वैशाख में पुण्यलाभ हेतु उज्जैन से बढ़ कर दूजा तीर्थ नहीं
हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार मृत्युलोक में स्नान-दान कर यम-नियम से रहते हुए मनुष्य अधिकाधिक पुण्य कमा सकता है. सनातन धर्म में प्रभु के करीब जाने या उनसे एकाकार होने के अनेक उपाय विविध ग्रंथों में वर्णित हैं. यहां तक कि देशकाल, ग्रह-नक्षत्र, समय, मुहूर्त व योग के अनुरूप तीर्थो और वहां से मिलनेवाले पुण्य के परिमाण तक निर्धारित हैं.
स्कंदपुराण कहता है कि भक्त के लिए वैशाख मास में अवंतिका (उज्जैन), माघ मास में प्रयाग व कार्तिक मास में पुष्कर तीर्थ करना सर्वाधिक पुनीत व अक्षय फलदायी है. वैशाख मास के मेष के मेषस्थ सूर्य में वैशाख कृष्ण दशमी से अमावस्या तक उज्जैन में पांच कोस की पदयात्रा करते हुए पंचेशानि यानी शिव के पांच ईशान रूपों (महाकालेश्वर व उनके चारों द्वारपाल रूपी सिद्धलिंगों पिंगलेश्वर, कायावरोहणोश्वर, बिल्वेश्वर व दुर्धरेश्वर) के दर्शन का विधान है.
कहते हैं,जीवनभर के काशीवास से ज्यादा महती व पुण्यकारी काम वैशाख मास में पांच दिनों का अवंतीवास है. वैशाख कृष्ण दशमी पर उज्जैन में शिप्रा स्नान व नागचंद्रेश्वर पूजनोपरांत पंचकोसी यात्रा आरंभ होती है, जो 118 किलोमीटर की परिक्र मा के पश्चात कर्क तीर्थवास से समाप्त होती है और तत्काल अष्टतीर्थ यात्रा आरंभ होकर वैशाख अमावस्या को शिप्रा स्नान के उपरांत पंचकोसी यात्रा संपन्न हो जाती है.
दोष-पापों से मुक्ति पाने व पुण्य कमाने हेतु देश-विदेश के श्रद्धालु पंचेशानि यात्रा के लिए उज्जैन पहुंचने लगे हैं. द्वादश ज्योतिर्लिगों में श्रीमहाकालेश्वर की नगरी उज्जैन (प्राचीन काल में अवंतिकापुरी) की महिमा न्यारी है. यहां विराजमान महाकालेश्वर स्वयंभू दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिग है. ज्योतिष-शास्त्र के अनुसार दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिग का दर्शन अत्यंत शुभ है. प्रधान शिवतीर्थ होने से यहां अनेक देवता शिवलिंग स्वरूप में विराजमान हैं. उज्जैन का आकार चतुष्कोणीय है. धर्मग्रंथों में श्रीमहाकालेश्वर की अवंतिकापुरी की महिमा का बड़ा गुणगान है.
अवंतिका का अर्थ है – समस्त प्राणियों की रक्षा करने में समर्थ. युगों से अवंतिका अपने नाम को सार्थक सिद्ध कर रही है. भूलोक के अधिपति महाकालेश्वर की यहां उपस्थिति ही इस पुरी को दिव्यता देने को पर्याप्त है. पुराणों में इसका एक नाम महाकाल-वन भी है. ब्रह्मांड में सर्वपूज्य माने गये तीन शिवलिंगों में अवंतिकानाथ श्रीमहाकाल को भू-लोक का स्वामी बताया गया है –
आकाशेतारकंलिंगम्पातालेहाटकेश्वरं। भूलोकेचमहाकालंलिंगत्रयनमोस्तुते॥
लिंगपुराण के अनुसार सृष्टि का प्रारंभ अवंतिका से ही हुआ है. मनीषी मानते हैं कि सृष्टि के आदि व अंत का सूत्र महाकाल में ही निहित है. युग-परिवर्तन के साथ अवंतिका के नाम भी बदलते रहे हैं. भगवान शंकर द्वारा त्रिपुरासुर का वध किये जाने पर विजय के उपलक्ष्य में अवंतिका को उज्जयिनी कहा गया. उज्जयिनी का अर्थ है – उत्कर्ष के साथ जय देनेवाली.
शास्त्रों के अनुसार वैशाख में अवंतिका की तीर्थयात्रा का अतिशय माहात्म्य है. खासकर वैशाख बदी दशमी से अमावस्या तक पंचेशानि-यात्रा करने से सारे पाप नष्ट होते हैं तथा अवंतिकापुरी की यात्रा का संपूर्ण फल मिल जाता है. इस तीर्थक्षेत्र के चतुर्दिक चार द्वारपाल शिवरूप में अवस्थित हैं, जिनका वर्णन स्कंदपुराण के अवंतिकाखंड में मिलता है. इन्हीं चार द्वारपालों के कथा-पूजा विधान में पंचेशानि-यात्रा (अपभ्रंश में पंचकोसी-यात्रा) यानी इष्ट परिक्र मा का विशेष महत्व है.
पंचेशानि-यात्रा से तात्पर्य : पंचेशानि-यात्रा से तात्पर्य अवंतिका के पांच मुख्य शिवलिंगों की पदयात्रा करते हुए दर्शन है. ये शिवलिंग हैं – महाकालेश्वर, पिंगलेश्वर, कायावरोहणोश्वर, बिल्वेश्वर व दुर्धरेश्वर. अवंतिकानाथ महाकालेश्वर का उनके चारों द्वारपाल सहित सविधि दर्शन करना ही इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य है. अत: इसे अवंतिका-चारद्वार यात्रा भी कह सकते हैं. पंचेशानि अर्थात पंच ईशान (शिव) की यात्रा का शुभारंभ श्रीमहाकालेश्वर मंदिर से होता है. पुण्य सलिला शिप्रा में स्नान करके श्रीमहाकालेश्वर मंदिर परिसर स्थित नागचंद्रेश्वर का पूजन करने के उपरांत पंचेशानि-यात्रा शुरू होती है. वैशाख-कृष्ण-दशमी से अमावस्या तक तीर्थयात्री 118 किलोमीटर की परिक्रमा पूर्ण करते हैं. अवंतिकापुरी (महाकाल-वन) के 84 सिद्धलिंगों में अंतिम चार शिवलिंग चारों दिशाओं में इसकी रक्षा में तत्पर चार द्वारपाल हैं.
पिंगलेश्वर : यह स्थल उज्जैन के पूर्व में है. अवंतिकापुरी के 84 सिद्धलिंगों (महादेवों) में यह 81वां शिवलिंग है. इन्हें महाकाल-वन के पूर्वद्वार का अधिपति माना जाता है. भोपाल से उज्जैन जानेवाली बड़ी रेल लाइन पर अवंतिका से पूर्व इस नाम का स्टेशन आता है. पंचेशानि-यात्रा का यह पहला पड़ाव है. उज्जैन का यह पूर्वद्वार धर्मद्वार है, जिसके द्वारपाल पिंगलेश्वर की सविधि पूजा और यहां दान करने से श्रद्धालु यात्राी स्वर्ग का अधिकारी हो जाता है.
कायावरोहणोश्वर : यह स्थान उज्जैन के दक्षिण में स्थित है. 84 महादेवों में से यह 82वां सिद्धलिंग है. इसे महाकाल-वन का दक्षिणद्वार मानते हैं. उज्जैन से इंदौर जाने वाले सड़क मार्ग पर त्रिवेणी से यहां तक बस-टेंपो मिलते हैं. पंचेशानि-यात्रा का यह दूसरा पड़ाव है. अवंतिकापुरी के द्वितीय द्वारपाल कायावरोहणोश्वर का मंदिर करोहनग्राम में स्थित है. उज्जैन का यह दक्षिणद्वार अर्थद्वार है. यहां अर्चना करने से सुख-समृद्धि और संपत्ति मिलती है.
बिल्वेश्वर : यह स्थान उज्जैन के पश्चिम में गंभीर नदी के तट पर अंबोदिया ग्राम के पास स्थित है. 84 महादेवों में यह 83वां सिद्धलिंग है. महाकाल-वन का यह पश्चिमद्वार है. इसके समीप ही गंभीर नदी पर बांध बना है, जिससे उज्जैन को पेयजल की आपूर्ति होती है. पंचेशानि-यात्रा का यह तीसरा पड़ाव है. अवंतिकापुरी के पश्चिमी द्वार कामद्वार के द्वारपाल बिल्वेश्वर पंचेशानि-यात्रा करनेवाले की सभी कामनाएं पूर्ण करते हैं.
द्रु्धरेश्वर : यह स्थल उज्जैन के उत्तर में जैथलग्राम में है. यह 84वां सिद्धलिंग है. महाकाल-वन का यह उत्तरी-द्वार है. पंचेशानि-यात्रा का यह चौथा पड़ाव है. अवंतिकापुरी के चौथे द्वार मोक्षद्वार के अधिपति दुर्धरेश्वर के दर्शन-पूजन से भक्त भव-बंधन से मुक्त हो जाता है.
भगवान शिव पंचानन अर्थात पांच मुख वाले हैं. उनका पंचाक्षर मंत्र- नम: शिवाय.. सबके लिए कल्याणकारी है. शिव के नेत्रश्रुओं से उत्पन्न रु द्राक्ष भी सामान्यत: पंचमुखी होता है. पंचेशानि-यात्रा पंचतत्वों से निर्मित मानव-काया को पूर्णत:शुद्ध कर देती है और तब जीव स्वत: शिवत्व प्राप्त कर लेता है. अवंतिकापुरी की तीर्थयात्रा भोग के साथ मोक्ष भी प्रदान करती है. अवंतिकानाथ श्रीमहाकाल का स्तुति मंत्र है :
अवंतिकायां विहितावतारं मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानां।
अकालमृत्यो: परिरक्षणार्थे वंदे महाकाल महं सुरेशं॥
इस अवंतिकापुरी के केंद्रीय स्थान पर श्रीमहाकालेश्वर विराजमान हैं, जो स्वयंभू शिवलिंग हैं. द्वादश ज्योतिर्लिगों में सिर्फ श्रीमहाकालेश्वर ही दक्षिणमुखी हैं. अतएव दक्षिण दिशा के स्वामी- मृत्यु के देवता यम इनके सेवक हैं. काल के नियंत्रक केवल श्रीमहाकाल ही हैं. तभी तो यह कहावत प्रसिद्ध है –
अकाल मृत्यु वो मरे, जो काम करे चांडाल का ।
काल उसका क्या करे, जो भक्त हो महाकाल का॥
ध्यान रहे कि पहले महाकाल की भस्म आरती में चिता-भस्म का ही प्रयोग होता था, किंतु महात्मा गांधी के आग्रह के पश्चात शास्त्रीय विधि से निर्मित उपल-भस्म से भस्मारती होने लगी. उज्जैन की पंचेशानि यात्रा में भक्तों को छह दिन के अंदर 118 किलोमीटर की परिक्रमा करनी पड़ती है. यह पंचकोसी यात्रा प्रति वर्ष वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की दशमी से शुरू होती है और अमावस्या तक संपन्न हो जाती है.
इस पंचेशानि-यात्रा को भक्तों को दिव्य शक्तियों के निकट ले जाने वाला माना जाता है. यह यात्रा मानव कल्याण के लिए निकाली जाती है. पुरातन काल से ही व्यक्ति अपने पापों के प्रायश्चित्त के लिए तरह-तरह के अनुष्ठान करता रहा है और इसका उद्देश्य ईश्वर से निकटता पाना है. यह सिलसिला आज भी जारी है. मान्यता है कि मृत्युलोक में मनुष्य के पापों को जलाकर राख करने की शक्ति कालों के काल बाबा महाकाल में ही है.
पंचेशानि यात्रा का महत्व
भारत की प्राचीन ऐतिहासिक, धार्मिक व सांस्कृतिक नगरी उज्जैन अपने में अनेक विशिष्टताएं समेटे हुए है. परम पावन उज्जयिनी, तीर्थमयी नगरी के रूप में मान्यताप्राप्त है. शास्त्रों के अनुसार शिव-यात्रा में शिव के पूजन, अभिषेक, उपवास, दान, दर्शन की ही प्रधानता होती है.
उज्जैन का आकार चौकोर है, क्षेत्र के रक्षक देवता श्री महाकालेश्वर का स्थान मध्य बिंदु में है, इस बिंदु से एक-एक योजन (चार-चार कोस) के अंतर से मंदिर स्थित हैं, जो द्वारपाल कहलाते हैं. इनमें पूर्व में पिंगलेश्वर, दक्षिण में कायावरोहणोश्वर, पश्चिम में बिल्वकेश्वर तथा उत्तर में दुर्देश्वर हैं. यह पदयात्रा अनादिकाल से प्रचलित थी. इसे राजा विक्र मादित्य ने प्रोत्साहित किया, जो 14वीं शताब्दी से निरंतर चली आ रही है. कुछ व्यवधानों के पश्चात मराठों के राज्य में इसे पुन: गति मिली. यही यात्रा आज भी दिनोदिन उन्नति की ओर अग्रसर है.
अभीष्ट फल : स्कंदपुराण के अनुसार अनंतकाल तक काशीवास की अपेक्षा वैशाख मास में मात्र पांच दिवस का अवंतिवास अत्यधिक पुण्यदायी है. इस पांच कोस लंबी पदयात्रा में शामिल होने से निहित स्वार्थ, दुराग्रह, पूर्वाग्रह, कटुता, वैमनस्य व मोहमाया के सारे बंधन मानो पीछे छूटे जाते हैं.
पंचेशानि यात्रा : 14 अप्रैल से छह दिनों में 118 किमी की पदयात्रा
उज्जैन की पंचकोसी यात्रा 118 किलोमीटर तक की है और इसमें कुल नौ पड़ाव व उप-पड़ाव आते हैं. इन पड़ावों व उप-पड़ावों के बीच कम से कम छह से लेकर 23 किलोमीटर तक की दूरी होती है.
नागचंद्रेश्वर से पिंगलेश्वर पड़ाव के बीच 12 किलोमीटर, पिंगलेश्वर से कायावरोहणोश्वर पड़ाव के बीच 23 किलोमीटर, कायावरोहणोश्वर से मलवा उप-पड़ाव तक 21 किलोमीटर, मलवा उप-पड़ाव से बिल्वकेश्वर पड़ाव अंबोदिया तक छह किलोमीटर, अंबोदिया पड़ाव से कायालिदेह उप-पड़ाव तक 21 किलोमीटर, कालियादेह से दुर्देश्वर पड़ाव जैथल तक सात किलोमीटर, दुर्धरेश्वर से पिंगलेश्वर होते हुए उंडासा तक 16 किलोमीटर और उडांसा उप-पड़ाव से क्षिप्रा घाट रेत मैदान उज्जैन तक 12 किलोमीटर का रास्ता तय करना होता है. प्राचीनकाल से चली आ रही परंपरा से यह यात्रा पुण्यसलिला शिप्रा नदी में स्नान व नागचंद्रेश्वर की पूजा के साथ वैशाख कृष्ण दशमी से शुरू होती है.
पड़ाव से पड़ाव की दूरी
नागचंद्रेश्वर से पिंगलेश्वर पड़ाव के मध्य की दूरी 12 किलोमीटर, पिंगलेश्वर से कायावरोहणोश्वर पड़ाव के बीच की दूरी 23 किलोमीटर, कायावरोहणोश्वर से नलवा उप-पड़ाव की दूरी 21 किलो -मीटर, नलवा उप-पड़ाव से बिल्वकेश्वर पड़ाव की दूरी छह किलोमीटर, बिल्वकेश्वर पड़ाव से कालियादेह उप-पड़ाव की दूरी 21 किलोमीटर, कालियादेह से दुर्देश्वर पड़ाव की दूरी सात किलोमीटर, दुर्देश्वर से पिंगलेश्वर होते हुए उंडासा की दूरी 16 किलोमीटर, उंडासा उप-पड़ाव से शिप्रा घाट रेती मैदान की दूरी 12 किलोमीटर है.
