बहुत घातक है स्याहीड्रोजन बम!

पता नहीं, आदमी को अपने जीने के लिए दूसरे को मारना कब से और क्यों जरूरी लगने लगा, लेकिन जब लगने ही लगा, तो इसके लिए उसने कई तरीके अख्तियार किये. चाकू घोंपने, गला घोंटने, जहर दे देने आदि के अतिरिक्त शादी का वादा करके मुकर जाने या फिर आशा के विपरीत न मुकरने जैसे […]

By Prabhat Khabar Digital Desk | January 23, 2016 12:40 AM

पता नहीं, आदमी को अपने जीने के लिए दूसरे को मारना कब से और क्यों जरूरी लगने लगा, लेकिन जब लगने ही लगा, तो इसके लिए उसने कई तरीके अख्तियार किये. चाकू घोंपने, गला घोंटने, जहर दे देने आदि के अतिरिक्त शादी का वादा करके मुकर जाने या फिर आशा के विपरीत न मुकरने जैसे परंपरागत तरीकों को छोड़ दें, तो इसका सबसे अहिंसात्मक तरीका निगाहे-नाज से मारने का रहा है.

भुक्तभोगियों के अनुसार, मौका पड़ते ही नाजनीनों की यह निगाहे-नाज खंजर का रूप धर लेती है, जो सीना चीर कर सीधे दिल में उतर जाता है, लेकिन कोई निशान नहीं छोड़ता. काम होते ही यह खंजर वापस निगाहे-नाज में तबदील हो जाता है. एक शायर ने तो इ-रिक्शे की तरह इस पर भी लाइसेंस लगाने की मांग की है- निगाहे-नाज पर लाइसेंस क्यूं नहीं, यह भी तो कत्ल करती है शमशीर की तरह!

कुछ मोहतरमाएं अपनी इन नाज-भरी निगाहों या नजरों से खंजर या शमशीर के बजाय तीरों का काम लेती हैं और उनमें भी जो पढ़ी-लिखी होती हैं, वे बाकायदा गिन-गिन कर ये तीर चलाती हैं, जैसा कि फिल्म ‘दो उस्ताद’ के इस गाने में बताया गया है- नजरों के तीर मारे कस, कस, कस, एक नहीं, दो नहीं, आठ, नौ, दस! ये नजरें वैसे ही तिरछी होती हैं, लेकिन किसी-किसी की इतनी ज्यादा तिरछी होती हैं कि झेलना मुश्किल हो जाता है- जब देखा उन्होंने तिरछी नजर से तो हम मदहोश हो गये, लेकिन जब पता चला कि उनकी नजरें ही तिरछी हैं तो बेहोश हो गये.

ये नजरें अमृत और विष दोनों से भरी होती हैं, जिसके हिस्से जो आ जाये. किसी-किसी के हिस्से ये दोनों ही आ जाते हैं और तब हालत ऐसी हो जाती है कि आदमी न जीने लायक रहता है, न मरने लायक, जैसा कि बिहारी के नाम से प्रचलित लेकिन असल में रसलीन के इस दोहे में बताया गया है- अमिय हलाहल मदभरे, श्वेत श्याम रतनार। जियत मरत झुकि-झुकि परत जेहि चितवत एक बार।।

श्रीमद्भागवत पुराण में गोपियां भी श्रीकृष्ण से यह वाजिब सवाल पूछती हैं कि हे हमारे प्रेमपूरित हृदय के स्वामी, हम तो आपकी बिना मोल की दासी हैं, लेकिन जरा यह तो बता दो कि क्या अस्त्रों से हत्या करना ही वध होता है, क्या इन नेत्रों से मारना हमारा वध करना नहीं है?

लेकिन अभी-अभी पता चला है कि स्याही फेंक कर भी किसी की हत्या की जा सकती है. जरूर यह स्याहीड्रोजन बम पिछले दिनों उत्तर कोरिया द्वारा परीक्षित हाइड्रोजन बम से भी घातक होगा, तभी दिल्ली में इसे लेकर हाहाकार मचा है. न तो इस स्याहीड्रोजन बम के परीक्षण के लिए कोई बड़ा क्षेत्र चाहिए, न इसे रखने के लिए कोई लंबा-चौड़ा इंतजाम करना होता है. यह एक छोटे-से पेन में भर जाता है और किसी भी सभा-जुलूस में फेंका जा सकता है.

स्याही के छींटे उछलते ही चारों तरफ चिल्ल-पों मच जाती है और मुख्यमंत्री की हत्या होने का खतरा पैदा हो जाता है. अलबत्ता मुख्यमंत्री बनने से पहले ऐसा कोई खतरा नहीं होता, इसीलिए मुख्यमंत्री बनने का आकांक्षी तब खुद पर स्याही फेंकनेवाले के घर जाकर उसे अभयदान ही नहीं दे आता, सत्ताधारी दल के नेता पर जूता फेंकनेवाले को अपनी पार्टी का टिकट भी दे देता है.