(शुभंकर,सुलतानगंज,भागलपुर)
Shravani Mela 2026: श्रावणी मेला में सुलतानगंज से बाबा बैद्यनाथ धाम के लिए रवाना होने वाले लाखों कांवरियों के कंधे पर केवल उत्तरवाहिनी गंगा का पवित्र जल ही नहीं होता, बल्कि गंगा तट की पवित्र मिट्टी भी साथ चलती है. अजगैवीनाथ और नमामि गंगे घाट पर गंगाजल भरने के बाद कांवरिये जलपात्र के मुंह को कपड़े से बांधकर उस पर गंगा मिट्टी का लेप लगाते हैं. यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और आज भी श्रावणी मेला की सबसे खास पहचान मानी जाती है.
आस्था के साथ जुड़ा है व्यावहारिक महत्व
करीब 98 किलोमीटर की पैदल यात्रा में मिट्टी का लेप जलपात्र को पूरी तरह सील कर देता है, जिससे गंगाजल की एक बूंद भी बाहर नहीं निकलती. पश्चिम बंगाल से आए शिवभक्त अरुण बम बताते हैं कि गंगा मिट्टी के बिना जलपात्र अधूरा माना जाता है. यह केवल परंपरा नहीं बल्कि बाबा बैद्यनाथ तक पवित्र जल सुरक्षित पहुंचाने का सबसे भरोसेमंद तरीका भी है.
धार्मिक मान्यता क्या कहती है?
धर्माचार्य पंडित संजीव झा के अनुसार, गंगा मिट्टी में देवी गंगा का दिव्य अंश माना जाता है. यही कारण है कि श्रद्धालु इसे शुभ और पूजनीय मानते हैं. कई लोग इसे अपने घर ले जाकर गृह पूजा, धार्मिक अनुष्ठान और मांगलिक कार्यों में भी उपयोग करते हैं. परंपरा यह भी कहती है कि यदि गंगाजल उपलब्ध न हो तो सामान्य जल में गंगा मिट्टी का स्पर्श कर उसे धार्मिक कार्यों में इस्तेमाल किया जा सकता है.
स्थानीय लोगों की आजीविका से भी जुड़ी परंपरा
श्रावणी मेला शुरू होने से पहले स्थानीय परिवार गंगा तट से उपयुक्त मिट्टी एकत्र कर छोटे-छोटे गोले तैयार करते हैं. मेला के दौरान घाटों के आसपास पूजा सामग्री की दुकानों पर यही गंगा मिट्टी श्रद्धालुओं को उपलब्ध कराई जाती है. गंगा का जलस्तर बढ़ने पर उपयुक्त मिट्टी मिलना कठिन हो जाता है, इसलिए दुकानदार पहले से इसका संग्रह कर लेते हैं. यह परंपरा आस्था के साथ स्थानीय लोगों की आजीविका का भी महत्वपूर्ण माध्यम बन चुकी है.
