शुभंकर, सुलतानगंज, भागलपुर
Sawan 2026: सावन में शिवलिंग पर गंगाजल चढ़ाने की परंपरा सदियों पुरानी है. भक्त दूर-दूर से गंगाजल लाकर भोलेनाथ का अभिषेक करते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान शिव को गंगाजल इतना प्रिय क्यों है? इसके पीछे केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि समुद्र मंथन से जुड़ी एक ऐसी पौराणिक कथा है, जिसमें हलाहल विष, नीलकंठ महादेव और मां गंगा का गहरा संबंध बताया गया है.
जब संकट में पड़ी थी सृष्टि, तब शिव ने बचाया था संसार
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, अमृत प्राप्त करने के लिए देवताओं और असुरों ने मंदार पर्वत को मथनी बनाकर समुद्र मंथन किया था. लेकिन अमृत निकलने से पहले समुद्र से भयंकर हलाहल विष प्रकट हुआ. विष की ज्वाला इतनी प्रचंड थी कि तीनों लोकों में त्राहिमाम मच गया और पूरी सृष्टि विनाश के कगार पर पहुंच गई.
ऐसे समय में देवताओं ने भगवान शिव की शरण ली. लोककल्याण के लिए महादेव ने बिना किसी हिचकिचाहट के हलाहल विष का पान कर लिया. उन्होंने विष को न निगला और न ही बाहर निकाला, बल्कि अपने कंठ में ही धारण कर लिया. विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और तभी से वे 'नीलकंठ महादेव' कहलाए.
गंगा की शीतल धारा ने शांत की महादेव की दाह
पौराणिक मान्यता के अनुसार, विषपान के बाद भगवान शिव के शरीर में भयंकर ताप उत्पन्न हो गया. तब उनकी जटाओं में विराजमान मां गंगा की शीतल धारा ने उस ताप को शांत किया. इसी मान्यता के कारण गंगाजल को भगवान शिव के लिए विशेष प्रिय माना जाता है.
विशेष रूप से उत्तरवाहिनी गंगा के जल को अत्यंत पवित्र और मोक्षदायी माना जाता है. यही वजह है कि सावन के पूरे महीने शिवभक्त उत्तरवाहिनी गंगा से जल भरकर बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक करते हैं. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यह पवित्र जल केवल शिवलिंग पर नहीं चढ़ता, बल्कि उनके जीवन के दुख, रोग, शोक और संकट भी अपने साथ बहा ले जाता है.
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सुलतानगंज से शुरू होती है आस्था की अनूठी यात्रा
देश के कई हिस्सों में गंगा नदी बहती है, लेकिन सुलतानगंज की विशेष धार्मिक पहचान यहां गंगा के उत्तरवाहिनी स्वरूप से जुड़ी है. इसी कारण यह स्थान शिवभक्तों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है.
यहीं स्थित बाबा अजगैवीनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना और संकल्प लेने के बाद लाखों कांवरिये कांवर में गंगाजल भरकर बाबा बैद्यनाथ धाम की ओर प्रस्थान करते हैं. करीब 98 किलोमीटर की इस यात्रा में न थकान उन्हें रोक पाती है और न ही मौसम की चुनौती. हर कदम पर गूंजता 'बोल बम' का जयघोष उनके लिए नई ऊर्जा का स्रोत बन जाता है.
कांवर में सिर्फ गंगाजल नहीं, आस्था लेकर चलते हैं भक्त
धर्माचार्यों के अनुसार, कांवर में भरा जल श्रद्धालुओं के लिए केवल पानी नहीं, बल्कि आस्था, विश्वास, तपस्या और समर्पण का प्रतीक है. कांवरिये इसे पूरी पवित्रता, संयम और नियमों के साथ बाबा बैद्यनाथ के चरणों तक पहुंचाते हैं.
मान्यता है कि जो श्रद्धालु सच्चे मन, निर्मल भाव और पूर्ण आस्था के साथ भगवान शिव का जलाभिषेक करता है, उसकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. इसी विश्वास के साथ हर साल देश के कोने-कोने से लाखों शिवभक्त सुलतानगंज पहुंचते हैं.
कोई संतान सुख की कामना लेकर आता है, कोई रोगमुक्ति के लिए, कोई परिवार की खुशहाली की प्रार्थना करता है, तो कोई केवल भोलेनाथ के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा व्यक्त करने के लिए यह कठिन यात्रा करता है.
सावन में क्यों बढ़ जाता है गंगाजल से अभिषेक का महत्व?
सावन का महीना भगवान शिव को समर्पित माना जाता है. इस दौरान शिवलिंग पर जल चढ़ाने की विशेष धार्मिक मान्यता है. ऐसे में सुलतानगंज की उत्तरवाहिनी गंगा से जल लेकर बाबा बैद्यनाथ धाम तक पहुंचने वाली कांवर यात्रा श्रद्धा का अनूठा उदाहरण बन जाती है.
सावन के पूरे महीने उत्तरवाहिनी गंगा के तट से उठने वाली आस्था की यह अविरल धारा और 'बोल बम' का अनंत जयघोष यही संदेश देता है कि जब श्रद्धा सच्ची हो, संकल्प अटूट हो और विश्वास भोलेनाथ पर हो, तो कठिन से कठिन यात्रा भी आसान लगने लगती है.
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