Kashi Vishwanath Jyotirlinga: महाशिवरात्रि पर करें बाबा विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन, इस धाम में स्वयं वास करते हैं महादेव

Kashi Vishwanath Jyotirlinga: उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर को धर्म नगरी काशी भी कहा जाता है. यहीं गंगा नदी के तट पर स्थित है बाबा विश्‍वनाथ का मंदिर, जिसे काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाता है. आइए जानते है काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग से जुड़ी कुछ रोचक बातें

Kashi Vishwanath Jyotirlinga: सनातन धर्म में महाशिवरात्रि पर्व का विशेष महत्व है, इस दिन भगवान शिव व माता पार्वती की उपासना करने से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है. वहीं कई तीर्थयात्रियों का मानना ​​है कि इस दिन ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने से उन्हें मोक्ष, या जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिल जाती है. धार्मिक मान्यता के अनुसार ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के बारह अलग-अलग रूपों का प्रतिनिधित्व करते हैं, और प्रत्येक स्थल में अद्वितीय शक्तियां होती हैं. शास्त्रों में बताया गया है कि महाशिवरात्रि पर्व के दिन साधक को सभी 12 ज्योतिर्लिंग का स्मरण करके भगवान शिव की उपासना करनी चाहिए. बता दें कि देश के विभिन्न हिस्सों में प्रसिद्द 12 ज्योतिर्लिंग स्थापित हैं, जिनके दर्शन के लिए न केवल देशभर से बल्कि विदेशों से भी बड़ी संख्या में शिवभक्त आते हैं. आज हम बात करेंगे भगवान शिव के सातवें प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की, जिनका मंदिर पवित्र मां गंगा के तट पर स्थापित है. आइए जानते हैं काशी विश्वनाथ मंदिर से जुड़ी पौराणिक कुछ रोचक बातें.

गंगा नदी के तट पर स्थित है बाबा विश्‍वनाथ का मंदिर

उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर को धर्म नगरी काशी भी कहा जाता है. यहीं गंगा नदी के तट पर स्थित है बाबा विश्‍वनाथ का मंदिर, जिसे काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाता है. धार्मिक मान्यता है कि भगवान विश्वनाथ काशी में ब्रह्मांड के स्वामी के रूप में निवास करते हैं. कैलाश छोड़कर भगवान शिव ने यहीं अपना स्थाई निवास बनाया था. कहा जाता है कि शिव की नगरी काशी में जिसकी मृत्यु होती है, उसे सीधा मोक्ष मिलता है.

कब हुई थी काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना

काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण वर्ष 1780 में महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने कराया था और फिर कई राजाओं ने इस मंदिर में पूजा-पाठ और दान किया था. किवदंतियों के अनुसार जब भगवान शिव और माता पावर्ती का विवाह हुआ था, तब महादेव का निवास स्थान कैलाश पर्वत था और पार्वती मां अपने पिता के घर रहती थीं. एक बार जब शिव जी माता पार्वती से मिलने आए तो माता ने उन्हें अपने साथ ले जाने की प्रार्थना की. माता पार्वती की बात मानकर भगवान शिव उन्हें काशी ले आए और तब से यहीं बस गए. मान्यता है कि भगवान श्री हरि विष्णु ने भी काशी में ही तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया था.

भगवान शिव की त्रिशूल पर बसी है काशी नगरी

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव की यह नगरी उनके त्रिशूल की नोक पर बसी हुई है और बाबा विश्वनाथ को विश्वेश्वर यानि विश्व के शासक के नाम से भी जाना जाता है. बाबा विश्वनाथ का यह मंदिर युगो-युगांतर से यहां मौजूद है, जिसका उल्लेख महाभारत जैसे पौराणिक वेद-ग्रंथ में किया गया है. लेकिन 11 वीं सदी में राजा हरिश्चन्द्र ने करवाया था. कई महान साधु-संत जैसे आदि गुरु शंकराचार्य, स्वामी विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस, गोस्वामी तुलसीदास भगवान काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन कर चुके हैं.

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काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग से जुड़ी कुछ रोचक बातें

  • काशी में भगवान विष्णु के अश्रु गिरे थे, जिससे बिंदु सरोवर और पुष्कर्णी का निर्माण हुआ था.
  • बाबा विश्वनाथ के दर्शन से पहले उनके गण भैरवनाथ के दर्शन को अनिवार्य माना जाता है.
  • काशी के कोतवाल अर्थात काल भैरव की अनुमति के बिना दर्शन का फल प्राप्त नहीं होता है.
  • काशी को मोक्षदायिनी भी कहा जाता है, क्योंकि जो मनुष्य यहां शरीर त्यागता है वह सांसारिक बंधनों से मुक्त हो जाता है.
  • काशी विश्वनाथ मंदिर अनादि काल से शैव दर्शन का केंद्र रहा है और स्कंद पुराण में इसका उल्लेख मिलता है.
  • काशी विश्वनाथ मंदिर में एक मुहर 9-10 शताब्दी ईसा पूर्व की है जो राजघाट की खुदाई में खोजी गई थी.
  • मंदिर का उल्लेख 635 ई. में बनारस आए एक विदेशी यात्री ने भी किया था.
  • काशी विश्वनाथ मंदिर को समय-समय पर कई मुस्लिम शासकों द्वारा ध्वस्त किया गया और उनमें अंतिम शासक औरंगजेब था.
  • काशी विश्वनाथ मंदिर की वर्तमान संरचना महारानी अहिल्या बाई होल्कर द्वारा वर्ष 1780 में बनवाई गई थी.

कैसे पहुंचें काशी?

उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर गंगा नदी के तट पर बसा हुआ है. वाराणसी हवाई मार्ग द्वारा देश के तमाम शहरों से जुड़ा है. वाराणसी और दिल्ली के बीच रोजाना सीधी उड़ानें संचालित होती हैं. वाराणसी प्रमुख रेल जंक्शन भी है. यह शहर देश के सभी महानगरों और प्रमुख शहरों से रेल सेवा से जुड़ा है. सावन के पवित्र महीने में यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है.

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लेखक के बारे में

राधेश्याम कुशवाहा ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से MJ (मास्टर ऑफ जर्नलिज्म) की शिक्षा प्राप्त करने के बाद अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत भोपाल से प्रकाशित राज एक्सप्रेस समाचार पत्र से की. इसके बाद उन्होंने समय जगत, राजस्थान पत्रिका और हिंदुस्तान जैसे प्रतिष्ठित समाचार संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं. वर्तमान में वे प्रभात खबर के डिजिटल विभाग में धर्म, अध्यात्म एवं राशिफल डेस्क पर कार्यरत हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में 13 वर्षों का अनुभव रखने वाले राधेश्याम कुशवाहा को ज्योतिष शास्त्र, पंचांग गणना, ग्रह गोचर, नक्षत्र परिवर्तन, व्रत-त्योहारों की तिथियों तथा शुभ मुहूर्तों का गहन ज्ञान है. अपनी विशेषज्ञता के आधार पर वे धर्म-अध्यात्म और राशिफल से जुड़ी सटीक, तथ्यपरक एवं विश्वसनीय खबरें लिखते हैं. धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन में उनकी विशेष रुचि है. इसके अलावा राजनीति, अपराध और प्रेरणादायक (पॉजिटिव) विषयों पर लेखन में भी उनकी गहरी रुचि है.

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