पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत भाजपा के लिए कितनी बड़ी उपलब्धि है? इससे राष्ट्रीय राजनीति पर क्या असर पड़ने वाला है?
भाजपा के लिए पश्चिम बंगाल की जीत बहुत बड़ी जीत है. ऐसा बहुत कम होता है कि बंगाल में 2011 में जिस पार्टी के पास एक भी सीट नहीं थी, 2026 में वह सत्ता में आ गयी. वर्ष 2016 के चुनाव में भाजपा को तीन सीटें आयी थीं, जबकि 2021 में 77 सीटें आयीं. जाहिर है, इस दौरान भाजपा संगठन ने बहुत मेहनत की. भाजपा ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मुद्दे पर जोर दिया. बांग्ला भाषा में दखल न होने के बावजूद नरेंद्र मोदी ने खुद को वहां के चुनाव में जिस तरह प्रभावी साबित किया, वह बहुत बड़ी बात है. अमित शाह का रणनीतिक कौशल भी भाजपा की जीत में बहुत कारगर साबित हुआ. बहुत से लोगों का मानना था कि पश्चिम बंगाल में भाजपा सत्ता में नहीं आ पायेगी, लेकिन मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने इसे गलत साबित कर दिखाया. राजनीति के एक छात्र के रूप में मेरा मानना यह है कि जवाहर लाल नेहरू तक पश्चिम बंगाल में ऐसा असर नहीं डाल पाये थे, जितना असर नरेंद्र मोदी ने डाला है. यह बड़ी बात है.
अब ममता बनर्जी का राजनीतिक भविष्य क्या होने वाला है?
ममता बनर्जी के लिए यह बहुत बड़ी हार है. अगर वह चौथी बार चुनाव जीततीं, तो प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवार होतीं. लेकिन भ्रष्टाचार और आर जी कर अस्पताल में दुष्कर्म के बाद हत्या के मामले ने उनकी छवि कमजोर की. हिंदी भाषी न होने के कारण ममता बनर्जी के लिए आने वाले समय बेहद चुनौती भरे हैं. अपनी हार के लिए वह चुनाव आयोग और एसआइआर को जिम्मेदार ठहरा सकती हैं, पर ऐसे में, कामकाज की उनकी शैली और भ्रष्टाचार पर भी सवाल उठेंगे. यह याद रखना चाहिए कि पहले वह एनडीए में थीं और वाजपेयी सरकार में रेल मंत्री रह चुकी थीं. हालांकि यह मानना कठिन है कि वह फिर से एनडीए के साथ अपने रिश्ते सुधारेंगी. बंगाल में हार के साथ ही 2029 के लोकसभा चुनाव में उनकी लड़ाई कठिन हो गयी है. ममता के लिए अपने 39 लोकसभा सांसदों पर नियंत्रण बनाये रखना भी कठिन होगा. पश्चिम बंगाल में लोकसभा की चूंकि 42 सीटें हैं, लिहाजा यह चुनाव जीतकर भाजपा ने 2029 में अपनी स्थिति बेहद मजबूत कर ली है.
इन चुनावों में कांग्रेस के प्रदर्शन को आप किस तरह आंकते हैं?
कांग्रेस ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है. कांग्रेस का प्रदर्शन बहुत अच्छा हो सकता था. केरल में तो वह जीती है, पर अगर तमिलनाडु में विजय के साथ वह गठबंधन करती, तो राष्ट्रीय राजनीति में राहुल गांधी का ग्राफ बहुत अधिक बढ़ जाता. राहुल गांधी की विजय के साथ मुलाकात भी तय थी. तमिलनाडु कांग्रेस के अलावा मणिक्कम टैगोर और प्रवीण चक्रवर्ती जैसे सलाहकार चाहते थे कि कांग्रेस विजय के साथ गठबंधन करे. लेकिन राहुल गांधी ने विवेक का इस्तेमाल नहीं किया और डीएमके के साथ गठजोड़ बनाये रखने का फैसला किया, जिसका नुकसान उसे चुनाव में उठाना पड़ा है.
