होली हमारी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण पर्व है. इसमें व्यक्तित्व के विकास और सभ्य समाज के निर्माण की अनेक प्रेरणाएं समाहित हैं. यदि इस पर्व की प्रेरणाओं को ह्दयंगम करके उन्हें जीवन में उतारने का प्रयास किया जाय, तभी इसे मानना सही मायनों में हम सबके लिए लाभकारी सिद्ध होता है.
होली रंगों का त्योहार है. जीवन को उल्लासपूर्ण बनाने के लिए इसमें तरह-तरह के रंग खिलने चाहिए. एक रंगी जीवन तो नीरस हो जाता है. इसीलिए परस्पर रंग लगाकर होली खेलने की परंपरा है. हमारी संस्कृति में टेसू के फूल, हल्दी, गुलाल जैसे प्राकृतिक साधनों से बने रंगों से होली खेलने का विधान है. ये स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभकारी होते हैं, विषाणुओं का नाश करते हैं.
परस्पर प्रेम भाव बढ़ाते हैं. दूसरी ओर आज जो रासायनिक रंग होली खेलने के लिए प्रयोग में लाये जाते हैं, उनसे तरह-तरह के चर्मरोग तथा अन्य रोग होते हैं. हंसती-हंसाती, खिलती-खिलाती जिंदगी ही सार्थक होती है. इसके लिए स्वस्थ मनोविनोद जीवन में होना ही चाहिए. होली हंसते-हंसाते परस्पर प्रेमभाव बढ़ाते द्वेष-दुर्भाव को दूर करने का पर्व है. इस दिन एक -दूसरे को रंग लगाकर मनोमालिन्य से हुई भूलों के लिए क्षमा मांगने और गले लगाने का पर्व है. ऐसा करते हुए निश्चयपूर्वक हमें अपने संबंधों को मित्रतापूर्ण बनाने चाहिए. होलिका का जलना और प्रह्लाद का बच जाना यह संदेश देता है कि ईश्वर शरणागति का भाव हो तो भगवान अपने भक्त की हर प्रकार से रक्षा करता है.
डॉ प्रणव पण्ड्या
