कोई भी समाज अपने समय के साथ चलता है. समय बदलने के साथ ही अनेक सारी मान्यताएं तथा परंपराएं बदल जाती हैं. जहां नहीं बदलती हैं, वहां यह माना जाता है कि यह समाज दृढ़ और कट्टर है. जनसंख्या नियंत्रण का मामला हो या विकास की अवधारणा का, अगर ये समय के साथ अपने आपको बदल नहीं पाये, तो उसे देश या समाज की जड़ता मानी जाती है. हमें यह जानना चाहिए कि हम किस ‘समय’ और ‘समाज व्यवस्था’ में जी रहे हैं.
इस बुनियादी सरोकार से कट कर हम नहीं चल सकते. यह तो हमें स्वीकारना ही होगा कि औद्योगिक क्रांति के बाद पूरे विश्व ने अपनी दशा-दिशा में परिवर्तन किया है. हमें भी अपने विकास के मानदंडों की समीक्षा करनी होगी, तभी विकसित-अर्धविकसित समाज की हम पहचान कर सकते हैं. अत: समाज को समझने और बदलने की महती जिम्मेवारी पैदा हो गयी है.
कहना होगा कि हमारा राजनीतिक ढांचा लोकतांत्रिक है और इसमें सत्ता तथा जनता की बराबर की हिस्सेदारी है. यहां आजादी महसूस की जा सकती है. हमारे यहां सकारात्मक बात यह है कि भारत में हमेशा मूल्यों की प्रधानता रही है, जिसका जाने-अनजाने संबंध अध्यात्म से रहा है.
पहले यही जीवन-मूल्य समाज और व्यक्ति को संचालित करते थे. इसी से पूरा समाज अनुशासित रहता था. वे मूल्य आज भी उतने ही खरे हैं. ईमानदारी, सच्चरित्रता, सेवा, साधना, नैतिकता, अस्तेय-आज का भी सच है. भारत की पूजा और इज्जत इसी कारण हो रही है.
आचार्य डॉ लोकेशमुनि
