Vibhuvana Sankashti Chaturthi: विभुवन संकष्टी चतुर्थी का पावन पर्व प्रत्येक तीन वर्ष के अंतराल पर पुरुषोत्तम मास के दौरान आता है. हिंदू धर्म में भगवान विष्णु को पुरुषोत्तम मास का स्वामी माना जाता है. इसी कारण मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक भगवान गणेश की पूजा, व्रत और चालीसा का पाठ करने से गणपति के साथ-साथ जगत के पालनहार भगवान नारायण का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि इस दिन सही नियमों के साथ गणेश चालीसा का पाठ किया जाए तो बिगड़े हुए कार्य भी सफल हो जाते हैं. लेकिन अक्सर लोग पाठ करते समय कुछ ऐसी गलतियां कर बैठते हैं, जिससे पूजा का पूरा फल नहीं मिल पाता. ऐसे में आइए जानते हैं विभुवन संकष्टी पर गणेश चालीसा पाठ के समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए.
गणेश चालीसा पाठ के नियम
- पूर्व या उत्तर दिशा: चालीसा का पाठ करते समय मुख हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए. इन दिशाओं को सकारात्मक ऊर्जा का केंद्र माना जाता है.
- साफ-सफाई और वस्त्र: स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करके ही पूजा स्थल पर बैठें और चालीसा का पाठ शुरू करें. यदि संभव हो तो लाल या पीले जैसे शुभ रंग के वस्त्र पहनें.
- आसन का प्रयोग: कभी भी सीधे जमीन पर बैठकर पाठ न करें. कुश या ऊन के आसन का प्रयोग करना शुभ माना जाता है.
- दीपक और नैवेद्य: पाठ शुरू करने से पहले भगवान गणेश के सामने घी का दीपक जलाएं और बप्पा को उनका प्रिय भोग अवश्य अर्पित करें.
चालीसा पाठ के समय न करें ये गलतियां
- बीच में उठना या बोलना: पाठ के बीच में किसी से बात करना या उठना एकाग्रता भंग करता है, जिससे पूजा अधूरी मानी जाती है.
- अशुद्ध उच्चारण: चालीसा की चौपाइयों का उच्चारण स्पष्ट और शुद्ध होना चाहिए. जल्दबाजी में गलत शब्द पढ़ने से बचें.
- सूतक या अशुद्धि में पाठ: यदि घर में सूतक (जन्म या मृत्यु का समय) हो, तो ऐसी स्थिति में मूर्ति स्पर्श या चालीसा पाठ करने से बचने की सलाह दी जाती है.
- तामसिक भोजन का सेवन: पूजा के समय शुद्धता का विशेष ध्यान रखें. संकष्टी चतुर्थी के दिन घर में लहसुन, प्याज, मांस या मदिरा का सेवन पूरी तरह वर्जित माना जाता है.
श्री गणेश जी की चालीसा
दोहा
जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल.
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥
चौपाई
जय जय जय गणपति गणराजू.
मंगल भरण करण शुभ काजू॥1॥
जय गजबदन सदन सुखदाता.
विश्व विनायक बुद्घि विधाता॥2॥
वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन.
तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥3॥
राजत मणि मुक्तन उर माला.
स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥4॥
पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं.
मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥5॥
सुन्दर पीताम्बर तन साजित.
चरण पादुका मुनि मन राजित॥6॥
धनि शिवसुवन षडानन भ्राता.
गौरी ललन विश्व-विख्याता॥7॥
ऋद्घि-सिद्घि तव चंवर सुधारे.
मूषक वाहन सोहत द्घारे॥8॥
कहौ जन्म शुभ-कथा तुम्हारी.
अति शुचि पावन मंगलकारी॥9॥
एक समय गिरिराज कुमारी.
पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी॥10॥
भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा.
तब पहुंच्यो तुम धरि द्घिज रुपा॥11॥
अतिथि जानि कै गौरि सुखारी.
बहुविधि सेवा करी तुम्हारी॥12॥
अति प्रसन्न है तुम वर दीन्हा.
मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥13॥
मिलहि पुत्र तुहि, बुद्धि विशाला.
बिना गर्भ धारण, यहि काला॥14॥
गणनायक, गुण ज्ञान निधाना.
पूजित प्रथम, रुप भगवाना॥15॥
अस कहि अन्तर्धान रुप है.
पलना पर बालक स्वरुप है॥16॥
बनि शिशु, रुदन जबहिं तुम ठाना.
लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना॥17॥
सकल मगन, सुखमंगल गावहिं.
नभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं॥18॥
शम्भु, उमा, बहु दान लुटावहिं.
सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं॥19॥
लखि अति आनन्द मंगल साजा.
देखन भी आये शनि राजा॥20॥
निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं.
बालक, देखन चाहत नाहीं॥21॥
गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो.
उत्सव मोर, न शनि तुहि भायो॥22॥
कहन लगे शनि, मन सकुचाई.
का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई॥23॥
नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ.
शनि सों बालक देखन कहाऊ॥24॥
पडतहिं, शनि दृग कोण प्रकाशा.
बोलक सिर उड़ि गयो अकाशा॥25॥
गिरिजा गिरीं विकल हुए धरणी.
सो दुख दशा गयो नहीं वरणी॥26॥
हाहाकार मच्यो कैलाशा.
शनि कीन्हो लखि सुत को नाशा॥27॥
तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो.
काटि चक्र सो गज शिर लाये॥28॥
बालक के धड़ ऊपर धारयो.
प्राण, मंत्र पढ़ि शंकर डारयो॥29॥
नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे.
प्रथम पूज्य बुद्घि निधि, वन दीन्हे॥30॥
बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा.
पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥31॥
चले षडानन, भरमि भुलाई.
रचे बैठ तुम बुद्घि उपाई॥32॥
धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे.
नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥33॥
चरण मातु-पितु के धर लीन्हें.
तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥34॥
तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई.
शेष सहसमुख सके न गाई॥35॥
मैं मतिहीन मलीन दुखारी.
करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी॥36॥
भजत रामसुन्दर प्रभुदासा.
जग प्रयाग, ककरा, दुर्वासा॥37॥
अब प्रभु दया दीन पर कीजै.
अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै॥38॥
श्री गणेश यह चालीसा.
पाठ करै कर ध्यान॥39॥
नित नव मंगल गृह बसै.
लहे जगत सन्मान॥40॥
दोहा
सम्वत अपन सहस्त्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश.
पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश॥
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