी. भारी मुसीबत से वह गुजरे.
उन्होंने उस स्कूल के प्रिंसिपल को एक पत्र लिखा, जहां उनका बच्चा पढ़ता था. यह पत्र हर बच्चे को, हर अभिभावक को पढ़ना चाहिए. वह अद्भुत पत्र क्या था. इसका कुछ अंश याद है, आपको बताता हूं. लिंकन ने स्कूल के प्राचार्य को पत्र लिखा कि मैं अपने बच्चे का चरित्र नहीं गढ़ सकता. वह आप कर सकते हैं. वह क्षमता आप में हैं. हमारे बच्चे को सफलता का आंनद तो बताइए, पर उससे भी महत्वपूर्ण उसे बताइए कि जीवन में विफल होने का भी आनंद है? वह जाने कि असफल होने की मन:स्थिति कैसी होती है? वह उस मन:स्थिति से गुजरे, ताकि वह अंदर से मजबूत बन सके. मेरे बच्चे को यह भी बताइए कि दुनिया में वह अकेले नहीं है. यह सृष्टि बड़ी है. वह इसका एक मामूली हिस्सा है.
ताकि उसका अहंकार न बढ़े. उसको नदी, पेड़, पहाड़ से जोड़िए, ताकि वह समझे कि दुनिया कितनी विराट और भिन्न है. उसे ऐसी शिक्षा दीजिए कि जब वह नौकरी के बाजार में जाये, तो जो सबसे अधिक पैसा दे वहां अपना दिमाग गिरवी रखे, पर अपनी आत्मा कहीं गिरवी न रखे. यह पूरा पत्र (मैंने पत्र के भाव सुनाये, शब्दश: नहीं), हर उस घर-विश्वविद्यालय या शिक्षा केंद्र में होना चाहिए, जहां भारत का भविष्य गढ़ा जा रहा है.
जहां का समाज ऐसी कल्पना करता है, वहां से निकले लोग नोबुल पुरस्कार विजेता होते हैं, मौलिक होते हैं और दुनिया का इतिहास बनाते हैं. चोरी या नकल करनेवाला समाज क्या कर सकता है?
अपनी स्थिति देखकर हम यह समझ सकते हैं. याद करिए, रवींद्र बाबू का शांति निकेतन प्रयोग? अभावों में संस्था शुरू हुई, पर किस चरित्र के विद्वान वहां से निकले? उनका चरित्र कितना प्रेरक रहा? कैसे-कैसे छात्र वहां से पढ़ कर, समाज की धरोहर बने. पथप्रर्दशक बने.
आज जिन्हें हम सेंटर ऑफ एक्सलेंस कहते हैं, जहां नयी खोजें होती हैं. नयी टेक्नोलॉजी ईजाद होती है. ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में नयी चीजें होती हैं. मनुष्य, समाज या देश अज्ञान के जिस धरातल पर हैं, उससे ऊपर उठा कर और उदार, बेहतर, दृष्टिवान और संकल्पवान बनाने के काम जिन शिक्षण संस्थाओं में होता है, जहां मेडिकल, विज्ञान, टेक्नोलॉजी, स्पेस साइंस इन सब क्षेत्रों में लगातार नये अनुसंधान या खोजें हो रही हैं, वही देश आगे जाते हैं.
इसलिए आप पायेंगे कि आज अमेरिका दुनिया के शीर्ष देशों में हैं, तो इसके मूल में वहां के शिक्षण संस्थान हैं. दुर्भाग्य से भारत में कभी इन गंभीर विषयों पर चर्चा ही नहीं हुई. भारत और खास तौर से हिंदी इलाके का मानस है, एक-दूसरे को जितना हम नीचा दिखा सकें. एक-दूसरे को जितना हम नंगा कर सकें. हम कोई संस्था नहीं खड़ी कर सकते? वह कुव्वत नहीं, पर बनी-बनायी श्रेष्ठ संस्थाओं को पलक झपकते ही खत्म करने की क्षमता हममें अद्भुत है. पौरुष नहीं, कर्म नहीं, अद्वितीय भंजक हैं, हम. पर समाज हमारा कैसे बेहतर हो, कैसे हम सामूहिक रूप से पहल कर एक नयी दुनिया बना सकें, यह हमारी कोशिश नहीं रहती.
मसलन, याद रखिए, पुन: दोहरा रहा हूं कि अमेरिका अगर आज दुनिया में बड़ा है, तो उसके पीछे उसकी शिक्षण संस्थाओं का बहुत बड़ा योगदान है. हमें गौर करना चाहिए कि हार्वर्ड विश्वविद्यालय की स्थापना धार्मिक प्रचारकों, ईसाई पादरियों के प्रशिक्षण के लिए हुई थी. आज वहीं हार्वर्ड विश्वविद्यालय दुनिया का श्रेष्ठ शिक्षण संस्थान बन गया है. समय के साथ जो नहीं बदलते या देश, काल, परिस्थितियों के अनुसार जो तालमेल नहीं रखते, भविष्य उनका नहीं होता.
हार्वर्ड विश्वविद्यालय ने समय के साथ अपना स्वरूप कैसे बदला? 1636 में इंग्लैंड से अमेरिका आये प्यूरिटन मत के गिरिजाघरों में योग्य पादरियों की जरूरत पड़ी. एक पादरी थे, जान हार्वर्ड. उन्होंने अपनी 400 पुस्तकें और अपनी आधी संपत्ति देकर एक धार्मिक प्रशिक्षण केंद्र शुरू किया. तब विश्वविद्यालय का मकसद था, यीशु व चर्च के लिए काम. समय के साथ प्यूरिटन मतवालों का असर कम हुआ. और यही हार्वर्ड 1801 के आसपास उदारवादियों के वेटिकन जैसा हो गया. सीखिए कि एक समाज कैसे प्रगति करता है? अमेरिका जैसे-जैसे विकसित होने लगा, उदारवादी विचारों की ताकत वहां बढ़ती गयी. हार्वर्ड विश्वविद्यालय में यादगार परिवर्तन या स्वर्णयुग 1869 से शुरू हुआ.
चार्ल्स विलियम एलियट, हार्वर्ड विश्वविद्यालय के अध्यक्ष बने. उन्होंने कई ऐसे कदम उठाये, जिन्होंने शिक्षा की दुनिया बदल दी. उनके कार्यकाल में स्नातकोत्तर के विद्यार्थियों को चर्च की अनिवार्य उपिस्थति से छूट मिली. तब तक स्नातक में एडमिशन के लिए ग्रीक भाषा जानना जरूरी थी, उसकी अनिवार्यता से छूट मिली. रट कर शिक्षा पाने या विद्वान बनने का सिलसिला बदल गया.
छात्रों के चाल-चलन को आंक कर उनकी योग्यता का पैमाना, जिसे ‘स्केल ऑफ मेरिट’ कहा जाता था, खत्म किया गया. पहली बार छात्रों को हार्वर्ड में ही वैकल्पिक पाठ्यक्रम या अंग्रेजी में कहें तो ‘इलेक्टिव सिलेबस’ चुनने की शुरूआत हुई. छात्र को खुद अपना पाठ्यक्र म चुनने की आजादी देकर हार्वर्ड ने शिक्षा की पुरानी रूढ़िवादी परंपरा को तोड़ा.
हार्वर्ड का यह नया प्रयोग, अमेरिका में फैला. इस प्रयोग ने शिक्षा का मर्म बदल दिया. 1894 में खुद एलियट ने कहा कि यह नयी प्रणाली इस विश्वविद्यालय में होने वाला सबसे उपयोगी काम है. 1879 में एलियट ने पहली बार महिलाओं को भी हार्वर्ड की शिक्षा में सहभागी बनाने का निर्णय किया. एलियट ने इतने बड़े-बड़े बदलाव किये कि इस विश्वविद्यालय को एलियट का हार्वर्ड कहा जाने लगा. हार्वर्ड विश्वविद्यालय की चर्चा ‘बोस्टन ब्राह्मणों’ की बात के बिना अधूरी है.
कौन थे, बोस्टन ब्राह्मण? उन्नीसवीं सदी में अमेरिका में अमीर, शिक्षित, बोस्टन समाज के अभिजात्य (इलिट) लोगों का यह वर्ग था. इस नाम का प्रयोग पहली बार ओलिवर वेंडेल होम्स ने 1861 में अपने एक उपन्यास में किया. ये सब लोग बोस्टन के वैसे कुलीन परिवार थे, जिनका संबंध न्यू इंग्लैंड इलाके से था. इनमें अधिकतर प्यूरिटन समुदाय के प्रवासी वंशज थे. यह अमीर व्यापारी या पेशेवर लोग थे. ये समाज में समता के पक्षधर नहीं थे. ये दूसरे प्रवासियों के अमेरिका आने के सख्त खिलाफ थे.
ये अपने चुनिंदा परिवारों के बीच में ही शादी-विवाह करते थे. इनमें सबका कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में हार्वर्ड विश्वविद्यालय से संबंध था. ऐसा कहा जाता है कि 19वीं शताब्दी में हार्वर्ड विश्वविद्यालय में इन बोस्टन ब्राह्मणों का आधिपत्य था. इनके वंशज खानदानी परंपरा और सामाजिक प्रगति के लिए यहां पढ़ने आते थे. दूसरे विश्व युद्ध के बाद हार्वर्ड विश्वविद्यालय ने एडमिशन और पाठन-पाठन के तरीकों में मौलिक बदलाव किया. समय के साथ हार्वर्ड विश्वविद्यालय का स्वरूप बदला.
जो महज धार्मिक शिक्षा के उद्देश्य से बना था, अच्छे पादरी तैयार करने के लिए बना था, वह हार्वर्ड विश्वविद्यालय आज पूरी दुनिया में, उच्च शिक्षा का प्रकाश स्तंभ बन गया. रंग, जाति, धर्म, क्षेत्र के संकीर्ण दायरे से ऊपर उठ कर. हार्वर्ड विश्वविद्यालय की श्रेष्ठता उच्च शिक्षा के नये आयाम गढ़ने में है. इसी तरह अपने समय के साथ तालमेल रखनेवाले बेहतर संस्थान अगर हम भारत में नहीं बना सकते या खास तौर से हिंदी इलाके के राज्यों में नहीं बना सकते, तो हमारी कहानी अविकसित समाज की ही रह जायेगी.
आज दुनिया में माना जाता है कि हम नॉलेज एरा (ज्ञान युग) में रह रहे हैं. ऐसी ही संस्था या सेंटर ऑफ एक्सलेंस से ज्ञानयुग का समाज जन्मता है. इसी तरह अमेरिका के एक और विश्वविद्यालय का बहुत संक्षेप में उल्लेख. इस मकसद से कि कैसे वहां की सरकारों ने वहां के श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों को नहीं बनाया. या तो समाज ने बनाया या समाज के ऐसे लोगों ने, जिनके पास पैसा था, साधन थे. ‘खुद’ से ऊपर उठ. परिवार, जाति, धर्म और संपत्ति लोभ से आगे निकल कर.
उन लोगों ने समाज का ऋण महसूस किया, अपने देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी महसूस की, इसलिए अपने देश के भविष्य के लिए अपना सबकुछ इन संस्थानों को खड़ा करने में लगा दिया. आज हमारे भारत में, खास तौर से हिंदी इलाकों का क्या मानस है? हम चाहते हैं कि सबकुछ सरकार कर दे. सरकार बेहतर से बेहतर संस्थान बना दे. सरकार अच्छे से अच्छे शिक्षक नियुक्त कर दे. सरकार घर बैठा के लाखों-करोड़ों का वेतन दे दे.
बच्चे बिना श्रम, तप-त्याग या पढ़ाई के घर बैठे नकल कर डिग्री पा लें, उन्हें नौकरी मिल जाये. वह भी घर बैठे-बैठे. यह नौकरी भी सरकार दे, पर यह न पूछे कि ऐसे लोग किस स्तर या क्वालिटी का काम करते हैं? यह संभव नहीं. दुनिया, इस रास्ते कहीं आगे बढ़ी है? इसलिए दुनिया का कुछ यथार्थ हमें समझ लेना चाहिए. अगर हमें आगे बढ़ना है. अगर हमें कुछ करना है, तो हमें खुद भी रास्ता बनाना होगा. महज सरकार के भरोसे हम नहीं रह सकते.
इसी प्रसंग में अमेरिका के कुछ अन्य विश्वविद्यालयों का उल्लेख कर रहे हैं, ताकि लोग जानें कि आज दुनिया के जो सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थान बन गये हैं, जहां हमारे बच्चों को दाखिला मिल जाता है, तो हम इतराते हैं, फख्र करते हैं, उनके बनने की कहानी के पीछे सरकारें नहीं, बल्कि व्यक्ति हैं या समाज है.
(आभार : इस भाषण में दी गयी अनेक सूचनाएं, मुख्य रूप से, पेशे से साफ्टवेयर इंजीनियर, पर अत्यंत गहराई व विचारपरक ढंग से लिखनेवाले रविदत्त वाजपेयी (ऑस्ट्रेलिया) की एक लेख श्रृंखला पर आधारित हैं. प्रभात खबर में उन्होंने अमेरिकी विश्वविद्यालयों के उद्भव पर एक अत्यंत समृद्ध लेख श्रृंखला लिखी थी. कई जगह तो उस लेख श्रृंखला की पंक्तियां व सूचनाएं हूबहू इस बयान में हैं.)
