Solar Lunar Eclipse Mythological Story: साल 2026 का पहला सूर्य ग्रहण 17 फरवरी 2026 को लगेगा. यह ग्रहण शाम 5:31 बजे शुरू होकर 7:57 बजे तक रहेगा. यह सूर्य ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा, इसलिए इसका सूतक काल मान्य नहीं होगा. सूर्य ग्रहण केवल एक खगोलीय घटना नहीं है, बल्कि इसका गहरा संबंध ज्योतिष और पौराणिक कथाओं से भी माना जाता है.
ग्रहण और राहु-केतु का संबंध
हिंदू मान्यताओं के अनुसार, सूर्य और चंद्र ग्रहण का कारण राहु और केतु को माना जाता है. कहा जाता है कि राहु और केतु सूर्य और चंद्रमा से बदला लेने के लिए समय-समय पर उन्हें ग्रस लेते हैं, जिससे ग्रहण की स्थिति बनती है. इसके पीछे एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा है.
समुद्र मंथन की पौराणिक कथा
प्राचीन समय में जब दैत्यों ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया, तब देवताओं ने भगवान विष्णु से सहायता मांगी. भगवान विष्णु ने देवताओं को क्षीर सागर का मंथन करने की सलाह दी. उन्होंने कहा कि मंथन से निकलने वाला अमृत देवता पिएं, लेकिन असुरों को यह अमृत नहीं मिलना चाहिए, क्योंकि अमृत पीने से वे अमर हो जाते.
देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया. मंथन के बाद अमृत निकला, जिसे लेकर देवताओं और असुरों में विवाद होने लगा.
मोहिनी रूप और राहु का छल
तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया और अमृत बांटने की जिम्मेदारी ली. उन्होंने देवताओं और असुरों को अलग-अलग पंक्तियों में बैठाया. इसी दौरान एक असुर देवता का वेश बनाकर देवताओं की पंक्ति में बैठ गया.
सूर्य-चंद्र ने खोली पोल
सूर्य और चंद्रमा ने उस असुर को पहचान लिया और तुरंत भगवान विष्णु को इसकी जानकारी दी. लेकिन तब तक असुर अमृत पी चुका था. भगवान विष्णु ने तुरंत अपने सुदर्शन चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया. अमृत गले से नीचे नहीं उतरा था, इसलिए उसका सिर अमर हो गया.
राहु और केतु का जन्म
असुर का सिर राहु और धड़ केतु कहलाया. सूर्य और चंद्र द्वारा भेद खोलने के कारण राहु और केतु उनसे शत्रुता रखने लगे. यही कारण माना जाता है कि राहु और केतु समय-समय पर सूर्य और चंद्रमा को ग्रस लेते हैं, जिससे सूर्य और चंद्र ग्रहण होता है.
