गया श्राद्ध के आश्विन कृष्ण पक्ष चतुर्थी यानी शुक्रवार को ब्रह्मसत सरोवर में पिंडदान व तर्पण का विशेष महत्व है. अनुष्ठान करनेवाले व्यक्ति को चाहिए कि वह शुद्ध मन से ब्रह्मसत सरोवर में स्नान करे व सरोवर के तट पर विधिवत सपिंडों का श्राद्ध करे.
सपिंड का मतलब सात पीढ़ी तक के लिए किये जाने वाले श्राद्ध को कहते हैं. स्नान करते समय धारणा रखें कि मैं ऋणत्रय से मुक्ति के लिए यह अनुष्ठान कर रहा हूं. साथ ही, इस अर्चना से पितरों को ब्रह्मलोक पहुंचा रहा हूं. इसी स्थान पर ब्रह्माजी ने भी यज्ञ किया था. उनके स्नान के बाद यहां यूप (खंभ) निकला था. वह ब्रह्म यूप के नाम से विख्यात है.
यहां श्राद्ध करने व यूप की प्रदक्षिणा करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है. यहीं गोप्रचार तीर्थ के समीप आम्र (आम) वृक्ष रूप तीर्थ है. इसका सेंचन करने से पितरों को अविलंब मोक्ष की प्राप्ति होती है. आम्रवृक्ष के सेंचन के अवसर पर यह बोलना चाहिए कि ब्रह्मसर से उत्पन्न आम्र वृक्ष विष्णु रूप हैं. यह पितरों को मुक्ति प्रदान करें.
ब्रह्मसत सरोवर तीर्थ के निकट ही कागबलि तीर्थ है. यह रामशिला के पास के कागबलि तीर्थ से भिन्न है. इसमें भी यम, श्वान व काक को बलि रूप पिंड दिये जाते हैं. कागबलि में मूंग दाल अथवा उड़द दाल अवश्य दान करना चाहिए. यहां पिंडदान व श्राद्ध कर्म करने के बाद, पास ही अवस्थित तारक ब्रहू का विधिवत दर्शन-पूजन करें. इसी दर्शन-पूजन के बाद इस दिन का श्राद्ध संपन्न हो जाता है.
गोवर्द्धन प्रसाद सदय
