बंधन और मोक्ष का मार्ग

नव तत्वों में जीव, अजीव तो हैं ही. उनके बाद जो सात तत्व हैं, वे साधना की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं. उनमें मुख्यत: दो हैं- बंध और मोक्ष. बंध का अपना परिवार है और मोक्ष का अपना परिवार है. पुण्य, पाप और आश्रव बंध का परिवार है. संवर और निर्जरा मोक्ष का परिवार है. हम […]

नव तत्वों में जीव, अजीव तो हैं ही. उनके बाद जो सात तत्व हैं, वे साधना की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं. उनमें मुख्यत: दो हैं- बंध और मोक्ष. बंध का अपना परिवार है और मोक्ष का अपना परिवार है. पुण्य, पाप और आश्रव बंध का परिवार है. संवर और निर्जरा मोक्ष का परिवार है.

हम सामान्यतया नव तत्व बोलते हैं, तब बंध और मोक्ष को अंत में बोलते हैं, परंतु उत्तराध्ययन सूत्र में श्लोक की रचना इस प्रकार हुई है कि उसमें बंध का परिवार बंध के साथ आ गया और मोक्ष का परिवार मोक्ष के साथ आ गया. जितनी दैवी संपदा हमारे पास बढ़ेगी, हम मोक्ष की तरफ आगे बढ़ जायेंगे और जितनी आसुरी संपदा हमारे पास बढ़ेगी, हम मोक्ष की ओर, बंधन की ओर आगे बढ़ जायेंगे.

शुभयोग को दैवी संपदा के रूप में और अशुभयोग को आसुरी संपदा के रूप में देखा जा सकता है. जितना शुभयोग रहेगा यानी मन, वचन, काय के योग शुभ रहेंगे, उतनी निर्जरा होगी और आदमी मुक्ति की ओर अग्रसर हो जायेगा. जब अशुभयोग आ जायेगा, आदमी हिंसा, झूठ, चोरी आदि करेगा, तो वह बंधनयुक्त बन जायेगा, संसार की ओर आगे बढ़ जायेगा. दो मार्ग हैं- एक बंधन का मार्ग और दूसरा मोक्ष का मार्ग. शुभयोग, संवर-ये मोक्ष के मार्ग है और अशुभयोग, पापाचरण, अशुभ अध्यवसाय- ये सब संसार और बंधन के मार्ग हैं. गीता की भाषा में जो दैवी संपदा है, जैनदर्शन की भाषा में उसे संवर, निर्जरा कहते हैं. जैनदर्शन की भाषा में जो पापाश्रव है, वह गीता की भाषा में आसुरी संपदा का तत्व बन जाता है.

आचार्य महाश्रमण

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