Masik Shivratri Vrat Katha: हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मासिक शिवरात्रि का व्रत रखा जाता है. मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव की विधि-विधान से पूजा करने और व्रत रखने से भक्तों के सभी दुख-दर्द दूर होते हैं. साथ ही जीवन में सुख-समृद्धि आती है. इस दिन पूजा के साथ व्रत कथा का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है. कहते हैं कि ऐसा करने से पूजा का फल दोगुना हो जाता है.
पौराणिक कथा
गरीब शिकारी चित्रभानु की कहानी
प्राचीन काल में चित्रभानु नाम का एक गरीब शिकारी था. वह जंगलों में पशुओं का शिकार करके अपने परिवार का भरण-पोषण करता था. गरीबी के कारण उसने नगर के एक साहूकार से काफी कर्ज ले रखा था. जब वह समय पर पैसा नहीं लौटा पाया, तो क्रोधित साहूकार ने उसे एक शिव मठ में बंदी बना लिया.
अनजाने में हुआ शिवरात्रि का व्रत
संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी. रात भर मंदिर में भगवान शिव के भजन और पूजा होती रही. चित्रभानु भूखा-प्यासा वहीं बैठा सब देखता और सुनता रहा. इस तरह अनजाने में ही उसका शिवरात्रि का व्रत और कीर्तन-श्रवण पूरा हो गया.
बेलपत्र से हुई भगवान शिव की पूजा
अगले दिन साहूकार ने उसे चेतावनी देकर छोड़ दिया. इसके बाद शिकारी तुरंत शिकार की तलाश में जंगल की ओर निकल गया, क्योंकि उसका परिवार भूखा था. वह कई घंटों तक शिकार की तलाश करता रहा, लेकिन उसे कोई जानवर नहीं मिला. थककर वह एक तालाब के किनारे बेल के पेड़ पर चढ़ गया ताकि रात बिता सके. उसे यह नहीं पता था कि उस पेड़ के ठीक नीचे पत्तों से ढका हुआ एक शिवलिंग है.
रात भर वह व्याकुल होकर पेड़ के पत्ते तोड़-तोड़कर नीचे गिराता रहा. वे पत्ते सीधे शिवलिंग पर गिर रहे थे. इस तरह बिना जाने ही उसका बेलपत्र अर्पण और रात भर का जागरण सफल हो रहा था.
उस रात शिवरात्रि के चार पहरों में चार अद्भुत घटनाएं घटीं.
प्रथम पहर: एक गर्भवती हिरणी पानी पीने आई. शिकारी ने तीर साधा, तो कुछ बेलपत्र शिवलिंग पर गिर पड़े. हिरणी ने विनती की, “मैं गर्भवती हूं, मुझे जाने दो. अपनी संतान को जन्म देने के बाद मैं लौट आऊंगी.” दया आ जाने पर शिकारी ने उसे छोड़ दिया.
द्वितीय पहर: दूसरी हिरणी आई. शिकारी ने फिर निशाना साधा. लेकिन हिरणी ने कहा, “मैं अपने पति की खोज में हूँ. उनसे मिलकर वापस आ जाऊंगी.” यह सुनकर शिकारी का दिल पिघल गया और उसने उसे भी जाने दिया.
तृतीय पहर: तीसरी हिरणी अपने बच्चों के साथ आई. उसने कहा, “इन बच्चों को इनके पिता को सौंपकर मैं स्वयं आहार बनने लौट आऊंगी.” शिकारी का कठोर हृदय फिर पिघल गया और उसने उन सबको भी जाने दिया.
चतुर्थ पहर: अंत में एक हिरण आया. जिन हिरणियों और बच्चों को शिकारी ने छोड़ा था, वह उसी हिरण का परिवार था. शिकारी ने उसे मारने के लिए धनुष उठाया, तो मृग ने रुककर कहा, “हे शिकारी! अगर तुमने मेरी पत्नियों और बच्चों को छोड़ दिया है, तो मुझे भी जीवित रहने दो ताकि मैं उनसे मिल सकूँ. और अगर तुमने उन्हें मार दिया है, तो मुझे भी मार दो, क्योंकि मैं उनके बिना नहीं रह सकता.”
शिकारी का हृदय परिवर्तन
मृग की अपने परिवार के प्रति ममता और सत्यनिष्ठा देखकर शिकारी का पत्थर जैसा दिल पिघल गया. उसे अपनी क्रूरता पर पछतावा हुआ और उसने उस मृग को भी जाने दिया. जब शिकारी ने दया भाव से धनुष नीचे रखा, तब फिर से बेलपत्र शिवलिंग पर गिर पड़े. इस तरह अनजाने में ही उसके चारों पहरों की शिव पूजा पूरी हो गई और महादेव प्रसन्न हो गए.
भगवान शिव की कृपा से मिला मोक्ष
इस घटना के बाद शिकारी ने शिकार छोड़ दिया और मेहनत-मजदूरी करके जीवन बिताने लगा. धीरे-धीरे उसकी आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ और उसने साहूकार का कर्ज भी लौटा दिया. इसके बाद जब चित्रभानु की मृत्यु हुई, तो यमराज के दूत उसे लेने आए. लेकिन चूंकि उसने अनजाने में ही सही, पर पूरी श्रद्धा के साथ शिवरात्रि का व्रत, जागरण और जीव-दया का पालन किया था, इसलिए भगवान शिव के दूतों ने उसे यमदूतों से छुड़ा लिया और शिवलोक ले गए. इस प्रकार शिकारी को मोक्ष की प्राप्ति हुई.
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