ये पब्लिक है, सब जानती है, मगर..

पब्लिक अंदर-बाहर का सब पहचानती है और सब जानती है. यही इसकी खूबी है. पर समस्या यह है कि सब जानते-पहचानते हुए भी वह खामोश रहती है. सड़क पर गलत तरफ से तेज भागती, विलासिता का प्रदर्शन करती किसी रईसजादे की गाड़ी हो या नशे में धुत ड्राइवर के ट्रक से कोई मासूम दुर्घटनाग्रस्त हो […]

पब्लिक अंदर-बाहर का सब पहचानती है और सब जानती है. यही इसकी खूबी है. पर समस्या यह है कि सब जानते-पहचानते हुए भी वह खामोश रहती है. सड़क पर गलत तरफ से तेज भागती, विलासिता का प्रदर्शन करती किसी रईसजादे की गाड़ी हो या नशे में धुत ड्राइवर के ट्रक से कोई मासूम दुर्घटनाग्रस्त हो जाये या सरेबाजार कोई छिछोरा जमाने के साथ चलने की कोशिश करती किसी लड़की पर फिकरा कसे या तेजाबी हमले का प्रयास करे, इस पब्लिक के मददगार हाथ कभी आगे नहीं आते और प्राय: गलत के विरोध में मुंह से कोई शब्द नहीं निकला.

किसी के घर चोरी या कोई अप्रिय घटना हो जाये तो हर बात की खबर रखने वाली यही पब्लिक पुलिस को दो बेजान से शब्द ‘नहीं पता’ कह कर अपनी अनभिज्ञता जाहिर करती है और मामला वहीं खत्म कर देती है. सड़क पर चेन छिनतई की घटनाओं का हो-हल्ला सुन मदद करने की बजाय यही पब्लिक अपने कीमती सामान की हिफाजत और सतर्कता से करते हुए तेज कदमों से अपने घर की ओर चल देती है. किसी भी क्षेत्र में भ्रष्टाचार देखकर नाराज पब्लिक आवाज उठाने से पहले अपना तेजी से भागता हुआ वक्त देखती है और ‘चुप’ में ही भला समझ कर अपना नुकसान कर रही होती है.

किसी भी तरह की अव्यवस्था के लिए शासन-प्रशासन जितने दोषी हैं, पब्लिक की चुप्पी भी उतनी ही दोषी है. मूक इंसान बोलने की कोशिश में इशारे करता है, मगर जनता जिसकी एकजुट और सशक्त आवाज हुंकार बन कर तख्तोताज बदल सकती है, वह मूक होने का अभिनय क्यों करती है? यह पब्लिक सब जानते-पहचानते हुए दुर्योधन का नमक खाये ‘भीष्म’ की तरह खामोश है. यही इस पब्लिक की सबसे बड़ी समस्या है.

विनती तिवारी, एमइएस कॉलोनी, रामगढ़

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