जीवन-ऊर्जा को प्राण ऊर्जा भी कहा जाता है. यही वह माध्यम है जिससे प्राणी जीवित रहता है और अपने विवेक के साथ संसार में संचरण करता है. विज्ञान ऊर्जा की बात करता है, पर वह भौतिक ऊर्जा तक ही सीमित है.
जीवन-ऊर्जा वस्तुत: मन की वह दशा है, जिसमें साहस, उत्साह, आशा और आनंद के भाव भरे होते हैं. बातचीत में हम कह बैठते हैं कि अमुक व्यक्ति ऊर्जावान है. इसका मतलब है कि वह सकारात्मक सोच वाला है, जो कभी हिम्मत नहीं हारता और न ही निराश होकर बैठ जाता है. ऐसे लोग अपने आस-पास के वातावरण को न केवल आवेशित रखते हैं, बल्कि संपर्क में आनेवाले अन्य को भी प्रेरित करते हैं.
यहां यह ध्यातव्य है कि यह ऊर्जा परमात्मा से नैसर्गिक रूप में प्राणियों को प्राप्त है, किंतु अतिशय चिंता, भविष्य का भय या निरंतर की निष्क्रियता से यह ऊर्जा धीरे-धीरे क्षीण होती रहती है, निराशा का वायरस तो जीवन-ऊर्जा को घुन की तरह नष्ट कर देता है. सृष्टि के अन्य जीवों तथा मानवेतर प्राणियों में नैसर्गिक रूप से प्राप्त जीवन-ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती, विशेषकर, जो प्रकृति के प्रांगण में रहते हैं. वे सदैव ही चिंता, निराशा, निष्क्रियता आदि दुगरुणों से दूर रहते हैं. यह जीवन-ऊर्जा का ही परिणाम है कि एक सामान्य काया वाला मनुष्य एवरेस्ट पर चढ़ जाता है, समुद्र को तैर कर पार कर जाता है या बड़े-बड़े असंभव कार्यो को संभव कर दिखाता है. ऐसे लोगों से ही सृष्टि का सौंदर्य है या यह कहें कि धरा का श्रृंगार इन्हीं लोगों से है.
आचार्य सुदर्शन
