जम्मू-कश्मीर में आरक्षण का मुद्दा अब सिर्फ सरकारी नौकरियों में कोटे तक सीमित नहीं है. मौजूदा समय में यह ओपन मेरिट, सामाजिक प्रतिनिधित्व और आरक्षण की संवैधानिक सीमा के बीच संतुलन का बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है.
आसान भाषा में कहें तो इस पूरे मामले में 50 फीसदी और 70 फीसदी के आंकड़ों को लेकर पेंच फंसा हुआ है. इस लेख में समझेंगे कि 50 फीसदी की मांग क्या है, 70 फीसदी की बहस क्यों हो रही है?
70 फीसदी आरक्षण पर बहस क्यों हो रही है?
- जम्मू-कश्मीर की आरक्षण व्यवस्था में बड़ा बदलाव 2024 में हुआ. चार नए समुदायों पहाड़ी एथनिक ग्रुप, पद्दारी जनजाति, कोली और गद्दा ब्राह्मण को अनुसूचित जनजाति यानी एसटी की सूची में शामिल किया गया. इनके लिए 10 फीसदी अतिरिक्त आरक्षण का प्रावधान किया गया. इससे जम्मू-कश्मीर में एसटी आरक्षण बढ़कर 20 फीसदी हो गया.
- इसके अलावा अनुसूचित जाति यानी एससी, अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी ईडब्ल्यूएस, पिछड़े इलाकों और नियंत्रण रेखा व अंतरराष्ट्रीय सीमा के आसपास रहने वाले लोगों के लिए भी अलग-अलग आरक्षण है.
- इन सभी प्रावधानों की वजह से जम्मू-कश्मीर में आरक्षण का दायरा काफी बढ़ गया है.
- हालांकि, यहां एक बात समझना जरूरी है. जम्मू-कश्मीर में आरक्षण की सभी श्रेणियों को सीधे जोड़कर यह कहना सही नहीं होगा कि 70 फीसदी सीटें वर्टिकल आरक्षण के तहत आती हैं.
- यहां वर्टिकल और हॉरिजॉन्टल आरक्षण दोनों तरह के प्रावधान हैं और इनकी गणना अलग तरीके से होती है. इसलिए 70 फीसदी का आंकड़ा समझने के लिए आरक्षण की अलग-अलग श्रेणियों को अलग-अलग देखना जरूरी है.
उमर अब्दुल्ला सरकार ने समीक्षा क्यों कराई?
- मौजूदा आरक्षण व्यवस्था को लेकर ओपन मेरिट के अभ्यर्थियों में नाराजगी बढ़ रही थी. उनका कहना था कि आरक्षित सीटों का हिस्सा बढ़ने से सरकारी नौकरियों और प्रोफेशनल कोर्स में दाखिले के लिए उनके पास मौके कम हो रहे हैं. इस मुद्दे को देखते हुए उमर अब्दुल्ला सरकार ने दिसंबर 2024 में तत्कालीन मंत्री सकीना इत्तू की अध्यक्षता में एक कैबिनेट सब-कमेटी बनाई.
- इस समिति को जम्मू-कश्मीर की पूरी आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा करने और यह पता लगाने की जिम्मेदारी दी गई कि इसमें कहां बदलाव की जरूरत है. समिति ने अलग-अलग आरक्षित वर्गों के कोटे और उनके प्रभाव का अध्ययन किया और अपनी रिपोर्ट तैयार की.
- समिति की रिपोर्ट जून 2025 में कैबिनेट के सामने रखी गई. इसके बाद अक्टूबर 2025 में उमर अब्दुल्ला सरकार ने रिपोर्ट को मंजूरी दे दी.
- सरकार ने इसके बाद रिपोर्ट को आगे की कार्रवाई के लिए उपराज्यपाल के पास भेज दिया. अब इसी रिपोर्ट में सुझाए गए बदलावों को लागू करने को लेकर केंद्र और जम्मू-कश्मीर सरकार के बीच मामला अटका हुआ है.
ये भी पढ़ें: कपड़े, पढ़ाई और घर से बाहर निकलने पर पाबंदी, अफगानिस्तान में महिलाओं के लिए कितनी मुश्किल है जिंदगी?
सरकार 50 फीसदी की बात क्यों कर रही है?
- आरक्षण पर बनी कैबिनेट सब-कमेटी की रिपोर्ट का एक बड़ा मकसद ओपन मेरिट के लिए ज्यादा सीटें उपलब्ध कराना था.
- इसके लिए एससी और एसटी के कोटे में बदलाव किए बिना दूसरी आरक्षित श्रेणियों के हिस्से में बदलाव करने का प्रस्ताव रखा गया. सरकार का मानना है कि इससे आरक्षण का लाभ भी जारी रहेगा और सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए मौके भी बढ़ेंगे.
- 50 फीसदी की बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने इंद्रा साहनी मामले में सामान्य परिस्थितियों में आरक्षण की सीमा 50 फीसदी रखने का सिद्धांत दिया था. हालांकि अदालत ने यह भी माना था कि कुछ असाधारण परिस्थितियों में इस सीमा से आगे जाने की गुंजाइश हो सकती है.
- यही वजह है कि उमर अब्दुल्ला सरकार आरक्षण को करीब 50 फीसदी तक रखने की बात कर रही है. उसका तर्क है कि व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें सामाजिक और पिछड़े वर्गों को उनका उचित प्रतिनिधित्व मिले, लेकिन ओपन मेरिट के अभ्यर्थियों के लिए भी पर्याप्त अवसर बने रहें.
केंद्र से टकराव की असली वजह क्या है?
- उमर अब्दुल्ला सरकार ने आरक्षण की समीक्षा के बाद बदलाव का प्रस्ताव तैयार किया और कैबिनेट से इसे मंजूरी भी मिल गई.
- लेकिन जम्मू-कश्मीर में ऐसे बड़े फैसलों को लागू करने में उपराज्यपाल और केंद्र सरकार की भूमिका अहम है. इसी प्रक्रिया के दौरान प्रस्ताव को लेकर कुछ सवाल उठाए गए, जिनका जवाब जम्मू-कश्मीर सरकार ने दिया.
- उमर अब्दुल्ला का कहना है कि उनकी सरकार ने अपनी तरफ से जरूरी जवाब दे दिया है. इसके बावजूद प्रस्ताव पर आगे फैसला नहीं हुआ है. इसी देरी को लेकर वह केंद्र पर सवाल उठा रहे हैं. उनका कहना है कि कैबिनेट के फैसले को इस तरह लंबे समय तक रोककर रखना ठीक नहीं है.
- हालांकि, यह कहना अभी सही नहीं होगा कि केंद्र सरकार ने 70 फीसदी आरक्षण को हमेशा जारी रखने का अंतिम फैसला कर लिया है.
- फिलहाल इतना साफ है कि उमर सरकार आरक्षण में बदलाव चाहती है, जबकि उसके प्रस्ताव पर केंद्र की ओर से अभी अंतिम मंजूरी नहीं मिली है. इसी वजह से यह मामला अब राजनीतिक विवाद का रूप ले चुका है.
विवाद सिर्फ 50 बनाम 70 फीसदी का नहीं
- इस पूरे विवाद को सिर्फ 50 और 70 फीसदी के आंकड़े के बीच की लड़ाई समझना सही नहीं होगा. असली सवाल यह है कि अलग-अलग समुदायों को कितना आरक्षण मिले, किस श्रेणी का कोटा कितना हो और ओपन मेरिट के लिए कितनी सीटें बचें.
- एक तरफ गुर्जर-बकरवाल और पहाड़ी समेत आरक्षित समुदाय अपने हिस्से और प्रतिनिधित्व को लेकर चिंतित हैं. वहीं, दूसरी तरफ ओपन मेरिट से आने वाले अभ्यर्थी आरक्षण के बढ़ते दायरे पर सवाल उठा रहे हैं. उनका कहना है कि आरक्षित सीटों का हिस्सा बढ़ने से उनके लिए उपलब्ध अवसर कम हो रहे हैं.
ऐसे में उमर अब्दुल्ला सरकार के सामने चुनौती सिर्फ आरक्षण का प्रतिशत घटाने या बढ़ाने की नहीं है. उसे ऐसा रास्ता निकालना है जिससे आरक्षण का लाभ पाने वाले समुदायों के हित भी सुरक्षित रहें और ओपन मेरिट के अभ्यर्थियों को भी पर्याप्त अवसर मिल सकें.
पढ़िए देश दुनिया और बिहार झारखंड की ओरिजिनल खबर
