सबने लाइन में बोरा बिछाया और बैठ गये. मास्टर साहब ने लड़कियों को कहा कि वे अपने घर जायें या साथ-साथ खेलें जाकर. हम लड़कों को उन्होंने एक श्लोक पढ़वाया, जिसका अर्थ उस समय हम सबके दिमाग से बाहर की चीज थी. उसके बाद सूर्य नमस्कार और फिर कुछ कसरतें करायीं. मुसलमान लड़के ने भी सब किया. हम सबको खूब मजा आया. दिन में मास्टर साहब हमारे घर पर आये और मुङो बुला कर कहा कि वह जो लड़का तुम्हारे साथ आया था, उसे कल से लेकर मत आना. मेरे पिताजी से भी शिकायत की कि इसकी संगत ठीक नहीं है. मेरे पिताजी ने मास्टर साहब से कहा कि वह लड़का तो पढ़ने और खेलने-कूदने में अच्छा है, फिर संगत खराब कैसे कह रहे हो. मास्टर साहब का जवाब था कि मुसलमानों की संगत ठीक नहीं. खैर, मेरा बालमन बोला कि मैं जाऊंगा तो वह भी जायेगा और वह नहीं जायेगा तो मैं भी नहीं जाऊंगा. फिर मैं नहीं गया और कई दूसरे बच्चों ने भी जाना छोड़ दिया. कुछ दिन में ही कार्यक्रम भी बंद हो गया. 38 साल बाद आज के परिदृश्य में वह घटना मेरे जेहन में फिर से उभर आयी.
ऐसा न हो कि बोलने को कोई बचे ही न!
सोचने की बात है कि ऐसा क्यों हो रहा है, यह कौन-सा रंग भरने की कोशिश है.. पाकिस्तान में जो कुछ होता रहा है और जो हो रहा है, हम उसके लिए चिंतित भर हो सकते हैं, लेकिन जो हमारे यहां हो रहा है, उस पर सिर्फ चिंतित होने भर से ही काम नहीं चलनेवाला. […]

सोचने की बात है कि ऐसा क्यों हो रहा है, यह कौन-सा रंग भरने की कोशिश है.. पाकिस्तान में जो कुछ होता रहा है और जो हो रहा है, हम उसके लिए चिंतित भर हो सकते हैं, लेकिन जो हमारे यहां हो रहा है, उस पर सिर्फ चिंतित होने भर से ही काम नहीं चलनेवाला.
उपराष्ट्रपति को लेकर जो विवाद खड़ा हुआ, उसके संदर्भ में मुङो बचपन का एक वाकया याद आ रहा है. 1977 की बात है. हमारे गांव में एक मास्टर साहब शाखा लगाने आये. उन्होंने बहुत से बच्चों को एकत्र किया और बताया कि सुबह पांच बजे कसरत करेंगे, गीत गायेंगे और खेलेंगे-कूदेंगे. सबसे यह भी कहा कि अपने साथ दूसरे बच्चों को भी लेकर आयें. गर्मियों की छुट्टियां चल रही थीं. हम सब बहुत उत्साहित थे. सुबह साढ़े चार बजे ही पंचायत घर पर पहुंच गये. करीब 20 बच्चे रहे होंगे, 8 से 12 साल तक के लड़के-लड़कियां दोनों. हम में एक मुसलमान लड़का भी था और हम दोनों साथ-साथ खेलते थे, स्कूल जाते थे. मास्टर साहब ने सबको अपना बोरा (बैठने के लिए आसन) लाने को भी कहा था.
21 जून और इससे पहले 26 जनवरी को क्या हुआ. 21 जून को प्रथम अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के मौके पर सुबह इंडिया गेट पर कार्यक्रम होने के बाद राम माधव जी का ट्वीट आता है कि दो सवाल, टैक्सपेयर्स के पैसे से चलनेवाले राज्यसभा टीवी ने योग दिवस के आयोजन का पूर्ण ब्लैक आउट क्यों किया? उपराष्ट्रपति किसी भी आयोजन में शामिल नहीं दिखे, जबकि राष्ट्रपति शामिल हुए? गौरतलब है कि राज्यसभा टीवी राज्यसभा के सभापति के मातहत काम करता है और उपराष्ट्रपति ही राज्यसभा के सभापति होते हैं. हालांकि बाद में राम माधव जी ने एक सवाल वापस लेते और उपराष्ट्रपति कार्यालय से माफी मांगते हुए ट्वीट किया कि मुङो पता चला है कि उपराष्ट्रपति की तबीयत ठीक नहीं थी. इस बीच राज्यसभा टीवी के प्रधान संपादक ने स्पष्टीकरण जारी किया कि राज्यसभा टीवी ने योग आयोजन को पूरा दिखाया, योग पर डाक्यूमेंट्री भी दिखायी. उपराष्ट्रपति कार्यालय से भी स्पष्टीकरण जारी हुआ कि उपराष्ट्रपति महोदय स्वस्थ हैं. उन्हें किसी आयोजन के लिए आमंत्रित नहीं किया गया था. इसके बाद आयुष मंत्रलय ने स्पष्टीकरण दिया कि चूंकि मुख्य आयोजन में प्रधानमंत्री मुख्य अतिथि थे और उपराष्ट्रपति प्रोटोकॉल में प्रधानमंत्री से ऊपर आते हैं, इसलिए उन्हें आमंत्रित नहीं किया गया. इस दौरान सोशल मीडिया में तमाम तरह के तर्क आने लगे, जिनका लब्बोलुआब था कि उपराष्ट्रपति अपने घर में तो योग कर सकते थे. विहिप नेता साध्वी प्राची ने कहा कि राजपथ पर जो योग कार्यक्रम था, वह किसी नेता की लड़की की शादी नहीं थी कि इसमें उन्हें न्योता भेजने की जरूरत थी. इससे आगे बढ़ कर वह यह भी बोलीं कि जो लोग योग का विरोध करते हैं, उनको इस देश में रहने का अधिकार नहीं है.
26 जनवरी, 2015 को भी इसी तरह का विवाद खड़ा हुआ था, गणतंत्र दिवस की परेड में राष्ट्रध्वज को सलामी को लेकर. इसमें उस समय के फोटो पोस्ट किये गये, जिसमें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री व अन्य मंत्री सलामी की मुद्रा में दिख रहे थे, जबकि उपराष्ट्रपति सावधान मुद्रा में खड़े हुए. उस समय भी उपराष्ट्रपति ही सही थे. प्रधानमंत्री व रक्षामंत्री तो अनजाने में मारे उत्साह के सलामी लेने की मुद्रा में आ गये, जबकि उनको ऐसा करने की जरूरत नहीं थी. उसी दृश्य में केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह और सुषमा स्वराज भी सावधान की मुद्रा में ही दिखे. उस समय भी उपराष्ट्रपति कार्यालय ने सफाई जारी की थी कि उपराष्ट्रपति जहां मुख्य भूमिका में होते हैं, वहां वह सलामी देते हैं. जैसे जनवरी में ही एनसीसी के कार्यक्रम में उपराष्ट्रपति ने राष्ट्रध्वज को सैल्यूट किया था. और भी कई वाकये गिनाये जा सकते हैं, लेकिन चूंकि ये दोनों मसले उपराष्ट्रपति से जुड़े हैं, लिहाजा गंभीर संकेत भी करते हैं. सवाल राजनाथ सिंह और सुषमा स्वराज पर नहीं उठे, जबकि उसी कार्यक्रम में उसी समय ये दोनों भी सावधान की मुद्रा में थे, जहां उपराष्ट्रपति पर सावधान की मुद्रा में खड़े रहने का आरोप लगाया गया.
सोचने की बात यह है कि ऐसा क्यों हो रहा है, यह कौन सा रंग भरने और कैसी राह बनाने की कोशिश है. पाकिस्तान में भी एक कोशिश हो रही है वहां के राष्ट्रनिर्माता मोहम्मद अली जिन्ना की जगह लुटेरे मोहम्मद बिन कासिम को पाकिस्तान के निर्माता के तौर पर स्थापित करने की. कहा जा रहा है कि आठवीं सदी में बिन कासिम ने सिंध पर हमला कर कब्जा किया था, इस तरह वह पहला पाकिस्तानी हुआ. पाकिस्तान में जो कुछ होता रहा है और जो हो रहा है, हम उसके लिए चिंतित भर हो सकते हैं, लेकिन जो हमारे यहां हो रहा है, उस पर सिर्फ चिंतित होने भर से ही काम नहीं चलनेवाला.
और अंत में..
श्रीकांत वर्मा की एक कविता है ‘हस्तक्षेप’- कोई छींकता तक नहीं/ इस डर से/ कि मगध की शांति/ भंग न हो जाये/ मगध को बनाये रखना है तो/ मगध में शांति रहनी ही चाहिए/ मगध है, तो शांति है, मगध में व्यवस्था रहनी ही चाहिए/ मगध में न रही/ तो कहां रहेगी?
आज का कॉलम लिखते हुए यह कविता याद आयी. लेकिन फिर लगा कि इससे भी ज्यादा मौजू रहेगी मार्टिन निमोलर की कविता फस्र्ट दे कम. इस कविता का हिंदी अनुवाद-
जब नाजी कम्युनिस्टों के पीछे आये/ मैं खामोश रहा/ क्योंकि, मैं कम्युनिस्ट नहीं था/ जब उन्होंने सोशल डेमोक्रेट्स को जेल में बंद किया/ मैं खामोश रहा/ क्योंकि, मैं सोशल डेमोक्रेट नहीं था/ जब वो यूनियन के मजदूरों के पीछे आये/ मैं बिल्कुल नहीं बोला/ क्योंकि, मैं मजदूर यूनियन का सदस्य नहीं था/ जब वो यहूदियों के लिए आये/ मैं खामोश रहा/ क्योंकि, मैं यहूदी नहीं था/ लेकिन, जब वो मेरे पीछे आये/ तब, बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था/ क्योंकि मैं अकेला था..
राजेंद्र तिवारी
कॉरपोरेट एडिटर
प्रभात खबर
rajendra.tiwari@prabhatkhabar.in