सतर्कता बहुत जरूरी

चीन एक तरफ बातचीत कर भारत का ध्यान बंटाना चाहता है और दूसरी तरफ भारतीय क्षेत्रों को हथियाने की जुगत भी लगा रहा है.

लद्दाख में चीनी सैनिकों के हिंसक अतिक्रमण में एक भारतीय सैन्य अधिकारी और दो सैनिकों की शहादत यह इंगित करती है कि चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांतिपूर्ण यथास्थिति के पक्ष में नहीं है. पिछले महीने उसके अतिक्रमण के बाद पैदा हुई तनातनी को समाप्त करने के लिए भारत उच्चस्तरीय संवाद का शांतिपूर्ण रास्ता अपनाने पर जोर देता रहा है. ऐसे अनेक द्विपक्षीय बैठकें भी हुई हैं और चीन पीछे भी हटा है, लेकिन सोमवार को रात के अंधेरे में भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ कर हमारी टुकड़ियों पर जानलेवा हमला कर चीन की सेना ने इस अंदेशे को सही साबित किया है कि चीन बातचीत के माध्यम से सीमा-संबंधी विवादों के समाधान का इच्छुक नहीं है.

रिपोर्टों की मानें, तो इस झड़प में चीनी सैनिक भी हताहत हुए हैं. साल 1975 के बाद यानी लगभग पांच दशक की अवधि में ऐसा पहली बार हुआ है कि भारत-चीन सीमा और वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सैनिकों ने जान दी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई वार्ताओं तथा दोनों देशों के शीर्षस्थ मंत्रियों एवं अधिकारियों की बैठकों में भारत ने लगातार कहा है कि वह शांतिपूर्ण तरीके से सीमा विवाद को सुलझाना चाहता है तथा चीन के साथ विभिन्न स्तरों पर परस्पर संबंधों को सद्भावपूर्ण बनाना चाहता है.

इसके लिए दोनों देशों ने एक प्रणाली भी बनायी है, जिसके तहत निरंतर संवाद का सिलसिला चलता रहा है. भारत चीनी वस्तुओं के लिए बड़ा बाजार भी है. दोनों देश शंघाई सहयोग संगठन तथा ब्रिक्स के भी सदस्य हैं. इन सबके बावजूद अगर लद्दाख जैसी घटनाएं हो रही हैं, तो इसका सीधा मतलब यही है कि चीन एक तरफ बातचीत कर भारत का ध्यान बंटाना चाहता है और दूसरी तरफ भारतीय क्षेत्रों को हथियाने की जुगत भी लगा रहा है.

दक्षिण एशिया और आसपास के क्षेत्रों में चीन कई वर्षों से अपने आर्थिक और रणनीतिक वर्चस्व को बढ़ाने में लगा हुआ है तथा उसका इरादा भारत की बढ़ती ताकत को बाधित करना है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण पाकिस्तान के अवैध कब्जे के भारतीय क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर हो रही निर्माण और व्यापारिक गतिविधियां हैं. पाकिस्तान की शह पर भारत-विरोधी आतंकवादी और अलगाववादी षड्यंत्रों के सरगनाओं को चीन का संरक्षण देना भी इसी कड़ी में है.

आज जब नेपाल सरकार बहुत पुराने समय से चले आ रहे भारत के साथ सांस्कृतिक और राजनीतिक संबंधों को अतार्किक और आक्रामक रवैये से बिगाड़ने की कवायद करा रही है, तो यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है कि उसकी पीठ पर चीन का ही हाथ है. स्वस्थ राजनीति और कूटनीति के सहारे अगर चीन अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाता, तो वह स्थिति अलग होती, लेकिन उसकी मंशा के निशाने पर भारत है. वह भारत को परेशान कर घेरने की जो कोशिश कर रहा है, उसे लेकर हमारे नेतृत्व को अतिरिक्त सतर्कता बरतने की आवश्यकता है.

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Published by: संपादकीय

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