भारत के दृढ़ संकल्प का प्रतीक था 'ऑपरेशन सिंदूर'

Operation Sindoor : विश्व के बड़े भूभाग पर लगातार बड़ी-बड़ी सैन्य और आर्थिक शक्तियां अंतहीन युद्ध में उलझी हुई हैं. ईरान की धरती पर अमेरिकी और इस्राइली विध्वंसक विमानों तथा मिसाइलों के हमले हजारों नागरिकों को मौत के घाट उतारने के बाद भी युद्ध को किसी अंजाम तक नहीं पहुंचा पाये हैं.

Operation Sindoor : सभी जानते हैं कि पाकिस्तान के फौजी आका आसिम मुनीर ने 22 अप्रैल, 2025 को आतंकवाद की अग्नि में पहलगाम के निर्दोष सैलानियों को झोंकने का जघन्य कृत्य लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों से करवाया था. इसके बाद भारत ने सात-आठ मई, 2025 की रात ‘ऑपरेशन सिंदूर’ नाम से सैन्य कार्रवाई की थी. इसी ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की पहली बरसी पर भारत की आतंकवाद विरोधी नीति की विवेचना की जानी चाहिए. ‘ऑपरेशन सिंदूर’ भारत के इस संकल्प का प्रतीक था कि वह किसी भी कीमत पर पाकिस्तान की गैर-जिम्मेदाराना हरकतों का जवाब सुदृढ़ आक्रामकता के साथ देगा.


विश्व के बड़े भूभाग पर लगातार बड़ी-बड़ी सैन्य और आर्थिक शक्तियां अंतहीन युद्ध में उलझी हुई हैं. ईरान की धरती पर अमेरिकी और इस्राइली विध्वंसक विमानों तथा मिसाइलों के हमले हजारों नागरिकों को मौत के घाट उतारने के बाद भी युद्ध को किसी अंजाम तक नहीं पहुंचा पाये हैं. इस्राइल अभी भी हिज्बुल्ला और हमास को मिटा नहीं पाया है. जवाबी कार्रवाई के रूप में पश्चिम एशिया और खाड़ी में अमेरिका के सहयोगी मुस्लिम देशों पर ईरान के मिसाइलों और ड्रोनों के हमले स्थिति को केवल और उलझा देने में सफल हुए हैं. रूस और यूक्रेन के बीच अनवरत युद्ध बेलगाम चलता जा रहा है. इन सारी विध्वंसक गतिविधियों की तुलना में वर्षभर पहले भारत की ओर से किया गया ‘ऑपरेशन सिंदूर’, एक संक्षिप्त और सफल सैन्य कार्रवाई थी.

भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में पाकिस्तान के विरुद्ध युद्ध की घोषणा किये बिना ही लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए- मोहम्मद के आतंकी ठिकानों को नष्ट कर साबित कर दिया कि वह दुश्मन को उसके गढ़ में घुसकर मारने में भी संकोच नहीं करेगा. इस अभियान में थलसेना, वायुसेना और नौसेना के बीच बेजोड़ तालमेल ने भारत की एकीकृत सैन्यशक्ति का प्रशंसनीय परिचय दिया था. ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की सफलता ने सिद्ध कर दिया कि भारत का लक्ष्य उन्मादित भीड़ की तरह बिना सोचे-समझे विध्वंस करना नहीं था. इसका लक्ष्य आतंकी ठिकानों पर कारगर हमले से पाकिस्तान के युद्धोन्मादी सेना प्रमुख की निर्लज्ज हरकतों का मुंहतोड़ जवाब देना भर था. भारत के इस अभियान में पाकिस्तानी सैन्य ठिकानों और आतंकियों के गढ़ों को पहुंचायी गयी क्षति की तुलना में, भारतीय सैन्य शक्ति को नाममात्र की क्षति ही झेलनी पड़ी. भारतीय सेना द्वारा की गयी मुंहतोड़ कार्रवाई पाकिस्तान का मनोबल तोड़ने में इतनी सफल रही कि पाकिस्तान के डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशन को अपने भारतीय समकक्ष को फोन कर सैन्य कार्रवाई रोकने का अनुरोध करना पड़ा.


‘ऑपरेशन सिंदूर’ में प्रहार के लिए भारतीय वायुसेना के राफेल और सुखोई 30 एमकेआइ लड़ाकू विमानों का सफल उपयोग किया गया था. पाकिस्तान के अंदर गहराई में घुसकर बहावलपुर और मुरीदके के आतंकियों के गढ़ों पर सटीक मार करने के लिए स्कैल्प क्रूज मिसाइल, हैमर स्मार्ट बम समेत ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल और एस 400 सुदर्शन चक्र एयर डिफेंस सिस्टम का भरपूर इस्तेमाल किया गया था. हालांकि, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद बीते एक वर्ष में आधुनिक युद्ध प्रणाली में कई महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं. ईरान ने अपेक्षाकृत सीमित संसाधनों के बावजूद ड्रोन तकनीक के माध्यम से अपनी सैन्य क्षमता को प्रभावशाली बनाकर दिखा दिया है कि भविष्य का युद्ध केवल अत्यधिक महंगे प्लेटफॉर्म पर निर्भर नहीं रहेगा. मानव चालित लड़ाकू विमान लंबी दूरी तक मार करने, जटिल मिशनों को अंजाम देने और सामरिक नियंत्रण स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहेंगे. पर भविष्य में मानव चालित विमान, एआइ आधारित प्रणालियां और स्वायत्त ड्रोन एक संयुक्त तंत्र के रूप में काम करेंगे. भारत को भी अब वैश्विक तकनीकी प्रवृत्तियों को समझते हुए इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, ड्रोन तकनीक और एआइ आधारित सैन्य प्रणालियों के विकास पर ध्यान देना पड़ेगा.


दुर्भाग्यवश अप्रैल, 2026 में ईरान-अमेरिका के बीच दो हफ्ते का युद्धविराम कराने में पाकिस्तान की भूमिका ने उसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर ‘अलग-थलग’ होने से बचा लिया है. पर पाकिस्तान की लोमड़ीनुमा कूटनीति की तुलना में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रणनीति लंबी अवधि की है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पल-पल बदलती नीतियों के बावजूद मोदी असाधारण गहराई और परिपक्वता का परिचय अपनी चुप्पी से दे रहे हैं. ट्रंप प्रशासन के दौरान पाकिस्तान को फिर से मिली अहमियत से घबराने के बजाय भारत को अपनी रणनीति में सुधार करना चाहिए. उसे दुनिया को लगातार पहलगाम हमले की याद दिलाकर बताते रहना होगा कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की जरूरत क्यों पड़ी थी. हमारा रुख अब रक्षात्मक के बजाय सक्रिय रणनीतिक होना चाहिए. भू-राजनीति के इस खेल में अंततः ‘स्वावलंबन’ ही वह एकमात्र कवच है, जो भारत को बाहरी दबावों और अस्थिर मित्रताओं से सुरक्षित रख सकता है. एक वर्ष बीत जाने के बाद ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की विवेचना का एक ही निष्कर्ष है- भारत पाकिस्तान प्रेरित आतंकवाद का मुकाबला आंतरिक शक्ति के विकास और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, दोनों दिशाओं में सजग और प्रयत्नशील रहकर ही कर सकता है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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By अरुणेंद्र नाथ वर्मा

अरुणेंद्र नाथ वर्मा is a contributor at Prabhat Khabar.

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