अकसर लोग मुझसे यह पूछते हैं कि आखिर यह कैसे जानें कि हमें आत्मज्ञान प्राप्त हो गया है या नहीं? जब हमें आत्मज्ञान प्राप्त हो जायेगा तो हमें कैसे मालूम होगा? मैं उन पूछनेवालों से पूछता हूं कि इसका क्या प्रमाण है कि तुम्हारे पैर में दर्द है? तुम यह कैसे जानते हो कि तुम्हारे पैर में दर्द है? आत्मज्ञान हो जाने पर ऐसे प्रश्न मन में नहीं उठेंगे.
आत्मज्ञान का भान
अकसर लोग मुझसे यह पूछते हैं कि आखिर यह कैसे जानें कि हमें आत्मज्ञान प्राप्त हो गया है या नहीं? जब हमें आत्मज्ञान प्राप्त हो जायेगा तो हमें कैसे मालूम होगा? मैं उन पूछनेवालों से पूछता हूं कि इसका क्या प्रमाण है कि तुम्हारे पैर में दर्द है? तुम यह कैसे जानते हो कि तुम्हारे […]

दूसरों से पूछना कि तुम्हें आत्मज्ञान प्राप्त हो गया है कि नहीं, यह अज्ञानता है. आत्मज्ञान हो जाने पर हमें प्रमाण की आवश्यकता ही नहीं रहती है. जैसे तुम्हारा दर्द, स्वयं ही प्रमाण है, वैसे ही आत्मज्ञान स्वयं ही प्रमाण है. पर कल्पनाओं में नहीं फंसना कि आत्मज्ञान कैसा होगा. बिल्कुल सहज रहो. तुम वो हो, जो तुम हो, इसलिए शांत रहो, विश्राम करो. कुछ करने से आत्मज्ञान नहीं होता, अपितु विश्राम करने से आत्मज्ञान होता है. और विश्राम तुम कुछ करने के बाद ही कर सकते हो.
प्राणायाम और आसन करने से रजोगुण से तुम निवृत्त होते हो. और तब सत्वगुण बढ़ता है. जब ऐसा होता है, तब हम ध्यान कर सकते हैं और फिर इससे सजगता बढ़ती है. अगर ठीक तरह से नींद ना आये तो सत्वगुण नहीं जगेगा. रजोगुण के द्वारा तमोगुण से ऊपर उठा जा सकता है. और रजोगुण से ऊपर उठने के लिए आवश्यकता है विश्राम की और कर्म की. भगवद्गीता में कहा गया है, ‘युक्ताहार विहारस्य योग: भवति सिद्धित:’ समाधि ना तो अधिक सोनेवाले लोगों के लिए है, और ना ही उनके लिए जो बहुत अधिक कार्यों में पूरे दिन व्यस्त रहते हैं.
।। श्री श्री रविशंकर ।।