Lord krishna Peacock Feather Story: वनवास के दौरान एक दिन माता सीता को बहुत प्यास लगी. चारों ओर घना जंगल था और कहीं पानी दिखाई नहीं दे रहा था. तब भगवान श्रीराम ने वन देवताओं से प्रार्थना की कि उन्हें जल का मार्ग दिखाया जाए. उनकी प्रार्थना सुनकर एक मयूर (मोर) उनके पास आया और बोला कि थोड़ी दूरी पर एक जलाशय है, वह मार्गदर्शन करेगा.
मयूर का अनोखा त्याग
मयूर ने श्रीराम से कहा कि वह उड़ते हुए आगे जाएगा और रास्ते में अपने पंख गिराता जाएगा, ताकि श्रीराम उन पंखों के सहारे जलाशय तक पहुँच सकें. लेकिन उसने यह भी बताया कि ऐसा करना उसके लिए प्राणघातक हो सकता है, क्योंकि मयूर के पंख केवल एक विशेष समय और ऋतु में ही स्वाभाविक रूप से गिरते हैं. यदि वह अपनी इच्छा के विरुद्ध पंख त्यागेगा, तो उसकी मृत्यु निश्चित है.
सेवा में समर्पण
फिर भी मयूर ने बिना किसी संकोच के अपने प्राणों की परवाह किए बिना सेवा का मार्ग चुना. वह पंख बिखेरता हुआ आगे बढ़ता गया और अंततः श्रीराम जलाशय तक पहुँच गए. इस प्रक्रिया में मयूर ने अपने जीवन का त्याग कर दिया. अपने अंतिम क्षणों में उसने सोचा कि वह कितना सौभाग्यशाली है, जिसे स्वयं भगवान की सेवा करने का अवसर मिला.
श्रीराम का वचन
मयूर के इस त्याग और समर्पण से भगवान श्रीराम अत्यंत भावुक हो गए. उन्होंने मयूर से कहा कि वह इस ऋण को अवश्य चुकाएंगे. उन्होंने वचन दिया कि अगले जन्म में वह उसके पंख को अपने सिर पर धारण करेंगे.
श्रीकृष्ण अवतार में वचन पूरा
भगवान ने अपने वचन को निभाते हुए श्रीकृष्ण अवतार में मयूर पंख को अपने मुकुट में धारण किया. यह उस मयूर के त्याग और प्रेम का सम्मान था, जिसने भगवान के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था.
श्रीकृष्ण की कथा का संदेश
यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची सेवा और निस्वार्थ भाव का मूल्य सबसे बड़ा होता है. यदि भगवान भी अपने वचन और ऋण को निभाने के लिए अवतार लेते हैं, तो हम मनुष्यों को भी अपने कर्मों और रिश्तों का सम्मान करना चाहिए. जो भी अच्छा कर सकते हैं, उसे इसी जीवन में करना ही सच्चा धर्म है.
(आचार्य विनोद त्रिपाठी)
