विलासितापूर्ण जीवन पर नियंत्रण जरूरी

सुंदर दुनिया को तभी भोग सकते हैं, जब जीवन बिना लड़खड़ाये टिकने योग्य हो. मात्र एक बात कि हम किस तरह अपनी आवश्यकताओं तक सीमित रहें. अपने आराम और विलासिता वाले जीवन पर कुछ अंकुश लगायें.

पिछले 200 वर्षों से जिस रफ्तार से हमने अपनी आदतों, सुविधाओं को लेकर बदलाव लाने की कोशिश की, उससे दोगुनी और तिगुनी रफ्तार से हमारे बीच प्रकृति के बदलाव भी आये. और इसे ही समझना ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि यह स्पष्ट है कि अंततः किसी भी तरह की सुविधा, विकास या हमारे पेट-पानी के सवाल अगर कहीं सीधे जुड़े हैं, तो वह प्रकृति के संसाधनों से जुड़े हैं. अगर ऐसा है, तो बदलते परिवेश में प्रकृति और पर्यावरण की सबसे बड़ी चोट इन्हीं पर पड़ेगी. इस बात को अधिक समझने की आवश्यकता भी नहीं है. इस बात को समझाने के लिए पिछले दो दशक से कई तरह की कोशिशें हुईं. प्रकृति से जुड़े लोगों व शोधार्थियों ने इस बदलाव की आहट महसूस की और कई तरह की कोशिशें भी की कि प्रकृति का यह संदेश सब तक पहुंचे.
जिस तरह हम अपनी जीवनशैली को आगे ले जाने की कोशिश कर रहे हैं, उसमें अब अधिक संभावना नहीं बची है, क्योंकि पृथ्वी की भी वहन सीमाएं हैं. इसलिए जरूरी हो जाता है कि हम कहीं अपने तथाकथित विकास पर अंकुश लगा दें. यह तो आप स्वीकारेंगे ही कि प्रकृति हमारी आवश्यकताओं के लिए थी. वैसे भी यह एक बहुत बड़ा नारा भी रहा जिसे हम बीच-बीच में बांचते रहे हैं. प्रकृति हमारी आवश्यकताओं के लिए थी न कि हमारी विलासिताओं के लिए. परंतु कालांतर में विलासिता ही हमारी आवश्यकता बन गयी. कंफर्ट ही हमारी नीड बन गया. इसका भी पता नहीं चला और यदि बात वहीं तक सीमित होती तो शायद स्वीकार योग्य होती, परंतु अब विलासिताओं में भी इतनी ज्यादा लेयर आ गयी है, जिसका बोझ पृथ्वी नहीं उठा पायेगी. पर अब शायद आवश्यकताओं को भी कठिन समय से गुजरना ही है. शौक के उदाहरण कई हो चुके हैं. कारों में ही देखिए, कंपनियों ने अब कितने तरह के उत्पादों को बाजार में खड़ा कर दिया और उसमें स्टेटस सिंबल को जोड़कर देखना शुरू करा दिया. सुविधाओं में एसी, टीवी को ही देखिए, जो कुछ भी जुटा वह एक सीमा तक ठीक था, लेकिन अब प्रकार व रिमोट पर भी हम उतर आये हैं. यानी, हम अपने शरीर को बिना कष्ट दिये ही सब कुछ करना चाहते हैं. जूते जिन्हें पैरों में पहनना है, वे एक खास वर्ग के लिए हजारों रुपये के हो गये. सब ब्रांड व स्टेटस से जोड़ कर देखा जाता है. और एक बड़े बाजार ने सब कुछ घेर लिया. दुर्भाग्य है कि इस तरह के लोग दुनिया में पहले अधिक नहीं थे. पर अब शहरों में वृद्धि ने मांग बढ़ा दी. धीरे-धीरे गांव भी चपेट में आ गये.


जब से शहर विलासिताओं तथा कंफर्ट के केंद्र बने, तब से यहीं भीड़ बढ़ गयी. आज दुनिया की 50 प्रतिशत जनसंख्या शहरों में आ गयी. पहले इस तरह की जीवनशैली दुनिया के 10 प्रतिशत से अधिक लोगों के शौक थे. अब सबकी दौड़ इसी तरह की जीवनशैली की है. इनकी देखा-देखी ही समाज के दूसरे वर्ग पर भी असर पड़ा है. आज हम जिस तरह से शौकीन हो चुके हैं, उसका खामियाजा हमें बड़े रूप में भुगतना पड़ रहा है. मसलन, शहरों की बढ़ती संख्या इसी बात का सबसे बड़ा सबूत भी है कि यह हमारे लिए कंफर्ट जोन की तरह है, जहां तमाम तरह की सुविधाएं उपलब्ध हैं. और साथ में यह भी मानकर चला गया कि यह शहर ही हैं जहां से रोजगार के रास्ते भी खुलते हैं. हमने अपने पारंपरिक रोजगार के रास्तों को एक तरफ बंद तो किया ही, जिसमें खास तौर से खेती-बाड़ी आती है, पर जब से औद्योगिक क्रांति आयी, खेत बहुत छोटे कर दिये गये और इसे एक खास वर्ग का दायित्व समझते हुए यह उसी के हिस्से का काम मान लिया गया. दुनियाभर में पिछले सौ-दो सौ वर्षों की तुलना में खेती-बाड़ी सिकुड़ गयी है. इतना ही नहीं, खेती बाड़ी के उत्पादन पर तो असर पड़ा ही, हमारी प्राथमिकताओं के कारण इनकी विविधता पर भी चोट पहुंची. अब अमेरिका को ही देखें. उसने अपनी खेती-बाड़ी की दिशा इस रूप में बदल दी जहां से फ्यूल के रास्ते खुल सकें. यहां मक्के को एथेनॉल के रूप में उपयोग में लाया जा रहा है और यही चलन अब देश-दुनिया के अन्य कोनों में भी आ चुका है. दुनिया के कई देश ऐसे हैं, जहां खेती उनकी जीडीपी का मात्र एक से तीन प्रतिशत है. इनमें अमेरिका, जापान, अरब आदि देश हैं.


साफ-सी बात है कि ऊर्जा की बड़ी आवश्यकता और शहरों की बढ़ती संख्या ने अंतरराष्ट्रीय स्तर तक असर डाल रखा है. यह ऊर्जा ही है, जिसने दुनियाभर में सबसे बड़ा संकट भी पैदा किया है. अब विकसित देश और विकासशील देशों का मतभेद व आपस की खींचातानी कार्बन डाइऑक्साइड को लेकर ही है. यह काला धुआं कोयले के ज्यादा उपयोग से बनता है. विकासशील देशों के पास ऊर्जा का कोई और रास्ता न होने के कारण इसी पर निर्भरता है, वहीं दूसरी तरफ विकसित देश यह दावा करने की कोशिश करते हैं कि अगर पृथ्वी को कहीं से बड़ा संकट है तो विकासशील देशों से है. ये देश अपना पेट भर चुके और अब दूसरों को सलाह देना चाहते हैं. अब उनकी नजर विकासशील देशों पर है कि वे किस तरह से इन्हें रोकें. परंतु, इन बातो के अतिरिक्त अधिक महत्वपूर्ण यह है कि पारिस्थितिकी हाथ से बाहर जा चुकी. पिछले एक दशक में तमाम जद्दोजहद के बाद भी हालत बिगड़े ही हैं. वर्ष 2023 में 2022 की तुलना में सीओ2 एक प्रतिशत अधिक उत्सर्जित हुआ और पिछले वर्ष जुलाई महीना दुनिया में सबसे गर्म माना गया. इन सबके अतिरिक्त, जब मौसम नियंत्रण से बाहर जा चुका हो, तो समझ लेना चाहिए कि दिन बिफर गये. यह मानकर चलिए कि 2024 पिछला रिकॉर्ड तोड़ने के लिए तैयार है. अपने देश में तो हमने 2016 को अब तक का सबसे गर्म वर्ष माना था और यह मानकर चले थे कि यह देश का सबसे ज्यादा तापमान का समय था. परंतु, अब 2024 के शुरुआती हालत बताते हैं कि शायद यह पिछले रिकॉर्ड को भी तोड़ दे.
अब एक ही विषय पर बहस की जरूरत है कि जान ज्यादा जरूरी है कि जहान. सुंदर दुनिया को तभी भोग सकते हैं जब जीवन बिना लड़खड़ाये टिकने योग्य हो. मात्र एक बात कि हम किस तरह अपनी आवश्यकताओं तक सीमित रहें. अपने कंफर्ट और विलासिता वाले जीवन पर कुछ अंकुश लगायें, क्योंकि यदि हमने तत्काल ऐसा नहीं किया, तो परिस्थितियां और विपरीत होंगी. कल के बदले आज ही अंत की शुरुआत हो जायेगी.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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