संवेदनशील मुद्दों पर सर्वदलीय सहमति

पुष्पेश पंत वरिष्ठ स्तंभकार यह प्राथमिक जिम्मेवारी मोदी की है कि वह देश के नागरिकों को इस बारे में आश्वस्त करने में देर न करें कि वह अपनी और अपनी सरकार की तर्कसंगत आलोचना सह सकते हैं और आंतरिक नीतियों के संदर्भ में असहमति का स्वर मुखर करनेवालों को देशद्रोही नहीं समझते. मणिपुर में खापलांग […]

पुष्पेश पंत
वरिष्ठ स्तंभकार
यह प्राथमिक जिम्मेवारी मोदी की है कि वह देश के नागरिकों को इस बारे में आश्वस्त करने में देर न करें कि वह अपनी और अपनी सरकार की तर्कसंगत आलोचना सह सकते हैं और आंतरिक नीतियों के संदर्भ में असहमति का स्वर मुखर करनेवालों को देशद्रोही नहीं समझते.
मणिपुर में खापलांग गुट के अलगाववादी बागियों द्वारा भारतीय सेना के बीस जवानों की हत्या के बाद हमारी सेना द्वारा म्यांमार की जमीन में घुस कर इन आतंकवादियों के ठिकानों को निशाना बना इस समस्या को जड़ से मिटाने के अभूतपूर्व पराक्रमी प्रयास ने एक गरमागरम बहस को जन्म दे दिया है. कुछ विश्‍लेषकों का मानना है कि यह किस्सा ‘कहीं पे निगाहें कहीं पर निशाना’ वाला है. नागा आतंकवादियों को मार गिरा कर हम पाकिस्तान को यह संदेश दे रहे थे कि अगली बार ऐसा ही सबक उसे भी सिखलाया जा सकता है.
जाहिर है, पाकिस्तान इस वारदात से खासा बौखलाया हुआ है. उसने यह धमकी देना जरूरी समझा है कि भारत उसे म्यांमार समझने की घातक भूल न करे- इसी में उसकी भलाई है. हां, चीन ने यह सफाई दे दी है कि उसका कोई वास्ता मणिपुर या भारत के दूसरे पूर्वोत्तरी राज्यों में सक्रिय उपद्रवियों से नहीं है, सो इस सैनिक कार्रवाई पर प्रतिक्रिया की कोई जरूरत नहीं.
जो आलोचक इस वक्त यह कह रहे हैं कि भारत ने एक मित्र पड़ोसी देश की संप्रभुता का उल्लंघन कर उसे नाहक नाराज और शर्मसार किया है और पाकिस्तान के आत्मसम्मान को आहत कर उसे इस बात के लिए उकसाया है कि वह वह कुछ न कुछ शरारत करे, उन्हें यह याद दिलाने की जरूरत है कि कोई भी संप्रभु राज्य यह स्वीकार नहीं कर सकता कि उसकी सत्ता को चुनौती देनेवाले तबके वर्दीधारी सैनिकों की हत्या कर निरापद स्वच्छंद नहीं घूमते रह सकते.
इस घटना ने हमें यह सोचने को मजबूर किया है कि कैसे अब तक हम अलगाववादी दहशतगर्दी का मुकाबला करने में क्यों असमर्थ रहे हैं? क्या यह सच नहीं कि जम्मू-कश्मीर राज्य में और पूर्वोत्तरी राज्यों के मामले में लगातार दोहरे पाखंडी मानदंड अपनाते रहे हैं?
आम्र्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट का उन्मूलन हो या मानवाधिकारों का संरक्षण, अल्पसंख्यक मतों की चुनावी उपयोगिता के दबाव के कारण मणिपुर, असम, नागालैंड आदि में असंतोष, आक्रोश, अलगाववाद की समस्या की अनदेखी ही होती रही है. यह सवाल पूछना राजनीतिक समझदारी नहीं समझा जाता कि उपद्रवियों के साथ शांतिपूर्ण समाधान के तमाम प्रयास बुरी तरफ असफल ही रहे हैं. परस्पर भरोसा बढ़ानेवाली इकतरफा रियायतों का कोई ठोस नतीजा अब तक नजर नहीं आया है. बेहतरी इसी में है कि हम ठंडे दिमाग से क्या खोया या पाया का लेखा-जोखा तैयार कर यह फैसला लें कि क्या बल प्रयोग के बिना देश की एकता अखंडता अक्षत रह सकती है?
विडंबना यह है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह आशंका प्रबल हुई है कि जो कुछ भी वह करते हैं, सिर्फ सांप्रदायिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए होता है. इसके साथ ही यह शक भी मुखर किया जाता रहा है कि बल प्रयोग का एकमात्र उद्देश्य तानाशाही के लिए जमीन तैयार करना है. मानवाधिकार संरक्षक जमात हो या जनतांत्रिक प्रणाली के समर्थक, इस बात को इनके लिए रेखांकित करने की जरूरत है कि अधिकार राष्ट्रहित में संविधान-सम्मत तरीके से सीमित, संकुचित किये जा सकते हैं.
इसी तरह संघीय व्यवस्था का अर्थ यह नहीं कि केंद्र का कर्तव्य मात्र राज्यों के लिए संसाधन सुलभ कराना नहीं होता. यदि राज्य अपनी संवैधानिक जिम्मेवारी के निर्वाह में नाकाम रहते हैं, तो केंद्र को राष्ट्रहित की रक्षा के लिए हस्तक्षेप के लिए विवश होना पड़ सकता है.
यह बात सिर्फ मणिपुर-म्यांमार के बारे में लागू नहीं होती और न ही जम्मू-कश्मीर तक सीमित है. नक्सलवादी उपद्रवग्रस्त राज्यों तथा सांप्रदायिक हिंसा पर अंकुश लगाने में अनिच्छुक बड़े हिंदी पट्टी के राज्यों के बारे में भी पूछा जाना चाहिए.
सबसे पहली जरूरत राष्ट्रीय सुरक्षा और देश की एकता अखंडता से जुड़े संवेदनशील मुद्दों के बारे में सर्वदलीय सहमति बनाने की है. इस काम की उम्मीद हम किसी राजनीतिक दल से नहीं कर सकते.
उनके अनुशासित कार्यकर्ता हों या करिश्माई समङो जानेवाले नेता- अपने संकीर्ण स्वार्थो के ऊपर उठ कर नहीं सोच सकते. यह काम वैदेशिक और प्रतिरक्षा नीति के क्षेत्र में सहमति बनाने का जिम्मेवार काम जागरूक नागरिकों को ही करना होगा.हाल के कुछ उदाहरण हमें आशावादी बनाते हैं.
मोदी के बांग्लादेश दौरे के मौके पर उनके साथ अपने बुनियादी मतभेद भुला कर ममता ने इस यात्रा को कामयाब बनाया और मौके की नजाकत को भांपते मोदी ने सहर्ष ममता दीदी को आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनने दिया. इसके पहले भी श्रीलंका के साथ संबंधों को सुधारने में मोदी और जयललिता को बीच की अघोषित समझदारी के सार्थक नतीजे सामने आ चुके हैं.
हमारी राय में मीडिया को भी कुछ संयम बरतने की जरूरत है. प्रतियोगी दूसरों से लगातार आगे रहने की आपाधापी में बड़बोला सुर्खियां गढ़ने से नुकसान ही हो सकता है. जब म्यांमार ने कोई आपत्ति जाहिर नहीं की है, तब हमें इस आलोचना का तुक समझ नहीं आता कि भारतीय सेना के इस कारनामे से अंतरराष्ट्रीय कानून का कैसा उल्लंघन भारत ने किया है. न ही राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार या विदेश सचिव के खुफिया दौरों का आंखों देखा हाल बखानने की उतावली जायज है.
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील विषयों में सदैव निरंकुश अबाध नहीं रह सकती. न ही हमारा संविधान मीडिया को नागरिक के संवैधानिक अधिकारों से इतर कुछ विशेषाधिकार प्रदान करता है.
विडंबना यह है कि संदेह के वातावरण में बहस आगे नहीं बढ़ायी जा सकती. यह प्राथमिक जिम्मेवारी मोदी की है कि वह देश के नागरिकों को इस बारे में आश्वस्त करने में देर न करें कि वह अपनी और अपनी सरकार की तर्कसंगत आलोचना सह सकते हैं और आंतरिक नीतियों के संदर्भ में असहमति का स्वर मुखर करनेवालों को देशद्रोही नहीं समझते.
अगर विपक्ष को-और विपक्ष सिर्फ कांग्रेस पार्टी, सोनिया-राहुल और उनके पिछलगुए नहीं- लगने लगेगा कि चुनावी हार के बाद भी राजनीति में उसके लिए जगह बची है, तभी विदेश नीति और सामरिक नीति के क्षेत्र में सहमति बनाने की बात आगे बढ़ सकती है.
कांग्रेस की तरफ से जैसा बयान आनंद शर्मा ने दिया है, उससे ऐसा नहीं जान पड़ता कि उस दल की कोई दिलचस्पी इस जरूरी बहस को सार्थक तरीके से जारी रखने में है. यहां तत्काल यह जोड़ने की जरूरत है कि मोदी या उनकी सरकार की तरफ से भी अभी तक कोई संकेत नहीं मिला है कि वह जनतंत्र में असहमति और मतभेद के महत्व को समझते स्वीकार करते हैं!

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