आज की परिस्थिति में हम इतने अधिक तनावग्रस्त, चिंतापूर्ण होते जा रहे हैं और इतनी अधिक निराशाओं के बीच में जी रहे हैं, इसका एकमात्र कारण है कि हमने प्रकृति से अपना संबंध पूरी तरह से तोड़ लिया है. इस बात को हम इस उदाहरण से भी समझ सकते हैं कि जिस प्रकार गुलाब की सुंदर कली को हम तोड़ कर पौधे से अलग कर दें, तो वह मुरझा जायेगी, उसी प्रकार हम प्रकृति से दूर रह कर टूट जाते हैं. इसी कारण हमारे जीवन में इतनी अशांति व हताशा बढ़ जाती है.
इस क्रम में यह भी विचारणीय है कि आज तमाम लोगों को यह चिंता है कि हम परमात्मा को कैसे प्राप्त करें? लेकिन यह बात लोग भूल गये हैं कि पहले आत्मा को प्रसन्न करो, आत्मा को स्वस्थ करो, तभी परमात्मा प्रसन्न हो सकते हैं. शरीर को गला कर हम केवल चिंता कर सकते हैं, चिंतन नहीं कर सकते. परमात्मा को हमारी चिंता नहीं चाहिए, क्योंकि चिंतन करना हमारा स्वरूप है. हम विवेकशील प्राणी हैं और विवेकी चिंता नहीं, चिंतन किया करते हैं.
चिंता हमारी आंतरिक स्थिति अथवा अंत: गुण नहीं है, यह तो बाहर से आरोपित होती है. हमने इसे बलपूर्वक अपने ऊपर लाद लिया है. चिंता, काम, क्रोध आदि षड्विकारों से पूर्ण होकर परमात्मा से बात करना अथवा संबंध बनाना, महासागर के पानी को हाथ से उलिच कर उसे खाली करने जैसा है. अत: हमें अपने मन, षड्विकारों से रहित, को शीतल बनाना है. इसी शीतल मन से प्रकृति के सान्निध्य में रहना होगा.
आचार्य सुदर्शन
