तमिलनाडु में अभिनेता से राजनेता बने विजय ने रचा इतिहास

तमिलनाडु चुनाव में नई पार्टी टीवीके और अभिनेता से नेता बने विजय की बड़ी जीत ने राजनीति में बदलाव का संकेत दिया है. चुनावी नतीजे डीएमके और एम के स्टालिन के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं हैं. इसी तरह विधानसभा चुनावों के नतीजे पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के लिए भी झटका वाला रहा. जबकि असम, केरल और पुडुचेरी में नतीजे अपेक्षा के अनुरूप रहे.

Tamil Nadu Election Result: चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के नतीजों में से दो नतीजे बड़े बदलाव के बारे में बताते हैं. एक नतीजा निश्चित तौर पर पश्चिम बंगाल का है, जहां भारतीय जनता पार्टी को बड़ी जीत मिली है. दूसरा बड़ा बदलाव तमिलनाडु में देखने को मिला है, जहां महज दो साल पहले गठित राजनीतिक पार्टी ने चुनावी जीत दर्ज की है और विजय हीरो के रूप में उभरे हैं. विजय की जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि पार्टी बनाने और राजनीति में एक दशक बिताने के बाद एमजीआर को लगभग 33 प्रतिशत मत मिले थे, जबकि विजय उस आंकड़े को पार करते दिख रहे हैं. यह बात इस चुनाव को ऐतिहासिक बनाता है. तमिलनाडु में विजय की सफलता जनमत में बदलाव का स्पष्ट संकेत देती है. जबकि असम, केरल और पुडुचेरी में नतीजे अपेक्षा के अनुरूप रहे. जाहिर है, विधानसभा चुनावों के ये नतीजे पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के लिए, तो तमिलनाडु में स्टालिन के लिए झटका हैं.

नतीजे बताते हैं कि तमिलनाडु में वीसीके, डीएमएफके और एमडीएमके जैसे क्षेत्रीय दलों के प्रभाव ने डीएमके के वोट शेयर को कम कर दिया. वहीं पुडुचेरी में भाजपा ने एनडीए के खाते में और अधिक वोट जोड़े. तमिलनाडु की राजनीति में सबसे बड़ा उलटफेर वर्तमान मुख्यमंत्री एमके स्टालिन का हार जाना रहा. जाहिर है, उदयनिधि के सनातन धर्म पर दिये गये विवादित बयानों ने राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा दिया. गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल की तरह तमिलनाडु में भी विश्वविद्यालयों से जुड़े दुष्कर्म के मामलों ने सुर्खियां बटोरीं.

कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज की तरह तमिलनाडु की अन्ना यूनिवर्सिटी में दिनदहाड़े हुई घटनाएं और एक वीआइपी द्वारा पुलिस को बुलाने की खबर ने विवाद को और गहरा किया. टीवीके, यानी तमिल वेत्री कड़गम के नेता विजय ने डीएमके को पराजित करने का संकल्प लिया था, जिसे उन्होंने प्रभावी ढंग से पूरा किया. उनके आक्रोश के पीछे कई कारण बताये जा रहे हैं-करूर की भगदड़, उनकी फिल्म ‘जननायकन’ की रिलीज पर रोक, और निजी जीवन से जुड़े विवाद. विजय के मुताबिक, इन मामलों को उछालने में डीएमके की भूमिका रही. लिहाजा, क्षुब्ध मतदाताओं ने चुनाव में डीएमके को सबक सिखाया.

इस चुनावी नतीजे के साथ ही डीएमके के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है, मुख्य रूप से विजय की पार्टी टीवीके के उभार के कारण. यह स्थिति 1996 के विपरीत है, जब डीएमके को 173 सीटों के साथ भारी जीत मिली थी. डीएमके की उस जीत में रजनीकांत का समर्थन महत्वपूर्ण था. लेकिन आज परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है. चार मई का जनादेश तमिलनाडु के 39 सांसदों के लिए भी एक जनमत संग्रह जैसा है-क्या उन्होंने आठ करोड़ तमिलों के विकास के लिए पर्याप्त काम किया? हालांकि, चुनाव परिणाम से पहले दोनों प्रमुख गठबंधनों के सहयोगी दल एक-दूसरे पर आरोप लगाने लगे थे, उदाहरण के लिए, एमडीएमके के वाइको ने विजय की प्रशंसा की, तो सीपीएम ने स्टालिन को दोषी ठहराया, जबकि वीसीके के थोल तिरुमावलवन ने आशंका जतायी कि उनके कार्यकर्ताओं ने विजय को वोट दिया है. यही नहीं, तमिलनाडु कांग्रेस भी डीएमके से अलग होने की तैयारी में दिखी. साफ है कि चुनाव में मतदाताओं ने ‘द्रविड़ मॉडल’ को नकार दिया.

स्टालिन की नकारात्मक चुनावी रणनीति, खासकर मोदी के खिलाफ, कुछ हद तक एनडीए के पक्ष में सहानुभूति लहर में बदल गयी. अनुमान है कि विजय ने सभी प्रमुख दलों के दो से पांच प्रतिशत वोट अपने पक्ष में खींचे, जिससे जीत का अंतर कई सीटों पर 2,500 वोट से कम रह सकता है. डीएमके को भ्रष्टाचार, नशे की बढ़ती समस्या, हत्या और दुष्कर्म की घटनाओं, कानून-व्यवस्था की विफलता और कमजोर शासन के कारण सत्ता से बाहर होना पड़ा. स्टालिन सरकार पर कुप्रबंधन और परिवारवाद के आरोप भी चुनावी पराजय का एक बड़ा कारण बने. अब तमिलनाडु की राजनीति एक नये दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां पारंपरिक समीकरण बदल रहे हैं और नये नेतृत्व का उदय हो रहा है.

तमिलनाडु के विपरीत, केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी का नतीजा अपेक्षा के अनुरूप ही रहा. वहां एनडीए ने अच्छा प्रदर्शन किया और भाजपा तथा एनआर कांग्रेस के गठबंधन को जनता का समर्थन मिला. पिछले पांच वर्षों के कामकाज के आधार पर मतदाताओं ने एनडीए को जनादेश दिया. इसके अलावा, पुडुचेरी में अमित शाह के लगातार दौरे ने भी एनडीए के पक्ष में माहौल बनाया. चार मई के चुनाव परिणाम यह भी दर्शाते हैं कि डिजिटल क्रांति अपने चरम पर है. अब सोशल मीडिया टेलीविजन के बराबर या उससे भी अधिक प्रभावशाली हो चुका है.

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