चिंताजनक मुद्रास्फीति

तीन साल से मुद्रास्फीति चार प्रतिशत से ऊपर है तथा नौ महीने से यह छह प्रतिशत से भी अधिक है.

लगातार नौ महीनों से मुद्रास्फीति छह प्रतिशत की अधिकतम निर्धारित सीमा से ऊपर है. सितंबर में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित खुदरा मुद्रास्फीति 7.41 प्रतिशत रही, जो पांच महीने में सर्वाधिक है. उल्लेखनीय है कि पिछले साल सितंबर में यह दर मात्र 4.35 प्रतिशत थी. राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार इसका मुख्य कारण खाद्य वस्तुओं की महंगाई है. सितंबर में इन वस्तुओं की मुद्रास्फीति 8.60 प्रतिशत रही.

यह 22 महीनों में सबसे अधिक है. मुद्रास्फीति की दर अनाज में 11.53, दुग्ध उत्पादों में 7.13, सब्जियों में 18.05 और मसालों में 16.88 प्रतिशत रही है. ईंधन व बिजली श्रेणी में भी यह दर 10 प्रतिशत से अधिक रही. इससे सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि पारिवारिक खर्च बढ़ता जा रहा है. ऐसे अनेक अध्ययन सामने आ चुके हैं कि मुद्रास्फीति के कारण लोगों, विशेष रूप से गरीब और निम्न आय वर्ग, को अपने आवश्यक उपभोग व व्यय में कटौती करनी पड़ रही है.

कुछ राहत दाल की मुद्रास्फीति दर के केवल 3.05 प्रतिशत रहने से है, पर इसके दाम पहले ही बढ़ चुके हैं. खाद्य पदार्थों की महंगाई की एक बड़ी वजह यह है कि रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण वैश्विक स्तर पर आपूर्ति बाधित हुई है. मानसून के आखिरी चरण में देश के कई हिस्सों में लगातार भारी बारिश ने सब्जियों के उत्पादन और वितरण पर असर डाला है, जिससे उनके दाम बहुत अधिक बढ़े हैं. रिजर्व बैंक ने दुनिया के कई केंद्रीय बैंकों की तरह मुद्रास्फीति पर लगाम लगाने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी की है और दिसंबर में फिर वृद्धि का अनुमान है.

इस साल के शुरू में तापमान बढ़ने से रबी फसलों का उत्पादन प्रभावित हुआ था, फिर कमजोर मानसून के कारण खरीफ की बुवाई कम हुई. उसके बाद सितंबर-अक्तूबर की बारिश ने खेती का नुकसान किया है. ऐसे में आगे भी अनाज के महंगे होने की आशंका है. रिजर्व बैंक का एक मुख्य कार्य मुद्रास्फीति को चार प्रतिशत के आसपास रखना है, जिसमें विशेष परिस्थितियों में दो प्रतिशत ऊपर या नीचे होने की गुंजाइश है.

भारतीय रिजर्व बैंक कानून के प्रावधान के अनुसार दो से छह प्रतिशत के बीच मुद्रास्फीति नहीं रख पाने पर रिजर्व बैंक को केंद्र सरकार के समक्ष स्पष्टीकरण देना होता है. तीन साल से मुद्रास्फीति चार प्रतिशत से ऊपर है तथा नौ महीने से यह छह प्रतिशत से भी अधिक है. अनेक विशेषज्ञ इसे रिजर्व बैंक की असफलता मानते हैं, तो कई जानकार विभिन्न कारकों को दोष देते हैं. दो साल से अधिक समय तक कोरोना महामारी की भयानक छाया भी अर्थव्यवस्था पर रही है. आशा है कि केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक की आगामी बैठक में समाधान के लिए ठोस उपायों पर चर्चा होगी.

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