NEET UG 2026 : पेपर लीक होने के कारण देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट-यूजी, 2026 को पूरी तरह रद्द करने का फैसला उसकी परीक्षा दे चुके लाखों छात्रों के लिए बड़ा झटका है. यह फैसला इसलिए भी बहुत बड़ा है, क्योंकि पहली बार नीट-यूजी जैसी राष्ट्रीय परीक्षा को पूरी तरह रद्द किया गया है. इसकी जांच सीबीआइ को सौंप दी गयी है. पेपर लीक और गड़बड़ी के आरोप तो इससे पहले भी आते रहे हैं, लेकिन अभी तक पूरी परीक्षा को रद्द नहीं किया गया था. जांच एजेंसियों की रिपोर्ट के बाद एनटीए-यानी नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने यह परीक्षा दोबारा आयोजित कराने का फैसला किया है.
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इतनी महत्वपूर्ण परीक्षा में गड़बड़ी के मामले अब सालों-साल सामने आने लगे हैं. इससे पहले 2024 की नीट-यूजी परीक्षा का मामला भी बहुत चर्चित रहा था, जब बिहार और झारखंड में पेपर लीक का मामला सामने आया था. तब सीबीआइ जांच में यह खुलासा हुआ था कि कुछ उम्मीदवारों को परीक्षा से पहले ही प्रश्नपत्र उपलब्ध करा दिये गये थे. मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा था, जहां परीक्षा रद्द कर दोबारा कराने की मांग उठी थी. हालांकि तब परीक्षा रद्द नहीं की गयी थी, क्योंकि शीर्ष अदालत का कहना था कि उपलब्ध रिकॉर्ड से यह साबित नहीं होता कि पूरे सिस्टम में बड़े पैमाने पर पेपर लीक किया गया था.
उस समय शिक्षा मंत्रालय ने यह कहा था कि कुछ अलग-थलग घटनाओं के कारण लाखों छात्रों का भविष्य प्रभावित नहीं किया जा सकता. उससे पहले 2015 में ऑल इंडिया प्री-मेडिकल/प्री डेंटल टेस्ट (एआइपीएमटी) को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर रद्द किया गया था. तब आरोप यह लगा था कि कुछ उम्मीदवारों ने ब्लूटूथ डिवाइस और माइक्रो सिम के जरिये परीक्षा के दौरान उत्तर हासिल किये थे. तब सुप्रीम कोर्ट ने परीक्षा रद्द कर चार सप्ताह के भीतर दोबारा परीक्षा कराने का आदेश दिया था. बाद में 2016 से नीट ने एआइपीएमटी की जगह ले ली. सीधे शब्दों में कहें, तो यह ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार का मामला है. पेपर बेचे जाते हैं. करोड़ों के इस खेल में सभी शामिल हैं, वे भी जिन्हें लाभ लेना है, और वे भी, जिन्हें कार्रवाई करनी है. नुकसान देश के लाखों छात्रों का होता है, जो मेहनत करके पढ़ाई करते हैं. चूंकि एनटीए द्वारा आयोजित नीट परीक्षा के स्कोर के आधार पर मेडिकल कॉलेजों में दाखिला मिलता है, इसलिए इस परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए लाखों छात्र संघर्ष कर, तनाव झेलकर सालभर पढ़ाई करते हैं और परीक्षा देते हैं.
परीक्षा के पेपर लीक हो जाने पर उन पर क्या गुजरती है, यह सिर्फ वही जानते हैं. नुकसान उनके अभिभावकों को होता है, जो संघर्ष करके अपने बच्चों को इस मुकाम तक ले आते हैं कि वे मेडिकल का एंट्रेंस एग्जाम दे सकें. वे अपने जीवन की जमा-पूंजी इसमें झोंक देते हैं. इस परीक्षा का पेपर लीक होने से छात्रों और अभिभावकों में स्वाभाविक ही गहरा असंतोष है और देश की कई जगहों पर छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं. नीट परीक्षा का आयोजन करने वाली एनटीए-यानी नेशनल टेस्टिंग एजेंसी एक स्वायत्त संस्थान है. लिहाजा इसे किसी के दबाव में नहीं आना चाहिए. एनटीए की स्थापना प्रमुख उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के लिए उम्मीदवारों की क्षमता का आकलन करने के लिए कुशल पारदर्शी और अंतरराष्ट्रीय स्तर की मानकीकृत परीक्षाएं आयोजित करने के उद्देश्य से की गयी थी. यह ठीक है कि 2019 में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसइ) से नीट-यूजी के संचालन का कार्यभार संभालने के बाद से एनटीए ने उम्मीदवारों की संख्या में भारी वृद्धि को संभाला है. लेकिन यह भी सच है कि अपनी तकनीकी क्षमता के बावजूद इस एजेंसी को विवादों का सामना करना पड़ा है.
पूछा जा रहा है कि सालों-साल होते पेपर लीक का हल क्या है. ऐसा नहीं है कि इसके हल के लिए कदम न उठाये गये हों. उदाहरण के लिए, 2024 के पेपर लीक के बाद केंद्र सरकार ने पूर्व इसरो प्रमुख के राधाकृष्णन की अध्यक्षता में सात सदस्यीय समिति गठित की थी. इस समिति ने परीक्षाओं की सुरक्षा बढ़ाने के लिए कई सुझाव दिये थे. इनमें परीक्षा केंद्रों को जिला प्रशासन और पुलिस की निगरानी में सील करना, जीपीएस युक्त वाहनों में प्रश्नपत्र पहुंचाना, सीसीटीवी निगरानी, बायोमीट्रिक वेरीफिकेशन और केंद्रीकृत मॉनीटरिंग सिस्टम व्यवस्था लागू करने जैसे प्रस्ताव थे, जिन पर अमल किया गया.
एनटीए ने इस वर्ष कई सुरक्षा उपाय लागू किये थे. पुलिस सुरक्षा में सामग्री पहुंचाये जाने के अलावा कई परीक्षा केंद्रों पर मॉक ड्रिल भी करायी गयी थी. इसके बाद भी गेस पेपर के नाम पर पेपर व्हाट्सएप पर साझा किये गये. इससे एनटीए की कार्यप्रणाली पर स्वाभाविक ही गंभीर सवाल खड़े हो गये हैं. अमूमन इन परीक्षाओं के जो पेपर तैयार किये जाते हैं, उनके तीन सेट बनाये जाते हैं. लिहाजा जब एक सेट लीक हो गया, तो दूसरे सेट से परीक्षा करवायी जा सकती है. लेकिन ऐसा होता नहीं. ऐसे में, पेपर लीक होने को संयोग नहीं, बल्कि प्रयोग माना जाना चाहिए, क्योंकि अगर एक बार पेपर लीक हो, तो उसे मानवीय भूल माना जा सकता है. लेकिन बार-बार पेपर लीक होना सिस्टम की अक्षमता के बारे में बताता है. बार-बार परीक्षा में अनियमितताओं के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही है.
पेपर लीक मामले की जांच सीबीआइ को सौंपी तो गयी है और वह काम भी कर रही है. लेकिन इससे पहले जो पेपर लीक के मामले सामने आये थे, उनकी जांच भी सीबीआइ को सौंपी गयी थी. लेकिन कुछ ठोस सामने नहीं आया. ऐसे में, सरकार को इस बारे में सख्ती से सोचना होगा. वर्ष 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाना है, तो उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में हमें उन्नत और पारदर्शी होना होगा. इसके लिए लगातार कदम उठाने होंगे. पिछले दिनों नयी दिल्ली में हुए अंतरराष्ट्रीय एआइ सम्मेलन के दौरान हमने देखा कि एक प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी ने चीनी एआइ मॉडल को भारतीय बताकर पेश किया. इससे हमारे देश की कोई अच्छी छवि नहीं बनती. सरकार कह रही है कि नीट पेपर लीक मामले में दोषियों पर कार्रवाई होगी. लेकिन कार्रवाई से भी ज्यादा जरूरी दरअसल ऐसा सिस्टम तैयार करना है, जिसमें नीट जैसी परीक्षा के पेपर लीक न होने पायें. पेपर लीक मामले में कुछ गिरफ्तारियां हुई हैं. पर इस साजिश के पीछे शामिल लोगों की पूरी कड़ी की शिनाख्त कर उन्हें दंडित करने से ही बात बनेगी.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
