भारत की हवाई सुरक्षा का ‘सुदर्शन चक्र’ है एस 400

India air defense : युद्ध का इतिहास गवाह है कि जब कोई तकनीक बहुत महंगी और दुर्लभ हो जाती है, तो उसे एक सस्ती और बड़े पैमाने पर उत्पादित तकनीक चुनौती देती है. युद्ध केवल जीतना काफी नहीं है, उसकी लागत भी मायने रखती है.

भारत को रूस से एक दीर्घकालीन समझौते के तहत मिलने वाली एस 400 एयर डिफेंस सिस्टम की पांच स्क्वाड्रन (इकाइयों) में से चौथी इकाई इसी महीने (मई, 2026 में) भारत पहुंचने वाली है. सुदर्शन चक्र के भारतीय नाम से जाने जाने वाले इस सिस्टम की पांच इकाइयों के लिए 2018 में रूस के साथ पांच सौ करोड़ डॉलर मूल्य का समझौता हुआ था. गत वर्ष ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान इस प्रणाली ने कम से कम पांच पाकिस्तानी जेट लड़ाकू विमानों को गिराकर और संभवतः एक एयरबॉर्न इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस विमान को तीन सौ किलोमीटर दूरी पर उड़ते हुए मार गिराकर शानदार सफलता प्राप्त की थी.

छह सौ किलोमीटर की दूरी तक मार करने की क्षमता वाली इस प्रणाली की चौथी इकाई की स्थापना और उपयोग राजस्थान-पाकिस्तान सीमा पर किया जायेगा. भारत अब एक नये समझौते के अंतर्गत कई और ऐसे सिस्टम आयात करने के साथ ही इसके विकसित संस्करण एस 500 के आयात की योजना भी बना रहा है.


इतनी विकसित रक्षा प्रणालियां भारी खर्च के बिना नहीं मिलतीं. वर्ष 2026-27 के लिए भारत का रक्षा बजट लगभग 7.86 लाख करोड़ रुपये होगा जो वर्तमान में जीडीपी का लगभग दो प्रतिशत है. भारत ने 2026-27 के लिए अनुमोदित राशि में से 2.19 लाख करोड़ रुपये सेनाओं के आधुनिकीकरण पर खर्च किये जाने का प्रावधान रखा है. क्या यह खर्च विकास की कीमत पर किया जायेगा? एस 400 मिसाइल प्रणाली और परमाणु पनडुब्बियों (एसएसबीएन) जैसे बड़े निवेश ‘विकास बनाम सुरक्षा’ की बहस का हिस्सा रहे हैं. पर विश्वभर में चल रहे कई युद्ध याद दिलाने के लिए काफी हैं कि रणनीतिक सुरक्षा ही विकास की नींव होती है.

यह भी समझना जरूरी है कि पूंजीगत व्यय (कैपिटल एक्सपेंडिचर) में रक्षा के लिए आवंटित राशि का बड़ा हिस्सा घरेलू उद्योगों से खरीद में खर्च होता है. इसी से देश के भीतर रोजगार और तकनीक का विकास होता है. दिलचस्प तथ्य यह है कि कुल सरकारी खर्च में रक्षा का हिस्सा पिछले दशक में 17 प्रतिशत से गिरकर लगभग 14.6 प्रतिशत पर आ गया है.


युद्ध का इतिहास गवाह है कि जब कोई तकनीक बहुत महंगी और दुर्लभ हो जाती है, तो उसे एक सस्ती और बड़े पैमाने पर उत्पादित तकनीक चुनौती देती है. युद्ध केवल जीतना काफी नहीं है, उसकी लागत भी मायने रखती है. एक एक करोड़ रुपये की मिसाइल या 500 करोड़ रुपये का फाइटर जेट छोटे-मोटे सीमा विवादों में इस्तेमाल नहीं किये जा सकते. इसलिए, दुर्गा जैसे लेजर हथियारों और इलेक्ट्रॉनिक जैमर्स का उत्पादन वित्तीय रूप से अधिक समझदारी भरा है. भारत में तेजस फाइटर जेट के विकसित संस्करणों के उत्पादन में जीई इंजन की ढीली सप्लाई के कारण बहुत धीमी रफ्तार से हो रहे काम ने सिद्ध कर दिया है कि विदेशी हथियारों के साथ हमेशा डिलीवरी और ब्लैकमेल का जोखिम रहता है.

सौभाग्य से, ब्रह्मोस के निर्माण में भारत का नियंत्रण बहुत अधिक है. राफेल फाइटर जेट विमानों का बहुत बड़ा सौदा उसके निर्माता डसाल्ट एविएशन और फ्रांस सरकार की इन लड़ाकू विमानों की सारी इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली और आक्रामक सिस्टम की पूरी जानकारी देने में आनाकानी करने के कारण खटाई में पड़ता दिख रहा है. उसकी जगह रूसी एसयू 57 भी सस्ता सौदा तभी होगा, जब भविष्य में भारत में उसके निर्माण और निर्यात की अनुमति मिल जाये. पर ड्रोन तकनीक में भारत के पास हजारों छोटे स्टार्टअप्स हैं, जिन्हें किसी अमेरिकी या फ्रांसीसी कंपनी की अनुमति की आवश्यकता नहीं है. यह ‘आत्मनिर्भरता’ युद्ध के समय सबसे बड़ा हथियार साबित होगी.


भविष्य में एक अकेला फाइटर जेट नहीं, बल्कि सैकड़ों छोटे ड्रोन का एक टिड्डी दल जैसा झुंड हमला करेगा, जिन्हें एक रडार या एक मिसाइल सिस्टम एक साथ नहीं रोक सकता. एस 400 सिस्टम के मिसाइलों की मारक क्षमता और ड्रोनों की संख्यात्मक शक्ति का मेल किसी भी देश की सीमा को भेदने के लिए पर्याप्त है. इसका प्रमाण है इस्राइल के अभेद्य माने जाने वाले आयरन डोम को धता बताकर ईरान के मिसाइलों का तेल अवीव तक हमला कर पाना. भविष्य के आकाशीय युद्ध का एक दिलचस्प पहलू ‘लॉयल विंगमैन’ प्रोजेक्ट है, जिस पर कई विकसित देश काम कर रहे हैं. इसमें एक पायलट वाला फाइटर जेट होगा, जिसके साथ 10-12 मानवरहित ड्रोन उड़ेंगे.

डीआरडीओ अब दुर्गा 2 जैसी लेजर तकनीक अस्त्रों पर काम कर रहा है, जो कम खर्च में शत्रु ड्रोन को गिरा सकेंगे. इन तथ्यों के आधार पर यही निष्कर्ष निकलता है कि भारत को अब महंगे प्लेटफॉर्म्स (जैसे एयरक्राफ्ट कैरियर या जेट्स) से हटकर सटीक और सस्ते वेपंस (मिसाइल, ड्रोन और साइबर) की ओर बजट का रुख करना चाहिए. भारत ने हाल ही में बड़ी संख्या में आत्मघाती ड्रोन के लिए अनुबंध किये हैं. ‘आइडीइएक्स’ जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से भारतीय स्टार्टअप्स को सस्ते और प्रभावी ड्रोन बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है. पर भारत को अपनी विशाल भौगोलिक स्थिति और चीन जैसी बड़ी वायुसेना का मुकाबला करने के लिए महंगे इंटरसेप्टर (एस 400) और सस्ते ड्रोन, दोनों के संतुलन की आवश्यकता है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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By अरुणेंद्र नाथ वर्मा

अरुणेंद्र नाथ वर्मा is a contributor at Prabhat Khabar.

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