जीवन की रहस्यमयता

हमारा समग्र जीवन ही रहस्यपूर्ण है- एक छोटे से पत्थर से लेकर आकाश के सूरज तक, एक छोटे बीज से लेकर बड़े-बड़े वृक्षों तक- सभी कुछ, जो भी है, अत्यंत रहस्यपूर्ण है. लेकिन वह रहस्य हमें दिखायी नहीं पड़ता, क्योंकि रहस्य को देखने के लिए जैसी पात्रता चाहिए, हृदय के द्वार जैसे खुले होने चाहिए, […]

हमारा समग्र जीवन ही रहस्यपूर्ण है- एक छोटे से पत्थर से लेकर आकाश के सूरज तक, एक छोटे बीज से लेकर बड़े-बड़े वृक्षों तक- सभी कुछ, जो भी है, अत्यंत रहस्यपूर्ण है. लेकिन वह रहस्य हमें दिखायी नहीं पड़ता, क्योंकि रहस्य को देखने के लिए जैसी पात्रता चाहिए, हृदय के द्वार जैसे खुले होने चाहिए, वे शायद खुले नहीं हैं.

शायद हम किसी कारागृह के भीतर बैठे हैं, सब खिड़कियों और द्वारों को बंद करके, आंखों को बंद करके. और तब अगर हमारा जीवन अंधकारपूर्ण और उदासी से भर गया हो, चिंताओं और तनावों ने हमारे घर में निवास बना लिया हो; तो आश्चर्य नहीं है. यह स्वाभाविक है, यह होगा. जीवन के रहस्य को देखने की आंख मनुष्य रोज-रोज खोता चला गया है. जितने हम सभ्य होते गये हैं, उतनी हमने जीवन के रहस्य को देखने की आंख खो दी है.

जितने हम समझदार होते गये हैं, जितना हमारा ज्ञान बढ़ता गया है, उतना हमने जीवन का जो विस्मय है, जीवन में जो अबूझ है, जीवन में जो पहेली की तरह है; जिसका कोई सुलझाव नहीं, उन सबसे हमने अपने को हटा लिया है. आदमी ने यह निष्कर्ष ले लिया है कि करीब-करीब सब हमें ज्ञात है, और ज्ञात नहीं है, वह भी ज्ञात हो जायेगा. जीवन में कुछ भी अट्ठेय नहीं, सब कुछ जाना जा सकता है. हमारा ऐसा सोचना सत्य से बिल्कुल ही विपरीत बात है. जो कुछ भी हम थोड़ा सा जान लेते हैं, वह जानना परिचय है, ज्ञान नहीं. परिचय को हम ज्ञान समझ लेते हैं! यही हमारी एक बड़ी भूल है.

आचार्य रजनीश ओशो

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