Mesh Sankranti 2024 : दो तरह के वर्षों के आधार पर होता है हिंदू पर्व-त्योहारों का निर्धारण

ज्योतिष के अनुसार, महाभारत काल में वर्ष का प्रथम मास मार्गशीर्ष था, इसीलिए इसका एक नाम आग्रहायण (अगहन) है. कभी कार्तिक, कभी माघ तो कभी वैशाख भी आदि मास भी रहे, पर वर्तमान में चैत्र पर स्थिरता बनी हुई है. इसके पीछे चांद्र और सौर मास की प्रधानता रही है. इसे विस्तार से जानते हैं…

ज्योतिष के अनुसार, आज रात्रि (शनिवार, 13 अप्रैल) को 11:17 बजे भुवन भास्कर का मीन राशि से मेष राशि में गमन होने जा रहा है, जिसे हम मेष संक्रांति व सतुआनी भी कहते हैं. महावीर पंचांग के अनुसार, संक्रमण काल रात्रि 11:19 बजे मानते हुए पूर्व-पर 16 घटी पुण्यकाल बताता है. माने यह कि इस पंचांग के अनुसार, 13 तारीख को सायं 4:31 बजे से 14 तारीख को प्रातः 6:07 बजे तक पुण्यकाल मान्य होगा.

मार्कण्डेय शारदेय (ज्योतिष व धर्मशास्त्र विशेषज्ञ)

Mesh Sankranti 2024 : हमारे भारतवर्ष में चांद्र और सौर मुख्यतः दो तरह के वर्षों की समानांतर मान्यता है. इन्हीं दोनों के आधार पर हमारे समस्त पर्व-त्योहारों का निर्धारण भी है. चांद्र मास प्रतिपदा से तो सौर मास संक्रांति से प्रारंभ होता है- ‘सौरं संक्रमणं प्रोक्तं चान्द्रं प्रतिपदादकम्’ (नारद संहिताः3.6).

पुनः चांद्र मास के दो रूप हैं – दर्शांत (शुक्ल प्रतिपदा से अमावस्या तक) तथा पूर्णिमांत (कृष्ण प्रतिपदा से पूर्णिमा तक). इनमें दर्शांत को वैदिक एवं पूर्णिमांत को स्मार्त माना गया है – ‘दर्शान्तो वैदिको मासो राकान्तो स्मार्त उच्यते।’ इसीलिए जहां चैत्र, वैशाख आदि चंद्र-संबंधी मासों की धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक महत्ता रही, वहीं सूर्य से संबंधित मेष, वृष आदि सौर मासों की भी. चांद्र वर्ष का प्रारंभ चैत्र मास से होता है, तो सौर वर्ष का आरंभ मेष राशि में सूर्य के संक्रमण से.

ऐसी बात नहीं कि हमारे यहां सदा से यही परंपरा रही हो. वैदिक काल में ही पहले शरद ऋतु से था, बाद में वसंत से हो गया. चांद्र मासों में तो अधिक परिवर्तन मिलता है. महाभारत काल में प्रथम मास मार्गशीर्ष था, इसीलिए इसका एक नाम आग्रहायण (अगहन) है. कभी कार्तिक, कभी माघ तो कभी वैशाख भी आदि मास रहे, पर वर्तमान में चैत्र पर स्थिरता बनी हुई है. संभव है, मेष की संक्रांति कभी चैत में तो कभी वैशाख में होती आयी है, इसलिए विद्वानों के एक पक्ष ने चैत्रादि माना, तो दूसरे ने वैशाखादि. इसीलिए ‘निर्णयसिन्धु’ ने वैशाख के अंतर्गत मेष संक्रांति को स्थान दिया है, तो परवर्ती संग्रह ग्रन्थ ‘धर्मसिन्धु’ ने चैत में.

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खैर, मेष संक्रांति और वैशाख में साम्य रख वैशाख-स्नानादि चैत्र शुक्ल एकादशी या चैत्र-पूर्णिमा या मेष संक्रांति से धर्मशास्त्रों द्वारा निर्दिष्ट है. इसमें स्नान करने का जो मंत्र आया है, उसमें कहा गया है- ‘‘हे मधुसूदन! मेष संक्रांति में वैशाख में पूरे मास तक प्रातःकाल में नियमपूर्वक स्नान करूंगा/करूंगी. आप प्रसन्न हों’’ –

वैशाखं सकलं मासं मेष-संक्रमणं रवेः।
प्रातः सनियमःस्नास्ये प्रीयतां मधुसूदन।।

सत्तू, जलपूर्ण घट आदि के दान का भी समान ही माहात्म्य

स्पष्ट है कि मेषगत सौर मास को वैशाख से जोड़कर देखा गया है, इसीलिए पंजाबी बिरादरी में इसे बैसाखी का उत्सव और बंगाल में पोइला बोयशाख कहा जाता है. सत्तू, जलपूर्ण घट आदि के दान का भी समान ही माहात्म्य है. चूंकि मेष और तुला संक्रांति में सूर्य का गोल-परिवर्तन होता है, अर्थात् मेष में उत्तरी गोल पर और तुला में दक्षिणी गोल पर सूर्य का गमन होता है, इसलिए इन दोनों संक्रांतियों को विषुव व विषुवती भी कहते हैं. संभवतः इसी विषुव का विकसित रूप ‘बिहू’ है. पुनः ‘बोहाग बिहू’ और ‘काती बिहू’ क्रमशः बैसाखी तथा कार्तिकी का वाचक हो. कारण यह कि प्रायः वैशाख में मेष संक्रांति और कार्तिक में तुला संक्रांति होती है. बाद में मकर संक्रांति से संबंधित माघी को भी ‘बिहू’ कहने का प्रचलन हुआ हो. इसी तरह केरल में विषु/विशु विषुव का ही वाचक है.

सूर्य का राजपद है मेष संक्रांति

मेष संक्रांति सूर्य का राजपद है, क्योंकि इस राशि पर आकर वह उच्च का हो जाता है. 23 मार्च और 23 सितंबर दिनवृद्धि एवं रात्रिवृद्धि के क्रम हैं. संभव है, इन्हीं से जुड़े मेष तथा तुला के संक्रमण की ज्योतिषीय और संस्कृतिक मान्यता विकसित हुई हो. दिन का बढ़ना दिनेश की प्रबलता है, तो रात्रि का बढ़ना उनकी निर्बलता.इसीलिए मेषगत रवि उच्च का तथा तुलागत नीच का कहलाता है. दूसरी ओर मकर संक्रांति को देवों का दिनारंभ एवं कर्क संक्रांति को निशारंभ माना गया है, तो मेष संक्रांति मध्याह्न है. सौर वर्षारंभ भी यहीं से है, इसलिए मेषगत वैशाख की बड़ी महिमा है. इस समय रबी की फसलें कट चुकी होती हैं और गृहस्थों के घर को खुशहाल कर देती हैं. वातावरण भी अनुकूल ही रहता है. पुनः वर्ष-प्रतिपदा (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा) के दिन के आधार पर ही वर्षपति का निर्धारण है, तो मेष संक्रांति के दिन के आधार पर मंत्री का. इस तरह वर्षमंगल के लिए इस दिन यथाशक्ति उपवास के साथ विष्णु, शिव, सूर्य आदि की आराधना, पितरों की प्रीति के लिए तर्पण व पिण्ड-रहित श्राद्ध तथा समयोपयोगी योग्य पात्रों को दान, ये सब ऋषि-परंपरा द्वारा स्थापित मेषोत्सव की हमारी संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग हैं.

पुण्यकाल को लेकर क्या हैं धार्मिक मान्यताएं

अब इस संक्रांति से संबंधित कृत्यों की बात करें, तो इसके संक्रमण काल के पूर्वापर 16-16 नाड़ियां, अर्थात् 6.24 घंटे पूर्व के और 6.24 घंटे बाद के पुण्यकाल माने गये हैं, परंतु 8-8 नाड़ियां यानी 3.12 घंटे पहले और 3.12 बाद का समय अति विशिष्ट है. आधी रात के पहले होने पर पूर्व दिन के उत्तरार्ध, आधी रात के बाद होने पर अगले दिन का पूर्वार्ध एवं मध्य रात्रि में होने पर दोनों दिन पुण्यकाल माना गया है. इसका पुण्य अन्य दिन किये गये स्नान-दान आदि की अपेक्षा अनंत गुना कल्याणकारी माना गया है. इसमें सत्तू और जलपूर्ण घटदान का विशेष महत्व है- ‘मेषादौ शक्तवो देया वारिपूर्णा च गर्गरी’. इसीलिए इसे ‘सतुआनी’ भी कहा जाता है.

पुनः पितरों के उद्देश्य से भी सत्तू, जलभरा घड़ा, जूता-चप्पल, खड़ाऊं, छाता आदि के दान को पापनाशक एवं पुण्यकारक बताया गया है –

यो ददाति हि मेषादौ शक्तून् अम्बु-घटान्वितान्।
पितृन् उद्दिश्य विप्रेभ्यः सर्वपापैःप्रमुच्यते।
विप्रेभ्यः पादुके छत्रं पितृभ्यो विषुवे शुभम्’।।

(तत्त्वचिन्तन)

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By Rajnikant pandey

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