निवेश में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़े

आर्थिक समीक्षा से यह इंगित होता है कि सरकार इस बात को लेकर चिंतित है कि निजी क्षेत्र द्वारा अपेक्षित निवेश नहीं हो रहा है और केवल सरकारी खर्च से अर्थव्यवस्था की गाड़ी नहीं चल सकती है.

आर्थिक समीक्षा एक महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है, जिसके माध्यम से सरकार आधिकारिक रूप से देश की अर्थव्यवस्था की स्थिति का आकलन और विश्लेषण प्रस्तुत करती है. इसमें पिछले साल की वस्तु-स्थिति के साथ-साथ आगे के संबंध में अनुमान बताया जाता है. आर्थिक समीक्षा आर्थिक स्थिति के समक्ष चुनौतियों और समस्याओं को भी रेखांकित करती है. कई सारी बातें, जो बजट प्रस्ताव में नहीं आ पाती हैं, इस दस्तावेज में कही जाती हैं.

इससे सरकार की नीतिगत दृष्टि का भी एक परिचय हमें मिलता है. यह बात हमें ध्यान में रखना चाहिए कि यह दस्तावेज सरकार की ओर से प्रस्तुत किया जाता है, तो उसमें सरकारी नीतियों का समर्थन ही होता है. फिर भी कई बातें आर्थिक समीक्षा से निकलती हैं, जिन्हें समझा जाना चाहिए. एक बात तो यह है कि कोविड महामारी के बाद से हमारी अर्थव्यवस्था में सुधार तो आया है और आर्थिक समीक्षा भी इसे इंगित करती है.

समीक्षा का दावा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था महामारी के असर से लगभग बाहर निकल चुकी है. लेकिन जब हम विस्तार से देखते हैं, तो यह भी तथ्य सामने आता है कि यह प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है. हमारे सामने घरेलू स्तर भी चुनौतियां हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी. जहां तक वैश्विक चुनौतियों का प्रश्न है, तो अभी भी रूस-यूक्रेन युद्ध चल ही रहा है, दुनियाभर में मुद्रास्फीति की गंभीर स्थिति बनी हुई है तथा ब्याज दरों में वृद्धि का सिलसिला बना हुआ है. इस पृष्ठभूमि में वैश्विक स्तर पर मंदी की आशंका भी पैदा हो रही है.

स्वाभाविक रूप से ये चुनौतियां भारतीय अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित कर रही हैं. ऐसी स्थिति में घरेलू स्तर पर नीतिगत दृष्टि क्या होगी, क्या उपाय किये जायेंगे, इस पहलू पर आर्थिक समीक्षा में अधिक स्पष्टता से नहीं कहा गया है. संभव है कि वित्त मंत्री द्वारा पेश होने वाले बजट प्रस्ताव में इस संबंध में विस्तार से बताया जाए. आर्थिक समीक्षा ने सही रेखांकित किया है कि हमारा करेंट एकाउंट घाटा यानी विदेशी मुद्रा का घाटा एक बड़ी चुनौती है.

मुद्रास्फीति की गंभीर चुनौती को भी रेखांकित किया गया है. पूंजी व्यय यानी निवेश में जो निजी क्षेत्र की भूमिका और भागीदारी होनी चाहिए, वह अपेक्षा के अनुरूप नहीं है. इस समस्या को भी समीक्षा में इंगित किया गया है. मेरा मानना है कि जो घरेलू समस्याएं हैं, वे गंभीर चुनौती हैं. सरकार को केवल इन्हें चिह्नित नहीं करना चाहिए, बल्कि उनके समाधान के लिए प्रयासरत भी होना चाहिए. अगर ये समस्याएं लंबे समय तक बनी रहेंगी, तो देश की अर्थव्यवस्था पर कई वर्षों तक इनका असर बना रहेगा.

आर्थिक समीक्षा ने स्पष्ट रूप से इंगित किया है कि हमारे निजी क्षेत्र का जो निवेश होता था, वह पर्याप्त नहीं है और उसमें उल्लेखनीय बढ़ोतरी की आवश्यकता है. यह निवेश हमारी आर्थिक वृद्धि का एक अहम इंजन है, जो महामारी से पहले से ही धीमी रफ्तार से चल रहा है. निवेश करने में निजी क्षेत्र की हिचक की मुख्य वजह यह है कि बाजार में मांग वैसी नहीं है. वैश्विक स्तर पर भी मांग में कमी है, जिससे हमारे निर्यात में कमी आ रही है. घरेलू स्तर पर अर्थव्यवस्था अभी ठीक से रिकवर नहीं हो पायी है.

अब जब मांग नहीं होगी, तो उद्योग निवेश भी नहीं करेंगे. इस संबंध में मुख्य बात यह है कि लोगों की आमदनी में वृद्धि होनी चाहिए ताकि लोगों की क्रयशक्ति बढ़े और वे वस्तुओं की मांग करें. आर्थिक समीक्षा में इस पहलू पर कुछ नहीं कहा जाना चिंताजनक है क्योंकि सरकार को आमदनी बढ़ाने के लिए उपाय करने को प्राथमिकता देने की जरूरत है. आंकड़े बताते हैं कि ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में लोगों की क्रयशक्ति में कमी आ रही है. जब पैसा नहीं होगा, तो खरीद भी वैसी नहीं होगी, जो अच्छी आर्थिक वृद्धि के जरूरी है. इस पर समीक्षा में बात की जानी चाहिए थी.

शहरी और ग्रामीण इलाकों में जो निम्न आय और निर्धन वर्ग के लोग हैं, उनकी आमदनी में वृद्धि करने के लिए सरकार को निवेश और व्यय करना पड़ेगा. दूसरा, जो वर्ग मांग बढ़ाने में बड़ा योगदान करता है, वह है मध्य आय वर्ग, जो शहरी क्षेत्र में रहता है. उसकी आमदनी बढ़ाने के लिए भी कुछ-न-कुछ उपाय करने होंगे. तो एक उपाय यह है कि लोगों की क्रयशक्ति बढ़े और दूसरा उपाय है कि सरकार अपने खर्च में बढ़ोतरी करे.

मांग को बढ़ाने से ही अर्थव्यवस्था को अपेक्षित गति मिल सकती है. आर्थिक समीक्षा से यह इंगित होता है कि सरकार इस बात को लेकर चिंतित है कि निजी क्षेत्र द्वारा अपेक्षित निवेश नहीं हो रहा है और केवल सरकारी खर्च से अर्थव्यवस्था की गाड़ी नहीं चल सकती है. संभव है कि बजट प्रस्ताव में वित्त मंत्री इस संबंध में कोई ठोस प्रावधान करें. आय बढ़ाने के मामले पर चर्चा होनी जरूरी है. अब बजट में ये सब किस तरह से अभिव्यक्त होगा, यह कह पाना अभी मुश्किल है. लेकिन हमें यह उम्मीद करनी चाहिए कि वित्त मंत्री आमदनी बढ़ाने के उद्देश्य से कुछ विशेष प्रस्ताव लेकर आयेंगी.

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