साधु और पापी दोनों मरते हैं, राजा और भिक्षुक दोनों मरते हैं- सभी मृत्यु को प्राप्त होते हैं. फिर भी जीवन के प्रति यह प्रबल आसक्ति विद्यमान है. हम क्यों इस जीवन में आसक्त हैं? क्यों हम इसका परित्याग नहीं कर पाते? यह हम नहीं जानते. और यही माया है.
हजारों वर्षो से भारत ने मायावाद की घोषणा करते हुए संसार को चुनौती दी है और संसार की विभिन्न जातियों ने यह चुनौती स्वीकार भी की, जिसका फल यह हुआ कि वे पराभूत हो गयी हैं. भारत की घोषणा यह है कि संसार भ्रम है, इंद्रजाल है, माया है. अर्थात चाहे तुम मिट्टी से एक-एक दाना बीन कर भोजन करो या चाहे तुम्हारे लिए सोने की थाली में भोजन परोसा जाये. चाहे तुम महलों में रहो, चाहे कोई महाशक्तिशाली महाराजाधिराज हो अथवा चाहे द्वार-द्वार का भिक्षुक, किंतु परिणाम सभी का एक है और वह है मृत्यु! गति सभी की एक ही है, सभी माया है.
बारंबार भिन्न-भिन्न जातियां सिर उठातीं और इसका संगठन करने की चेष्टा करती हैं. वे बढ़ती हैं, भोग-साधन को वे अपना ध्येय बनाती हैं, उनके हाथ में शक्ति आती है, पूर्णतया शक्ति का प्रयोग करती हैं, भोग की चरम सीमा को पहुंचती हैं और दूसरे ही क्षण वे विलुप्त हो जाती हैं. हम चिरकाल से खड़े हैं, क्योंकि हम देखते हैं कि हर एक वस्तु माया है. महामाया के बच्चे सदा बचे रहते हैं, परंतु भोग रूपी अविद्या के लाडले देखते ही देखते कूच कर जाते हैं. मृत्यु ही जब हमारे जीवन का लक्ष्य है तो चाहिए कि लक्ष्य तक सही मार्ग से पहंचा जाये.
स्वामी विवेकानंद
