हमें कर्म की प्रेरणा देते हैं भुवन भास्कर
मार्कण्डेय शारदेय... (ज्योतिष व धर्मशास्त्र विशेषज्ञ) संपर्क : 8709896614 मकर संक्रांति कभी पूस में, तो कभी माघ महीने में आती है, इसलिए पश्चिम बंगाल एवं बंगलादेश में ‘पौष संक्रांति’ तो नेपाल में ‘माघे संक्रांति’ तथा पंजाब में ‘माघी’ के नाम से जानी जाती है. वस्तुतः मकर संक्रांति से भगवान भास्कर उत्तरी गोल जाने के लिए […]
मार्कण्डेय शारदेय
(ज्योतिष व धर्मशास्त्र विशेषज्ञ)
संपर्क : 8709896614
मकर संक्रांति कभी पूस में, तो कभी माघ महीने में आती है, इसलिए पश्चिम बंगाल एवं बंगलादेश में ‘पौष संक्रांति’ तो नेपाल में ‘माघे संक्रांति’ तथा पंजाब में ‘माघी’ के नाम से जानी जाती है. वस्तुतः मकर संक्रांति से भगवान भास्कर उत्तरी गोल जाने के लिए उत्तरायण हो जाते हैं. यह देवताओं का प्रभात काल है. चूंकि उत्तरायण में दिन बड़ा होने लगता है, मौसम अनुकूल होता है, अत: शादी-ब्याह, यज्ञ-यात्रा के लिए इसका माहात्म्य बढ़ जाता है.
गी ता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि समस्त ज्योतिरूपों में मैं सूर्य हूं- ‘ज्योतिषां रविरंशुमान्’(10.21). वहीं वेद कहता है-‘सूर्य आत्मा जगतः तस्थुषश्च’(यजुर्वेद:7.42), यानी विश्व की आत्मा सूर्य है. यहां तक कि ज्योतिषशास्त्र भी समय की आत्मा मानता है- ‘कालस्यात्मा भास्करः’(जातक-पारिजात :2.1). संभव है, हमारे ज्ञान के जो-जो साधन-स्रोत हैं, वे इन्हें नकारकर नहीं चल सकते. आदिकाल, अंधकारकाल से ही हम इनसे इतने प्रभावित हैं कि इनके आते कार्यारंभ और जाते कार्य-समापन मानते आये.
आज भले वैज्ञानिक प्रभाव से रात में चकाचौंध पैदाकर दिन को मात देने में भरोसा बढ़ा रहे हों, पर उसमें भी इन्हीं का प्रभाव है. पुनश्च, दिन-रात का जो प्राकृतिक प्रभाव होता है, उसे झुठला नहीं सकते. इसलिए सूर्य शब्द की व्युत्पत्ति में कहा गया है- ‘सरति आकाशे सुवति कर्मणि लोकं प्रेरयति वा’, अर्थात् आकाश में संचरण करते हैं या जो लोगों को कर्म की प्रेरणा देते हैं, इसलिए सूर्य कहलाते हैं. प्रातः-सायम् का भी अपना विज्ञान है.
प्रभात होते जैसे कमल खिलने लगता तथा सूर्यास्त होते वह संकुचित होने लगता है, वैसे ही हमारे शरीर में ऊर्जा का प्रसार-संकोच होता है. प्रतनन के कारण ही सुबह को प्रातःकाल एवं संकुचन के कारण सायंकाल नाम दिया गया है. रवि, भास्कर, दिवाकर- जैसे इनके अनेक नाम हैं, जो इनके गुण-धर्म के ही सूचक हैं.
उत्तरायण एवं दक्षिणायन- दो विशिष्ट गतियां : संवत्सर का ही अंग महीने हैं. यों तो ज्योतिष में कई तरह के मास-वर्ष बताये गये हैं, जिनमें चांद्र और सौर अधिक प्रचलित हैं.
जैसे चांद्र मासों में चैत्र, वैशाख आदि बारह महीने होते हैं, वैसे ही सौर मास मेष, वृष आदि बारह होते हैं. जब भुवन भास्कर एक राशि से दूसरी में प्रविष्ट होते हैं, तो उसे संक्रांति कहते हैं. इसी तरह उत्तरायण एवं दक्षिणायन- ये दो विशिष्ट गतियां हैं. उत्तरायण में जहां दिन की वृद्धि होती है, वहीं दक्षिणायन में रात्रि की वृद्धि.
यों तो यथाकाल सभी ग्रहों का राशि परिवर्तन होता रहता है, पर संक्रांति की वाचकता सूर्य से ही अधिक सान्निध्य रखती है. जब सूर्य मकर राशि पर आते हैं, तो शिशिर ऋतु का प्रवेश एवं उत्तरायण गति होने लगती है. कुंभ, मीन के बाद जब मेष संक्रांति होती है, तो वह उत्तर गोल पर आ जाते हैं.
अब तक दिन भले बढ़ते क्रम में हो, पर मेष में प्रवेश के बाद रात्रिमान कम और दिनमान अधिक हो जाता है. पुनः कर्कराशि में प्रविष्ट हो भास्कर दक्षिणायन हो जाते हैं. अब रात्रिमान बढ़ने लगता तथा दिनमान घटने लगता है. ज्यों ही वह कन्या राशि में जाते हैं कि दिनमान को रात्रिमान पछाड़ते-पछाड़ते धनु तक अपना बड़ा-से-बड़ा रूप दिखाने लगता है.
चूंकि उत्तरायण में दिन बड़ा होता है, मौसम अनुकूल होता है और वातावरण खुला-खुला रहता है, शादी-ब्याह, यज्ञ-यात्रा के लिए यह विशेष उपयुक्त होता है, इसलिए इसका माहात्म्य बढ़ जाता है. इसे चांद्र मास माघ से भी जोड़कर देखा जाता है, जिसका धार्मिक मूल्य अधिक है.
हमारे प्रत्येक कृत्य विधि-सम्मत हों, तो पुण्यप्रद और विधिहीन हों तो व्यर्थ व पापप्रद माने जाते हैं. सभी संक्रांतियों के कुछ विधान हैं और उन विधानों के समय भी निर्धारित हैं. यदि मकर संक्रांति की बात करें, तो इसमें स्नान, दान, देव-पितृपूजा एवं उपवास का भी बड़ा महत्व है. सूक्ष्मद्रष्टा ऋषियों ने मकर में संक्रमण से 40 घटी तक, यानी 16 घंटे बाद तक पुण्यकाल बताया है-
हेमाद्रिमते परतः चत्वारिंशद् घटिकाः पुण्याः, परंतु मतभिन्नताओं का सारग्रहण किया जाये तो 6.12घंटे तक अति उत्तम, 8घंटे तक मध्यम एवं 16 घंटे तक सामान्य पुण्यसमय माना जायेगा. यानी 15 जनवरी को 11.45 तक अत्युत्तम, 3.33 तक मध्यम, सूर्यास्त तक सामान्य रहेगा.
मकर संक्रांति में स्नान के अनन्तर अन्नदान के अतिरिक्त तिलदान, वस्त्रदान एवं अंगीठी (बोरसी) दान का बड़ा माहात्म्य है, क्योंकि ये ठंड से रक्षा करते हैं. हम स्वयं भी गरम कपड़े पहनते हैं, अग्निसेवन करते हैं (अमृतं शिशिरे वह्निः) एवं बलबर्धक तिल से बनी मिष्टानों का उपभोग करते हैं.
परोपकार में इनका दान भी कम पुण्य नहीं. संक्रांति भगवान सूर्य का मासिक पर्व है, इसलिए उनकी कृपा प्राप्ति के लिए उपवास विहित है, पर उपवास न हो सके तो इस दिन बिना तेल तथा अनूना पदार्थ, जैसे- दही, चूड़ा, गुड़, मिठाई का सेवन करना चाहिए. हां, इसका एक नाम खिचड़ी भी है, अतः रात में तिल, उड़द-मिश्रित खिचड़ी खानी चाहिए.
15 जनवरी को मकर संक्रांति
इस बार मकर संक्रांति 15 जनवरी (बुधवार) को हो रही है. 15 जनवरी को 11.45 तक अत्युत्तम, 3.33 तक मध्यम, सूर्यास्त तक सामान्य माना जायेगा. शताब्दि एवं कंप्यूटर सॉफ्टवेयर के अनुसार 14/15 जनवरी को रात्रि 2.06 बजे, विश्वपंचांग (वाराणसी)- 7.33बजे (पूर्वाह्ण), विश्वविद्यालय पंचांग (दरभंगा)+वैदेहि-7.52, महावीर-7.54, हृषीकेश-8.24. यानी कंप्यूटर और शताब्दि को छोड़ शेष सभी पंचांग पूर्वाह्ण के ही पक्ष में हैं. पूर्वाह्ण में संक्रमण शासकवर्ग के लिए अशुभ बताया गया है-
‘त्र्यंशे दिनस्य नृपतीन् प्रशमे निहन्ति…’।
गोचरफल
जब भी कोई ग्रह राशि परिवर्तन करता है, तो विभिन्न राशि के जातकों पर भी शुभाशुभ प्रभाव डालता है. मकर में आये सूर्य 13 फरवरी तक इसी राशि में रहेंगे. इनका गोचरगत प्रभाव क्या होगा, इस पर वराहमिहिर के मत के मुताबिक-
मेष : कठिनाई से विजय एवं कार्यसिद्धि.
वृष : आपत्ति, दीनता एवं धनप्रयोग में बाधा.
मिथुन : रोग, भय, दाम्पत्य बाधा.
कर्क : भ्रमण, पेटरोग, भय.
सिंह : रोग शांति, शत्रुबाधा से मुक्ति.
कन्या : रोग, शत्रुजन्य पीड़ा.
तुला : रोग, भोग, बार-बार कार्य में विघ्न.
वृश्चिक : लाभ, धनागम, आनंद, शत्रुनाश.
धनु : धनहानि, दुःख, ठगी, कार्यबाधा.
मकर : उपद्रव, धनहानि, पेटरोग,भ्रमण.
कुंभ : उत्तम जन को कार्यसिद्धि, अन्य को कार्यहानि.
मीन : विजय, स्थान लाभ, सम्मान, रोगनाश.
