सुरा सम्पूर्ण कलशं राप्लुतमेव च ।
दधाना हस्तपद्माभ्यां
कूष्माण्डा शुभदास्तु में ।।
रुधिर से परिप्लुत एवं सुरा से परिपूर्ण कलश को दोनों कर-कमलों में धारण करनेवाली कूष्माण्डा दुर्गा मेरे लिये शुभदायिनी हों.
जगत जननी महाशिक्त दुर्गा-4
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता-शास्त्रों में शक्ति शब्द के प्रसंगानुसार अलग-अलग अर्थ किये गये हैं. तांत्रिक लोग इसी को पराशक्ति कहते हैं और इसी को विज्ञानानन्दघन ब्रह्म मानते हैं. वेद, शास्त्र, उपनिषद्, पुराण आदि में भी शक्ति शब्द का प्रयोग देवी, पराशक्ति, ईश्वरी, मूल प्रकृति आदि नामों से विज्ञाननन्दघन निर्गुण ब्रह्म एवं सगुण ब्रह्मके लिए भी किया गया है.
विज्ञाननन्दघन ब्रह्म का तत्व अत्यन्त सूक्ष्म एवं गुह्य होनेके कारण शास्त्रों में उसे नाना प्रकार से समझाने की चेष्टा की गयी है. इसलिए शक्ति नाम से ब्रह्म की उपासना करने से भी परमात्मा की ही प्राप्ति होती है. एक ही परमात्मतत्वकी निर्गुण, सगुण, निराकार, साकार, देव, देवी, ब्रह्म, विष्णु, शिव, शक्ति, राम, कृष्ण आदि अनेक नाम-रूप भक्त लोग पूजा-उपासना करते हैं. वह विज्ञानानन्दस्वरूपा महाशक्ति निर्गुणरूपा देवी जीवों पर दया करके स्वयं ही सगुणभाव को प्राप्त होकर ब्रह्म, विष्णु और महेश रूप से उत्पत्ति, पालन और संहारकार्य करती है.
स्वयं भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- तुम्हीं विश्वजननी मूल प्रकृति ईश्वरी हो, तुम्हीं सृष्टि की उत्पत्ति के समय आद्याशक्ति के रूप में विराजमान रहती हो और स्वेच्छा से त्रिगुणात्मिका बन जाती हो. यद्यपि वस्तुत: तुम स्वयं निर्गुण हो तथापि प्रयोजनवश सगुण हो जाती हो. तुम परब्रह्मस्वरूप, सत्य, नित्य एवं सनातनी हो. परमतेजस्वरूप और भक्तों पर अनुग्रह करने के हेतु शरीर धारण करती हो. तुम सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी, सर्वाधार एवं परात्पर हो. तुम सर्वबीजस्वरूप, सर्वपूज्या एवं आश्रयरिहत हो. तुम सर्वज्ञ, सर्वप्रकार से मंगल करनेवाली एवं सर्वमंगलोंकी भी मंगल हो.
(क्रमश:) प्रस्तुति: डॉ एनके बेरा
