Tulsi Janm Katha: हिंदू धर्म में तुलसी को देवी लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है. जानिए कैसे राजा धर्मध्वज की तपस्या से प्रसन्न होकर माता लक्ष्मी ने तुलसी के रूप में जन्म लिया और क्यों उन्हें धरती पर एक विशेष उद्देश्य पूरा करना पड़ा.
तुलसी को माना जाता है देवी लक्ष्मी का स्वरूप
सनातन धर्म में तुलसी का पौधा अत्यंत पवित्र माना गया है. मान्यता है कि तुलसी देवी लक्ष्मी का ही अवतार हैं. ‘तुलसी’ शब्द का अर्थ होता है ‘अद्वितीय’ या ‘अनूठी’. यही कारण है कि हिंदू घरों में तुलसी की पूजा विशेष श्रद्धा के साथ की जाती है और इसे सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है.
राजा धर्मध्वज की कठोर तपस्या से प्रसन्न हुईं लक्ष्मी माता
पौराणिक कथा के अनुसार, राजा धर्मध्वज संतान प्राप्ति की इच्छा रखते थे. पुत्री पाने के लिए उन्होंने माता लक्ष्मी की कठोर तपस्या की. उनकी अटूट भक्ति और समर्पण से प्रसन्न होकर देवी लक्ष्मी प्रकट हुईं और वरदान देते हुए कहा कि वह स्वयं उनकी पुत्री के रूप में जन्म लेंगी. देवी के आशीर्वाद से तुलसी का जन्म हुआ.
बचपन से ही विष्णु भक्ति में लीन थीं तुलसी
राजमहल में जन्म लेने के बावजूद तुलसी का मन सांसारिक सुखों में नहीं लगा. वह हमेशा भगवान विष्णु की भक्ति और आराधना में मग्न रहती थीं. उनकी निष्काम भक्ति और समर्पण को देखकर देवताओं के सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी स्वयं उनके सामने प्रकट हुए.
गोलोक जाने की इच्छा और ब्रह्मा जी का आदेश
ब्रह्मा जी के दर्शन पाकर तुलसी ने उनसे निवेदन किया कि वह उन्हें भगवान विष्णु के धाम गोलोक पहुंचा दें, क्योंकि वह अपने प्रभु की सेवा करना चाहती थीं. तब ब्रह्मा जी ने उन्हें बताया कि गोलोक जाने से पहले उन्हें धरती पर एक महत्वपूर्ण दायित्व निभाना होगा.
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शंखचूड़ से विवाह के पीछे छिपा था दिव्य उद्देश्य
ब्रह्मा जी ने तुलसी से कहा कि उन्हें शंखचूड़ नामक असुर से विवाह करना होगा. यह विवाह केवल सांसारिक बंधन नहीं था, बल्कि एक दिव्य योजना का हिस्सा था. तुलसी के माध्यम से शंखचूड़ को मोक्ष प्राप्त होना था. इसी कारण तुलसी ने अपने जीवन का यह महत्वपूर्ण दायित्व स्वीकार किया.
