राजनीति किस ओर

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक ने पार्टी विरोधियों को ‘आंख निकालने’ और ‘हाथ काटने’ की धमकी दी है. अभिषेक पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की युवा इकाई के प्रमुख और लोकसभा सदस्य हैं. उनका यह विवादित बयान निजी बातचीत या लड़ाई-झगड़े के दौरान आवेश में नहीं आया, बल्कि वह […]

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक ने पार्टी विरोधियों को ‘आंख निकालने’ और ‘हाथ काटने’ की धमकी दी है. अभिषेक पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की युवा इकाई के प्रमुख और लोकसभा सदस्य हैं. उनका यह विवादित बयान निजी बातचीत या लड़ाई-झगड़े के दौरान आवेश में नहीं आया, बल्कि वह 24 परगना के बशीरहाट में पार्टी की एक बैठक को संबोधित कर रहे थे.

यह आज की राजनीति का चेहरा है. कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो लगता है कि अधिकतर पार्टियों में कुछ ऐसे ‘सरदार’ हैं, जो अपने विरोधियों को हर हाल में मिटा देना चाहते हैं. हैरानी की बात है कि उस बैठक में तृणमूल कांग्रेस के नये-पुराने नेता-कार्यकर्ता मौजूद थे.

जाहिर है, उनमें से कुछ राजनीतिक प्रशिक्षण और अपना ज्ञान भंडार बढ़ाने की उम्मीद लेकर पहुंचे होंगे. उन्हें पार्टी की नीतियों से अवगत कराने के बजाये अभिषेक ने टीएमसी के विरोधियों के लिए धमकी भरे शब्दों का प्रयोग कर पार्टी कार्यकर्ताओं को क्या संदेश देने की कोशिश की? एक मुख्यमंत्री के भतीजे का अपने विरोधियों के प्रति सार्वजनिक तौर पर धमकी का यह अंदाज लोकतांत्रिक व्यवस्था में आस्था रखने वाले लोगों के लिए निश्चित तौर पर गहरी चिंता का विषय है. अफसोस की बात है कि इसी पार्टी के एक सांसद ने माकपा की महिला कार्यकर्ताओं के बारे में बेहद घिनौना बयान दिया था. पुलिस ने इस मामले में अभिषेक के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर ली है.

लेकिन, इस पर थाना-पुलिस या कोर्ट-कचहरी के दायरे से कहीं ऊपर उठ कर विचार करने की जरूरत है. राजनीति के क्षेत्र में धैर्य, संवाद और तर्को के बल पर विरोधी को निरुत्तर कर देने के कौशल की जगह विरोधियों के लिए धमकी भरी भाषा, बदजुबानी और बेतुके बयान का चलन बढ़ा है. ऐसे उत्तेजक बयान राज्यों की सीमाओं तक सीमित नहीं हैं. पिछले साल आम चुनाव के प्रचार के दौरान बिहार के एक भाजपा नेता ने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के विरोधियों के बारे में कहा था कि उन्हें पाकिस्तान भेज देना चाहिए. राजनीति में सहनशीलता जितनी कम होगी, लोकतंत्र की नींव उतनी ही कमजोर पड़ती जायेगी. लोकतंत्र की खूबसूरती असहमति को पर्याप्त जगह और परस्पर संवाद में है. निश्चय ही ऐसी राजनीति न समाज को दिशा देगी और न ही जनहित में व्यवस्था का संचालन कर पायेगी. खुद के लिए दायरा गढ़ने और मर्यादा तय करने की जिम्मेवारी राजनेताओं को ही उठानी होगी.

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