अर्थव्यवस्था को गति देती दीपावली, पढ‍़ें अभिजीत मुखोपाध्याय का आलेख

Diwali : इस बार की दीपावली स्वातंत्र्योत्तर भारत के इतिहास में सबसे विराट त्योहारी कारोबार के रूप में सामने है, जब आंकड़े के मुताबिक, कुल व्यापार पांच लाख करोड़ रुपये (पांच ट्रिलियन रुपये) से अधिक हो जाने की संभावना है.

Diwali : दीपावली ऐसे समय में आयी है, जब भारतीय अर्थव्यवस्था दोराहे पर है. हालांकि व्यापारिक संरक्षणवाद, अमेरिकी टैरिफ और वैश्विक मांगों के रुख बदलने जैसे बाहरी आघातों के बावजूद भारत वैश्विक आर्थिक विकास में स्वर्णिम और शानदार जगह बनाये हुए है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और दूसरी वैश्विक एजेंसियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में हाल में यही रेखांकित किया है. दीपावली के समय भारतीय अर्थव्यवस्था के उभार का कारण सिर्फ सांस्कृतिक नहीं है- इसने घरेलू अर्थव्यवस्था को उभरने का अवसर दिया है, जो भीतरी और बाहरी आघातों से उबर कर अपनी वृद्धि का सिलसिला जारी रखना चाहती है.


इस बार की दीपावली स्वातंत्र्योत्तर भारत के इतिहास में सबसे विराट त्योहारी कारोबार के रूप में सामने है, जब आंकड़े के मुताबिक, कुल व्यापार पांच लाख करोड़ रुपये (पांच ट्रिलियन रुपये) से अधिक हो जाने की संभावना है. दीपावली में देश की जीडीपी में 1.5 से दो प्रतिशत की वृद्धि की उम्मीद है. इसके तहत मुख्यत: रिटेल, ई-कॉमर्स, छोटे व्यापार, इवेंट मैनेजमेंट, लॉजिस्टिक्स और रियेल एस्टेट को रफ्तार मिल रही है. खुदरा क्षेत्र में टिकाऊ वस्तुओं, कपड़े, आभूषण और इलेक्ट्रॉनिक्स की बिक्री का आंकड़ा 1.2 ट्रिलियन रुपये से अधिक हो जाने की उम्मीद है. सेवा क्षेत्र-खासकर इवेंट मैनेजमेंट और पैकेजिंग में भी भारी उछाल आने की उम्मीद है.

दीपावली में खर्च को तो पंख लगते ही हैं, यह पर्व एमएसएमइ (सूक्षम, लघु एवं मध्यम उद्यम) के साथ-साथ स्थानीय कारीगरों के लिए भी आय में वृद्धि का बड़ा अवसर होता है. ये दोनों ही क्षेत्र अपनी सालाना आय के लगभग 30 प्रतिशत के लिए दीपावली पर निर्भर रहते हैं. त्योहार का यह समय न केवल घरेलू उपभोग को गति देता है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी इस दौरान खर्च में भारी वृद्धि देखी जाती है. पिछले तीन साल में औसत भारतीय परिवारों का खर्च 56,000 रुपये बढ़ा है, जो 33 प्रतिशत के आसपास है. यह खर्च शहरी और ग्रामीण, दोनों क्षेत्रों में बढ़ा है. जाहिर है कि परिवारों के खर्च में वृद्धि में दीपावली की महत्वपूर्ण भूमिका होती है.


बेशक आर्थिक मजबूती का दूसरा पक्ष भी है. हाल के महीनों में मुद्रास्फीति, मजदूरी में ठहराव और व्यापक वैश्विक उथल-पुथल से कुल घरेलू उपभोग में कमी दिखायी पड़ी है. इस तरह देखें, तो मांग और खर्च में वृद्धि बिल्कुल सही समय पर हुई है, लेकिन सवाल है कि खासकर ग्रामीण इलाकों और निम्नमध्यवर्गीय परिवारों में मांग में यह वृद्धि कितने समय तक बरकरार रहेगी. देश के मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में मजबूती का माहौल है. वित्त वर्ष 2024-25 में इस क्षेत्र की वृद्धि दर 4.26 प्रतिशत रही, जो उससे पहले के वित्त वर्ष की 1.4 फीसदी की वृद्धि दर से अधिक रही. मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र का देश की जीडीपी में 14 प्रतिशत का योगदान है. जीएसटी में किये गये सुधार और विभिन्न सहायक क्षेत्रों में (जुलाई में आइआइपी-यानी औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में 5.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई) अनुकूल नीतियों के कारण मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में यह मजबूती आयी है.

दीपावली के समय इस क्षेत्र में मजबूती से मैन्युफैक्चरिंग के साथ-साथ लॉजिस्टिक्स और रिटेल क्षेत्र में लाखों अस्थायी नौकरियां पैदा हुई हैं, जिनके जरिये प्रत्यक्ष और परोक्ष रोजगार पैदा हुए हैं. इसके बावजूद ढांचागत मुश्किलें तो कमोबेश बनी ही हुई हैं. दीपावली के त्योहारी सीजन से परे कुल मिलाकर जो रोजगार सृजन है, वह देश की विशाल कार्यशील आबादी को देखते हुए पर्याप्त नहीं है. इसके अलावा मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में कमियों के कारण दीर्घावधि में निर्यात की क्षमता में भी हम दूसरे देशों से पीछे रह जाते हैं. ऐसे में, दीपावली के समय बना सकारात्मक माहौल बेशक महत्वपूर्ण है, हालांकि अर्थव्यवस्था में व्यापक रूपांतरण के लिए सुधारों और निवेश को लगातार बनाये रखना होगा.

निर्यात के क्षेत्र में भी भारत को विविध चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. विगत जुलाई में अमेरिका द्वारा लगाये गये टैरिफ इनमें सबसे भीषण हैं. अमेरिका के अलावा दूसरे कई देशों ने भी संरक्षणवादी नीतियां लागू की हैं, जिनका असर भारतीय व्यापार पर पड़ रहा है. इससे हमारी मैन्युफैक्चरिंग मांग में कमी आयी है, साथ ही, वस्त्र, रत्न और आभूषण तथा इंजीनियरिंग सामान के निर्यात पर भी असर पड़ रहा है. सेवाओं का निर्यात जो अब तक मजबूत स्थिति में था, उसमें भी अब मंदी के चिह्न हैं. लेकिन अच्छी बात यह है कि जीएसटी सरलीकरण, रोजगार से जुड़े वित्तीय प्रोत्साहन और चुनिंदा आयकर कटौती जैसे सरकारी सुधारों से उपभोग और निवेश को गति देने में मदद मिली है. दीपावली की तिमाही में सरकारी राजस्व में होनेवाली वृद्धि से सार्वजनिक क्षेत्र में निवेश बढ़ाना आसान हो जाता है. अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेलों, डिजिटल इंडिया प्रोग्राम की शुरुआत और मौद्रिक नीति की निरंतरता से भी जीएसटी संग्रह में वृद्धि हुई है. अर्थव्यवस्था पर दीपावली का प्रभाव बहुआयामी होता है. इस अवसर पर लाखों की संख्या में रोजगार सृजन होता है, जो अस्थायी होते हुए भी महत्वपूर्ण साबित होता है. इस दौरान वित्तीय समावेशिता को भी गति मिलती है, क्योंकि डिजिटल भुगतान में काफी वृद्धि होती है.

दीपावली के समय निर्यात में भी तेजी आती है, क्योंकि इस अवसर पर विदेशों में बसे प्रवासी भारतीयों के लिए सांस्कृतिक उत्पादों का निर्यात बढ़ता है. परिवारों में भी इस अवसर पर विलासिता की वस्तुओं, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, रत्न और आभूषण आदि की बड़े पैमाने पर खरीदारी की जाती है. कुल मिलाकर, देखें तो प्रतिकूल वैश्विक स्थिति के बीच दीपावली के समय उत्पन्न आशावाद आर्थिक मजबूती के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. लिहाजा देश के नीति निर्माताओं और कारोबारी दिग्गजों को यह आश्वस्त करना चाहिए कि आर्थिक उत्साह का यह माहौल आगे भी बना रहेगा.


इसके लिए जरूरी है कि एमएसएमइ क्षेत्र का डिजिटलीकरण किया जाये, ताकि दीपावली में मिले लाभ को अगले साल भी जारी रखा जा सके. मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में विविधीकरण और मूल्य वर्धन से निर्यात में वृद्धि की संभावना बढ़ सकती है. ग्रामीण क्षेत्र में मजदूरी पर बनते दबाव का भी, जिससे उपभोग की निरंतरता प्रभावित होती है, हल निकालना जरूरी है. यह दीपावली लोगों के लिए खुशी का बड़ा अवसर तो है ही, नये साल में जाने से पहले अर्थव्यवस्था को मिली इस गति का महत्व भी है. रिकॉर्ड आर्थिक गतिविधियों के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती आनेवाले दिनों में बने रहने की उम्मीद है. इस त्योहार पर बने उत्साह को अगर बनाये रखा गया, तो उससे विकसित भारत का आर्थिक भविष्य अधिक सुरक्षित, ज्यादा समावेशी और समृद्ध होगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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