Tilak Importance: सनातन धर्म में तिलक लगाने की परंपरा को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है. ब्रह्मवैवर्त पुराण के ब्रह्मपर्व 26 में उल्लेख मिलता है कि स्नान, दान, तप, होम, देवपूजन और पितृकर्म जैसे धार्मिक कार्य यदि तिलक लगाए बिना किए जाएं, तो उनका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता. शास्त्रों के अनुसार ब्राह्मण को संध्या, तर्पण और अन्य वैदिक कर्म तिलक धारण करने के बाद ही करने चाहिए.
अलग-अलग अंगुलियों से तिलक लगाने का महत्व
स्कंदपुराण में तिलक लगाने की विधि और उसके प्रभाव का भी वर्णन किया गया है. अनामिका अंगुली से तिलक लगाने पर शांति की प्राप्ति होती है. मध्यमा अंगुली से तिलक करने से आयु में वृद्धि होती है, अंगूठे से लगाया गया तिलक स्वास्थ्य प्रदान करता है, जबकि तर्जनी से तिलक लगाने पर मोक्ष की प्राप्ति मानी गई है.
देवी-देवताओं के अनुसार तिलक के प्रकार
शास्त्रों में विभिन्न उपासना पद्धतियों के अनुसार तिलक के स्वरूप भी बताए गए हैं. विष्णु भक्त ऊर्ध्व तिलक यानी दो सीधी रेखाएं लगाते हैं. शक्ति उपासक दो बिंदियों का तिलक धारण करते हैं, जबकि भगवान शिव के भक्त त्रिपुंड स्वरूप तीन आड़ी रेखाओं वाला तिलक लगाते हैं. धार्मिक मान्यता है कि त्रिपुंड धारण कर जप, यज्ञ और देवपूजन करने वाले व्यक्ति मृत्यु पर विजय प्राप्त करते हैं.
तिलक का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक पक्ष
ललाट यानी माथे के मध्य भाग को शरीर का अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र माना गया है. महर्षि याज्ञवल्क्य ने इसे शिवनेत्र और दिव्य चेतना का स्थान बताया है. दोनों भौंहों के बीच स्थित यह स्थान ‘आज्ञा चक्र’ कहलाता है, जहां से विचारों और चेतना का प्रवाह होता है. मान्यता है कि यहां तिलक लगाने से आज्ञा चक्र जाग्रत होता है और व्यक्ति के ओज, तेज तथा मानसिक ऊर्जा में वृद्धि होती है.
