Vishnu Ansh Varaha Avatar: क्या आप जानते हैं कि भगवान विष्णु को वराह यानी शूकर का अवतार क्यों लेना पड़ा और उनके इस अवतार से जुड़ी प्रामाणिक पौराणिक कथा क्या है? प्रभात खबर के विशेष ‘विष्णु के अंशावतार की कथा’ की अगली कड़ी में आज हम आपको वराह अवतार की पूरी कहानी बता रहे हैं.
किस देवता का है वराह अवतार?
भगवान विष्णु के प्रमुख अवतारों में वराह अवतार का भी विशेष महत्व है. पौराणिक कथा के अनुसार, सतयुग में हिरण्याक्ष नामक राक्षस ने पृथ्वी को समुद्र में छिपा दिया था. श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, तब ब्रह्मा जी की नाक से भगवान विष्णु वराह (शूकर) यानी सूअर के रूप में प्रकट हुए और अपनी दांतों पर धरती को भू-लोक (पृथ्वी लोक) पर फिर से स्थापित किया.
बैकुंठ लोक के द्वारपाल जय-विजय क्यों बने राक्षस
श्रीमद्भागवत महापुराण की कथा के मुताबिक, बैकुंठ धाम (भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का निवास स्थान) के मुख्य द्वार की रक्षा के लिए जय और विजय नाम के दो द्वारपाल थे. एक बार उन्होंने सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार को बैकुंठ में जाने से रोक दिया, जिस पर वे क्रोधित हो गए. उन्होंने द्वारपालों से कहा- "भगवान विष्णु की शरण में रहने की वजह से तुम्हारे भीतर अहंकार आ गया है. अहंकारी बैकुंठ में निवास नहीं कर सकते." इतना कहते हुए उन्होंने जय-विजय को राक्षस वाली जिंदगी जीने का श्राप दे दिया.
हिरण्याक्ष ने ब्रह्मा जी से क्या मांगा था वरदान?
सनकादि ऋषि (सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार) ने श्राप के प्रभाव से बाद में दोनों दिति (राजा दक्ष की पुत्री) की कोख से जन्म लिया, जिन्हें हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के नाम से जाना गया. कथा के मुताबिक, दोनों ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने हिरण्याक्ष को वरदान दिया कि उसे कोई हरा नहीं सकता है. ब्रह्मा जी से मिले वरदान का फायदा उठाकर हिरण्याक्ष ने इंद्रलोक पर अपना अधिकार प्राप्त करने के लिए पूरी धरती को अपने वश में ले लिया. साथ ही, उसने अपनी शक्ति के अहंकार में धरती को समुद्र में डुबा दिया.
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जब चिंता में पड़ गए देवता
शक्ति के अहंकार में चूर हिरण्याक्ष ने वरुण देव (समुद्र के देवता) को युद्ध के लिए ललकारा. वरुण देव ने हिरण्याक्ष की चुनौती को स्वीकार नहीं किया. उन्होंने हिरण्याक्ष से कहा कि वह भगवान विष्णु से युद्ध कर अपनी ताकत दिखाए. वरुण देव के कहने पर हिरण्याक्ष भगवान विष्णु से युद्ध करने निकला. राक्षस हिरण्याक्ष के बीच हुई बातचीत को सुनकर दूसरे देवता भी चिंता में पड़ गए. हिरण्याक्ष से छुटकारा पाने के लिए देवताओं ने ब्रह्मा जी से प्रार्थना की.
कैसे हुआ भगवान विष्णु का वराह अवतार?
देवताओं की चिंता को ध्यान में रखते हुए ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु का ध्यान किया. तब उनकी नाक से भगवान विष्णु वराह यानी सूअर के रूप में प्रकट हुए. दूसरी ओर, राक्षस हिरण्याक्ष भगवान विष्णु को खोजते-खोजते नारद जी के पास पहुंचा और विष्णु जी का पता पूछा.
तब नारद ने हिरण्याक्ष को कहा कि भगवान विष्णु का वराह अवतार हो चुका है और वे पृथ्वी को बचाने के लिए समुद्र में हैं. इतना जानते ही हिरण्याक्ष समुद्र में उस स्थान पर चला गया, जहां उसने धरती को छिपाकर रखा था.
वह जैसे ही उस स्थान पर पहुंचा, उसने देखा कि भगवान विष्णु वराह अवतार में अपनी थुथनी (सूअर के मुंह का आगे का हिस्सा) पर पृथ्वी को उठाकर ले जा रहे हैं. यह देखकर हिरण्याक्ष क्रोधित हो उठा और भगवान विष्णु से युद्ध करने लगा. युद्ध में भगवान विष्णु ने हिरण्याक्ष का वध किया और पृथ्वी को उसके स्थान पर रख दिया.
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2026 में वराह जयंती कब है?
वराह, भगवान विष्णु का तीसरा अवतार है. हर साल भाद्रपद यानी भादो मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को वराह जयंती मनाई जाती है. पौराणिक मान्यता है कि सतयुग में इसी तिथि पर भगवान विष्णु ने पृथ्वी को समुद्र से बाहर निकाला था. पंचांग के अनुसार, 2026 में वराह जयंती रविवार, 13 सितंबर को मनाई जाएगी.
क्यों मनाई जाती है वराह जयंती?
पौराणिक मान्यता के अनुसार, वराह जयंती भगवान विष्णु के तीसरे वराह अवतार की वर्षगांठ पर मनाई जाती है. वराह अवतार से पहले भगवान विष्णु ने मत्स्य (मछली) और कूर्म (कछुआ) अवतार लिया था. भगवान विष्णु ने तीनों अवतार सतयुग में लिए थे.
भगवान विष्णु के अंशावतार की अगली कड़ी में हम आपको नरसिंह अवतार के बारे में बताएंगे.