Gajanana Sankashti Chaturthi 2026: श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को गजानन संकष्टी चतुर्थी मनाई जाती है. धार्मिक मान्यता है कि इस दिन प्रथम पूज्य भगवान श्रीगणेश की विधि-विधान से पूजा और व्रत करने से जीवन के सभी विघ्न, संकट और बाधाएं दूर होती हैं. यदि आप आज गजानन संकष्टी चतुर्थी का व्रत रख रहे हैं, तो पूजा के समय इस पौराणिक व्रत कथा का पाठ अवश्य करें. मान्यता है कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को इस व्रत की महिमा बताई थी.
गजानन संकष्टी चतुर्थी की पौराणिक व्रत कथा
महाभारत काल का प्रसंग
पौराणिक कथा के अनुसार, जब पांडव जुए में अपना समस्त राज्य हारकर वनवास भोग रहे थे, तब धर्मराज युधिष्ठिर अत्यंत दुखी और चिंतित थे. उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से विनम्रतापूर्वक कहा, "हे पुरुषोत्तम! कृपा करके ऐसा उपाय बताइए, जिससे हमारे सभी संकट दूर हों और भविष्य में हमें ऐसे कष्टों का सामना न करना पड़े." युधिष्ठिर की प्रार्थना सुनकर भगवान श्रीकृष्ण बोले, "हे राजन! मैं तुम्हें एक ऐसे सिद्ध और कल्याणकारी व्रत के बारे में बताता हूं, जो सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला है."
माता पार्वती को भगवान गणेश ने बताया व्रत का विधान
श्रीकृष्ण ने आगे बताया कि सतयुग में पर्वतराज हिमालय की पुत्री माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए वर्षों तक कठोर तपस्या की. जब लंबे समय तक भगवान शिव प्रकट नहीं हुए, तब माता पार्वती ने देवर्षि नारद के कहने पर भगवान श्रीगणेश का स्मरण किया.
माता पार्वती के स्मरण करते ही विघ्नहर्ता भगवान गणेश प्रकट हुए. माता पार्वती ने उनसे कहा, "हे पुत्र! कठोर तपस्या के बाद भी मुझे शिवजी की प्राप्ति नहीं हुई. कृपया ऐसा व्रत बताइए, जिससे मेरी मनोकामना पूर्ण हो सके." तब भगवान गणेश ने कहा, "हे अचलसुते! श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को किया जाने वाला संकष्टी चतुर्थी व्रत सभी पापों और कष्टों का नाश करने वाला है. जो भक्त श्रद्धा और विधि-विधान से यह व्रत करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं."
संकष्टी चतुर्थी व्रत एवं पूजा विधि
भगवान गणेश ने माता पार्वती को इस व्रत की विधि बताते हुए कहा
- प्रातःकाल स्नान करके चंद्रोदय तक निराहार व्रत रखने का संकल्प लें.
- संध्या के समय सफेद तिल मिले जल से स्नान करें.
- सोने, चांदी, तांबे अथवा मिट्टी के कलश में जल भरकर उस पर वस्त्र बिछाएं और अष्टदल कमल बनाकर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें.
- भगवान गणेश का षोडशोपचार पूजन करें तथा पाद्य, अर्घ्य, आचमन, वस्त्र, यज्ञोपवीत, रोली, चंदन, दूर्वा, धूप, दीप और मोदक या लड्डू का भोग अर्पित करें.
- शुद्ध घी से बने 15 मोदक या लड्डू तैयार करें.
- इनमें से 5 लड्डू भगवान गणेश को अर्पित करें, 5 योग्य ब्राह्मण को दान दें और शेष 5 प्रसाद के रूप में परिवार के साथ ग्रहण करें.
चंद्रदेव को अर्घ्य देने का विधान
चंद्रोदय के बाद चंद्रदेव को जल, दूध और अक्षत मिलाकर अर्घ्य दें. अर्घ्य अर्पित करते समय प्रार्थना करें "हे क्षीरसागर से उत्पन्न, माता लक्ष्मी के भ्राता और रोहिणी के पति चंद्रदेव! मेरे द्वारा अर्पित इस अर्घ्य को स्वीकार करें तथा मेरे जीवन के सभी कष्टों का नाश करें." इसके बाद भगवान गणेश से क्षमा प्रार्थना करें, ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करें और दही तथा भोग ग्रहण करके व्रत का पारण करें.
व्रत की अवधि और उद्यापन का महत्व
भगवान गणेश ने माता पार्वती से कहा कि यदि कोई व्यक्ति जीवनभर यह व्रत न कर सके, तो कम से कम 21 वर्षों तक अथवा एक वर्ष तक प्रत्येक मास की संकष्टी चतुर्थी का व्रत अवश्य करे. यदि यह भी संभव न हो, तो केवल श्रावण मास की गजानन संकष्टी चतुर्थी का व्रत विधि-विधान से करने और उसका उद्यापन करने से भी भगवान गणेश की कृपा प्राप्त होती है.
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