संभ्रांत वर्ग का स्मार्ट बनने का दिखावा

मनोवैज्ञानिक पॉल पिफ और डेचर केल्टनर के शोध के मुताबिक, असाधारणवाद की भावना के कारण एलीट लोगों में कम दयालु होने की प्रवृत्ति पैदा होती है.

मोहन गुरुस्वामी, वरिष्ठ स्तंभकार

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अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए पहली जोरदार बहस के दौरान हमने देखा कि डोनाल्ड ट्रंप जो बाइडेन को उनकी शिक्षा को लेकर कमतर साबित करने की कोशिश कर रहे हैं. बाइडेन का बचपन निम्न वर्गीय परिवार में पेंसिल्वेनिया और डेलवेयर के सीमांत क्षेत्रों में बीता. उनकी पढ़ाई डेलवेयर विश्वविद्यालय से हुई, जहां पढ़ाई करना अपेक्षाकृत सस्ता है. ट्रंप ने कहा है कि इस वजह से वे स्मार्ट नहीं हैं. उन्हें इस बात का ख्याल नहीं रहा कि बाइडेन ने प्रसिद्ध सिराक्यूस विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई की है.

यह बाइडेन की अच्छी परवरिश ही है कि उन्होंने ट्रंप के सैट स्कोर मामले का जिक्र नहीं किया. ट्रंप की शुरुआती शिक्षा फोर्डम यूनिवर्सिटी में हुई और आगे की पढ़ाई के लिए वे पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के व्हार्टन स्कूल चले गये. जाहिर है कि ट्रंप सोचते हैं कि इस तरह का झूठा आरोप उन्हें स्मार्ट बनायेगा. येल और ब्राउन जैसे प्रतिष्ठित अमेरिकी स्कूलों में पैसे से दाखिला आसान हो जाता है, यहां छात्रवृत्ति जीतनेवाले प्रतिभावान छात्रों को मदद मिलती है. यहां तक कि बड़ी आर्थिक मदद द्वारा चेक-बुक मेरिट चलन को रोकने की कोशिश करनेवाला हार्वर्ड भी खुशामदी से नहीं बच पाता.

उत्कृष्ट विद्यालयों, जैसे- भारत में दून स्कूल या ब्रिटेन में एटन या अमेरिका में एक्सेटर में पढ़नेवाले लोग खुद को अलग और दूसरों को कमतर समझते हैं. राजीव गांधी की दून स्कूल से पढ़ाई हुई थी और उन्होंने इसे प्रदर्शित भी किया. जो लोग उत्कृष्ट विद्यालयों या अच्छे इंग्लिश मीडियम स्कूलों से आते हैं और समृद्ध व अच्छे परिवेश का हिस्सा बनते हैं, वे अलग-अलग प्रकार सेे अंग्रेजी बोलते हैं और स्थानीय तरीकों की उपेक्षा करते हैं. मणिशंकर अय्यर का बचकाना अभिजात्यपन तब सामने आया, जब उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में नरेंद्र मोदी को चायवाला बताते हुए कहा था कि उन्हें एआइसीसी के कार्यालय में चाय बेचनी चाहिए. साल 2014 के चुनाव में यह बड़ा मसला बन गया था.

हार्वर्ड अर्थशास्त्री राज चेट्टी के मुताबिक, आमदनी के मामले में शीर्ष एक प्रतिशत में आनेवालों के बच्चों की आइवी लीग स्कूल में प्रवेश की संभावना में 77 प्रतिशत अधिक रहती है. स्पष्ट है कि दाखिला पाने में प्रतिभा से अधिक परिवारिक पृष्ठभूमि अधिक मायने रखती है. इस प्रकार, विरासती सुविधा संपन्नता विशिष्ट तौर पर फायदा पहुंचाती है. दूसरे शब्दों में कहें, तो संपन्नता एक स्वार्थी वर्ग को तैयार करती है.

कोलंबिया विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफेसर शमस खान ने अपनी पुस्तक ‘प्रीविलेज : द मेकिंग ऑफ एन एडोल्सेंट एलीट ए सेंट पॉउल्स स्कूल’ में निष्कर्ष निकाला कि विशेषाधिकार और उत्कृष्टतावाद का भाव संस्थानों में निहित होता है. अमीर पृष्ठभूमि होना अलग से फायदेमंद होता है. सौभाग्य से, अमेरिका के उलट भारत के उत्कृष्ट संस्थानों- आइआइएम, आइआइटी, एनएलएस आदि में प्रवेश पाने के लिए वास्तविक मेरिट की खड़ी पिरामिड की चढ़ायी करनी होती है.

इन स्कूलों और कॉलेजों को क्या उत्कृष्ट बनाता है? वह है- यहां कम लोगों की पहुंच. एक भ्रम है कि वे केवल उन लोगों को ही प्रवेश देते हैं, जो वास्तव में असाधारण हैं. उनके डीन नवागंतुकों का स्वागत करते हुए कहते हैं कि वे बेहतरीन छात्र हैं. ऐसे संस्थानों में प्रवेश पानेवालों को लगातार बताया जाता है कि आप खास हो. खान लिखते हैं कि स्कूल खुले तौर पर यह स्वीकार करते हैं कि आप आम लोगों की तरह नहीं हो. वे अपने उन पूर्व छात्रों की उपलब्धियों का बखान करते हैं, जो देश में ऊंचे ओहदे पर पहुंचे हैं. विशिष्टता के इस भाव को वास्तविक दुनिया में पूर्व-छात्रों के संघों और सामाजिक क्लबों द्वारा बढ़ावा दिया जाता है.

जब मैं 1983 में हार्वर्ड से लौटा, तो मुझे नयी दिल्ली में हार्वर्ड क्लब के बारे में पता चला, जहां पूर्व-छात्र नियमित तौर पर मिलते थे. एकाध बार मैं भी गया और फिर जाना बंद कर दिया, क्योंकि पता चला कि वहां डिग्री वाले कुछ ही लोग थे, ज्यादातर लोग विश्वविद्यालय या कॉलेज की टाइ पहनने का अधिकार पाने के लिए छोटे और महंगे कोर्स करके आये थे. दिल्ली में ऑक्सब्रिज सोसाइटी भी है, जहां कॉलेज में शेक्सपीयर को पढ़ कर आये इतरानेवाले लोग मिलते थे.

खान का लिखना और प्रभावी हो सकता था और ट्रंप के मामले में यह सत्य होता- स्वार्थ के कारण समृद्ध लोग अपने लाभ के लिए असत्य का इस्तेमाल करते हैं. मनोवैज्ञानिक पॉल पिफ और डेचर केल्टनर के शोध के मुताबिक, असाधारणवाद की भावना के कारण एलीट लोगों में कम दयालु होने की प्रवृत्ति पैदा होती है. धनी और अन्य लोगों के बीच दो अलग-अलग नतीजे होते हैं. ड्रग इस्तेमाल को ही लें. गरीबों में इसकी संभावना कम होती है (वास्तव में, युवाओं में, विशेषकर धनी बच्चों में शराब पीने या धूम्रपान की संभावना अधिक होती है.), और जेल जाने का डर अधिक रहता है. अमीरों की तुलना में ऐसे लोगों को अधिक दंड मिलता है. अंत में, कामयाबी को वर्ग से अलग करना असंभव है.

एक बार मेरेे राजनीतिक गुरु स्वर्गीय चंद्रशेखर जी ने मुझसे पूछा- ‘हार्वर्ड में तुुमने क्या सीखा, जो यहां नहीं सीख सकते थे?’ मैंने उत्तर दिया- ‘कुछ भी नहीं.’ लेकिन, हार्वर्ड की डिग्री की वजह से उनके जैसा महत्वपूर्ण व्यक्ति भी मेरे बारे में बहुत अच्छा सोचता है. वे हंसे और बोले कि इस बात पर मैं तुमसे सहमत हूं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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